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दुश्मनी के बाद भी एक-दूसरे को अपने परमाणु ठिकानों का पता क्यों देते हैं भारत-पाकिस्तान

जनता जनार्दन संवाददाता , Jan 02, 2026, 12:07 pm IST
Keywords: India   Pakistan   Bharat   Pak   परमाणु   भारत-पाकिस्तान  
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दुश्मनी के बाद भी एक-दूसरे को अपने परमाणु ठिकानों का पता क्यों देते हैं भारत-पाकिस्तान

नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु ठिकानों की जानकारी का आदान-प्रदान एक बार फिर हुआ है, और यह आदान-प्रदान नए साल के पहले दिन हुआ. हालांकि यह खबर थोड़ी चौंकाने वाली लग सकती है, लेकिन इसे लेकर चिंता करने की कोई बात नहीं है, क्योंकि यह जानकारी एक पुराने और स्थापित समझौते के तहत साझा की गई है, जो दोनों देशों के बीच 1988 में हुआ था.

इस समझौते के तहत, दोनों देशों ने अपने परमाणु प्रतिष्ठानों के ठिकानों की सूची का आदान-प्रदान किया. यह प्रक्रिया पिछले तीन दशकों से जारी है और हर साल 1 जनवरी को दोनों देशों के बीच एक नियमित अभ्यास बन चुका है. इसके बावजूद, यह कदम इस समय लिया गया है जब दोनों देशों के रिश्तों में तनाव है, विशेषकर पिछले साल मई में हुए चार दिन के सैन्य संघर्ष के बाद से.

समझौते का इतिहास और उद्देश्य

भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु प्रतिष्ठानों की जानकारी साझा करने का यह समझौता 31 दिसंबर 1988 को हुआ था और यह 27 जनवरी 1991 से लागू हुआ था. इस समझौते का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि दोनों देशों के बीच परमाणु हथियारों का कोई अप्रत्याशित उपयोग न हो, खासकर युद्ध की स्थिति में. इसके तहत, दोनों देशों को एक-दूसरे को अपने परमाणु ठिकानों की सूची हर साल 1 जनवरी को देने की जिम्मेदारी दी गई है.

विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह आदान-प्रदान 35वीं बार हुआ है. पहली बार यह सूची 1 जनवरी 1992 को साझा की गई थी. मंत्रालय ने बताया कि यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जो दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ाने और परमाणु हमलों को रोकने के उद्देश्य से की जा रही है.

क्यों है यह समझौता महत्वपूर्ण?

यह समझौता दोनों देशों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, खासकर उस स्थिति में जब दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने की संभावना रहती है. परमाणु ठिकानों की जानकारी का आदान-प्रदान यह सुनिश्चित करता है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे के परमाणु कार्यक्रमों के बारे में पूरी तरह से अवगत हैं और किसी भी परिस्थिति में बिना चेतावनी के एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे. यह कदम दोनों देशों के बीच विश्वास का निर्माण करता है और परमाणु संघर्ष की संभावना को न्यूनतम करने की दिशा में मदद करता है.

परमाणु प्रतिष्ठान वे स्थल होते हैं जहां परमाणु ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है या जहां परमाणु हथियार बनाए जाते हैं. यह समझौता यह सुनिश्चित करता है कि दोनों देशों के पास एक-दूसरे के परमाणु कार्यक्रमों के बारे में स्पष्ट जानकारी हो, ताकि आपसी समझौते के बिना कोई भी अप्रत्याशित हमला न हो सके. यह एक प्रकार से सुरक्षा नेटवर्क की तरह कार्य करता है, जिससे दोनों देशों को शांति बनाए रखने में मदद मिलती है.

डील के पीछे के तर्क

यह समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय विश्वास को बढ़ाने का एक तरीका है. परमाणु हथियारों के खतरे के बीच, दोनों देशों के लिए यह आवश्यक है कि वे एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों के बारे में पूरी तरह से जानें और इस बात का विश्वास बनाए रखें कि कोई भी देश किसी अन्य देश के ठिकाने पर पहले हमला करने का विचार भी नहीं करेगा. खासकर, जब दोनों देशों के पास परमाणु अस्तित्व है, तो यह विश्वास निर्माण की प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है.

पिछले कुछ वर्षों में, दोनों देशों के रिश्ते कई बार तनावपूर्ण रहे हैं, लेकिन इस तरह के समझौतों से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि दोनों पक्ष किसी भी विवाद को परमाणु हमले तक न ले जाएं. इससे दोनों देशों के बीच एक सामरिक संतुलन बना रहता है और यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी संघर्ष की स्थिति में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल न किया जाए.

क्या हुआ है हालिया स्थिति में?

साल 2025 के पहले दिन, भारत और पाकिस्तान ने एक-दूसरे को अपनी परमाणु प्रतिष्ठानों की सूची का आदान-प्रदान किया. इस समझौते का पालन करते हुए, दोनों देशों ने इस प्रक्रिया को फिर से दोहराया, ताकि परमाणु ठिकानों पर हमले को रोकने के उद्देश्य से भरोसा बना रहे. यह आदान-प्रदान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच सैन्य संघर्ष और सीमा पर तनाव की स्थिति बनी हुई थी.

भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु ठिकानों के आदान-प्रदान का यह समझौता उन दोनों देशों के लिए एक सुरक्षा उपाय के तौर पर काम करता है, जो परमाणु हथियारों का उपयोग करने में एक दुसरे से डरते हैं. यह कदम परमाणु हमलों की रोकथाम के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच प्रदान करता है.

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