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फ़ारूक़ी किसी आंदोलन या संगठन से जुड़े बिना स्वयं एक आंदोलन और संगठन बन गए: अली अहमद फ़ातमी

जनता जनार्दन संवाददाता , Jan 23, 2026, 11:59 am IST
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फ़ारूक़ी किसी आंदोलन या संगठन से जुड़े बिना स्वयं एक आंदोलन और संगठन बन गए: अली अहमद फ़ातमी
नई दिल्ली, 22 जनवरी 2026। साहित्य अकादेमी द्वारा उर्दू के प्रख्यात विचारक, आलोचक, भाषाविद्, कथाकार, कवि एवं लेखक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के साहित्यिक योगदान पर आज अकादेमी सभागार, नई दिल्ली में एक दिवसीय परिसंवाद का आयोजन किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध लेखक एवं आलोचक प्रोफ़ेसर अली अहमद फ़ातमी ने की। उन्होंने कहा कि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी अनेक विधाओं के ज्ञाता थे। वे किसी आंदोलन या संगठन से जुड़े बिना स्वयं एक आंदोलन और संगठन बन गए। वे स्वयं एक साहित्यिक परंपरा बने, जिसने पूरी एक पीढ़ी की वैचारिक संरचना की और साहित्य-बोध एवं काव्य-बोध के नए आयाम स्थापित किए। फ़ारूक़ी का अध्ययन-क्षेत्र विचार और दृष्टि की समझ व आलोचना के संदर्भ में अंग्रेज़ी, फ़ारसी और फ्ऱांसीसी भाषाओं तक फैला हुआ था।
अपने उद्घाटन वक्तव्य में साहित्य अकादेमी उर्दू परामर्श मंडल के संयोजक, प्रख्यात कवि श्री चंद्रभान ख़याल ने कहा कि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी उर्दू साहित्य का एक ऐसा सितारा थे जिन्होंने आधुनिकता के साथ ही आलोचना सृजन में अपनी अपार क्षमताओं को प्रदर्शित किया। जीवन भर डाक विभाग में कार्य करने के बावजूद उन्होंने उर्दू भाषा और साहित्य से गहन प्रेम बनाए रखा। आगे उन्होंने यह भी कहा कि फ़ारूक़ी साहब ने अपने व्यापक अध्ययन, विश्लेषणात्मक चिंतन-शैली, वैचारिक विकास और दूरदर्शी दृष्टि से वैश्विक उर्दू साहित्य में जो स्थान प्राप्त किया, उसका संपूर्ण उर्दू साहित्य जगत साक्षी है। 
इस अवसर पर बीज-वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिंद) के महासचिव अतहर फ़ारूक़ी ने शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी से संबंधित अनेक व्यक्तिगत संस्मरण साझा किए और उर्दू व अंग्रेज़ी में लिखे गए ऐसे अनेक लेखों की एक पूरी सूची की ओर संकेत किया, जो न तो उनके जीवनकाल में प्रकाशित हो सके और न ही उनके निधन के बाद अब तक प्रकाशित हो पाए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें शीघ्रातिशीघ्र प्रकाशित किया जाए।
आज के पहले विचार सत्र की अध्यक्षता जामिया मिल्लिया इस्लामिया के उर्दू विभाग के प्रोफेसर अहमद महफूज ने की। उन्होंने कहा कि फ़ारूक़ी साहब उन गिनी-चुनी हस्तियों में शामिल हैं, जो ज्ञान और साहित्य की दुनिया में उच्च स्थान पर आसीन होते हुए भी विनम्रता और नम्रता का प्रदर्शन करते रहे, यह हम सबके लिए प्रेरणादायक है। फ़ारूक़ी साहब की आलोचना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने प्राचीन साहित्यिक धरोहर को अमूल्य बताया, उसे नकारा नहीं। वे उत्तर-औपनिवेशिक चिंतन को आगे बढ़ाने में सदैव अग्रणी रहे। उन्होंने यह भी कहा कि फ़ारूक़ी साहब ने दास्तान की पुनःखोज की और उसे उसका खोया हुआ सम्मान दिलाया।
इस सत्र में इक़बाल हुसैन ने ‘शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि: उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन’ विषय पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया, जबकि कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़ से आईं शकीला बानो गौरी ख़ान ने ‘शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का कथालेखन’ शीर्षक से शोधपत्र पढ़ा। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रोफ़ेसर सिराज अजमली ने ‘शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी: मेरे मार्गदर्शक और शिक्षक’ शीर्षक से अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया।
 
दूसरे सत्र की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर ख़्वाजा मोहम्मद इकरामुद्दीन ने की। उन्होंने कहा कि फ़ारूक़ी साहब साहित्यिक ईमानदारी के पक्षधर थे। उनसे असहमति रखने वाले भी उनकी विद्वत्ता को स्वीकार करते थे। बदलते समय की प्रवृत्तियों को ध्यान में रखते हुए वे नए आलोचनात्मक रुझानों की शुरुआत करते हैं। इस सत्र में दो आलेख प्रस्तुत किए गए। पहला आलेख जगदंबा दुबे ने ‘शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी’ शीर्षक से प्रस्तुत किया, जबकि दूसरा और कार्यक्रम का अंतिम आलेख जामिया मिल्लिया इस्लामिया के उर्दू विभागागध्यक्ष प्रोफ़ेसर कौसर मज़हरी ने ‘क्या आलोचक का अस्तित्व आवश्यक है’ शीर्षक से प्रस्तुत किया। प्रोफ़ेसर मजहरी ने अपने आलेख में कहा कि फ़ारूक़ी साहब ने इस बिंदु की ओर संकेत किया है कि यदि आलोचक में विनम्रता नहीं है तो वह अच्छा आलोचक नहीं हो सकता। फ़ारूक़ी साहब ने पुराने आलोचकों की एक कमी यह बताई कि जब कोई रचना उनकी पूर्वधारणाओं पर खरी नहीं उतरती थी तो वे उसे अस्वीकार कर देते थे।
कार्यक्रम के अंत में श्री चंद्रभान ख़याल ने सभी प्रतिभागियों और श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। 
कार्यक्रम का संचालन एवं अतिथितियों का स्वागत साहित्य अकादेमी के संपादक (हिंदी) अनुपम तिवारी ने किया और फ़ारूक़ी साहब से जुड़े कुछ बिंदुओं पर प्रकाश डाला।
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