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1 फरवरी को खुलेगा सरकार का खजाना, किसे कितना होगा फायदा?

जनता जनार्दन संवाददाता , Jan 25, 2026, 13:03 pm IST
Keywords: Budget 2026   भारतीय अर्थव्यवस्था   मुद्रास्फीति और जीडीपी  
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1 फरवरी को खुलेगा सरकार का खजाना, किसे कितना होगा फायदा?

आगामी 1 फरवरी 2026 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम दिन साबित हो सकता है. रविवार को जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में देश का आम बजट पेश करेंगी, तो सिर्फ देश के करोड़ों नागरिक ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों की नजर भी भारत पर टिकी होगी.

इस बार का बजट ऐसे समय आ रहा है, जब वैश्विक स्तर पर चुनौतियां बढ़ी हुई हैं. अमेरिका द्वारा हाल ही में भारतीय शिपमेंट्स पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने से भारत के निर्यात पर दबाव बना है. ऐसे हालात में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह अंतरराष्ट्रीय दबाव और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन कैसे साधती है.

हर साल की तरह इस बार भी आम आदमी के मन में वही सवाल है कि क्या बजट से जेब पर बोझ बढ़ेगा या राहत मिलेगी? लेकिन बजट भाषण के दौरान इस्तेमाल होने वाले भारी-भरकम आर्थिक शब्द अक्सर लोगों को उलझा देते हैं. ऐसे में बजट को सही मायनों में समझने के लिए उसकी “आर्थिक भाषा” को सरल तरीके से समझना जरूरी है.

मुद्रास्फीति और जीडीपी: अर्थव्यवस्था की सेहत

बजट भाषण में दो शब्द सबसे ज्यादा सुनाई देते हैं- मुद्रास्फीति और जीडीपी.

मुद्रास्फीति का सीधा मतलब है महंगाई. जब आपके पास मौजूद पैसे की ताकत कम हो जाती है और रोजमर्रा की चीजें महंगी लगने लगती हैं, तो समझिए महंगाई बढ़ रही है. आसान शब्दों में कहें तो अगर आज आप उतने ही पैसों में पहले से कम सामान खरीद पा रहे हैं, तो यह मुद्रास्फीति का असर है.

वहीं जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) किसी भी देश की आर्थिक ताकत को दिखाने वाला सबसे बड़ा पैमाना होता है. एक साल में देश के भीतर जितनी वस्तुएं बनीं और जितनी सेवाएं दी गईं, उनकी कुल बाजार कीमत ही जीडीपी कहलाती है.

अगर जीडीपी बढ़ रही है, तो इसका मतलब है कि देश की अर्थव्यवस्था फैल रही है और विकास की रफ्तार बनी हुई है.

फिस्कल डेफिसिट और सरकारी खर्च का गणित

सरकार का बजट सिर्फ कमाई का नहीं, बल्कि खर्च का भी पूरा हिसाब होता है. यहां दो अहम शब्द आते हैं- फिस्कल डेफिसिट और कैपिटल एक्सपेंडिचर.

जब सरकार की आमदनी उसके खर्चों से कम पड़ जाती है, तो जो अंतर बचता है उसे पूरा करने के लिए सरकार कर्ज लेती है. इसी कर्ज को फिस्कल डेफिसिट या राजकोषीय घाटा कहा जाता है. यह घाटा जितना कम होता है, देश की आर्थिक स्थिति उतनी ही मजबूत मानी जाती है.

अब बात करते हैं खर्च की. सरकार दो तरह से पैसा खर्च करती है- पहला, कैपिटल एक्सपेंडिचर (पूंजीगत व्यय). यह वह खर्च होता है जो सड़कें, पुल, रेलवे, स्कूल या अस्पताल जैसी स्थायी संपत्तियां बनाने में किया जाता है. इसे “अच्छा खर्च” कहा जाता है क्योंकि इससे भविष्य में देश की क्षमता बढ़ती है.

दूसरा, रेवेन्यू एक्सपेंडिचर (राजस्व व्यय). इसमें सरकारी कर्मचारियों की सैलरी, पेंशन और रोजमर्रा के प्रशासनिक खर्च शामिल होते हैं. इससे कोई नई संपत्ति नहीं बनती, लेकिन सरकारी तंत्र चलता रहता है.

टैक्स का खेल: डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स

बजट का सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला हिस्सा होता है टैक्स. टैक्स मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं- डायरेक्ट टैक्स और इनडायरेक्ट टैक्स.

डायरेक्ट टैक्स वह होता है जो आप सीधे सरकार को चुकाते हैं, जैसे इनकम टैक्स. इसका बोझ आप किसी और पर नहीं डाल सकते.

वहीं इनडायरेक्ट टैक्स वह टैक्स होता है, जो आप सामान या सेवा खरीदते समय दुकानदार को देते हैं, लेकिन असल में वह सरकार तक पहुंचता है. GST इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. जब भी आप कोई चीज खरीदते हैं, तो आप अनजाने में यह टैक्स चुका रहे होते हैं.

इसके अलावा, विदेश से आने वाले या बाहर जाने वाले सामान पर लगने वाला टैक्स कस्टम ड्यूटी कहलाता है. यही टैक्स तय करता है कि विदेशी सामान सस्ता होगा या महंगा.

फिस्कल पॉलिसी और मॉनेटरी पॉलिसी का फर्क

बजट के जरिए सरकार अपनी फिस्कल पॉलिसी यानी राजकोषीय नीति तय करती है. इसमें यह निर्णय लिया जाता है कि कितना टैक्स लिया जाएगा और कहां-कहां खर्च किया जाएगा.

दूसरी ओर, मॉनेटरी पॉलिसी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हाथ में होती है. इसमें ब्याज दरें तय करना, रेपो रेट बदलना और मुद्रा की सप्लाई को कंट्रोल करना शामिल होता है. इसका सीधा असर आपकी EMI और लोन पर पड़ता है.

जब सरकार को पैसों की जरूरत ज्यादा होती है, तो वह अपनी सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचती है. इसे विनिवेश या डिसइन्वेस्टमेंट कहा जाता है. इसे आसान शब्दों में समझें तो यह घर का खर्च चलाने के लिए जमा संपत्ति बेचने जैसा होता है.

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