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14 या 15 कब है मकर सक्रांति? यहां दूर कर लें अपनी कंफ्यूजन

जनता जनार्दन संवाददाता , Jan 07, 2026, 11:05 am IST
Keywords: Makar Sakranti 2026   मकर सक्रांति   हिंदू पंचांग में मकर संक्रांति  
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14 या 15 कब है मकर सक्रांति? यहां दूर कर लें अपनी कंफ्यूजन

हिंदू पंचांग में मकर संक्रांति को विशेष स्थान प्राप्त है, क्योंकि यह केवल एक पर्व नहीं बल्कि सूर्य की गति में होने वाले शुभ परिवर्तन का प्रतीक है. इस दिन सूर्यदेव धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और इसी खगोलीय परिवर्तन को मकर संक्रांति कहा जाता है. 

वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 14 जनवरी, बुधवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा. ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस दिन सूर्य दोपहर 3 बजकर 13 मिनट पर मकर राशि में प्रवेश करेंगे. मकर संक्रांति पर स्नान, दान, जप और ध्यान का विशेष महत्व माना गया है, क्योंकि इस समय किए गए पुण्य कर्म कई गुना फल देते हैं.

मकर संक्रांति 2026 का पुण्य काल और महापुण्य काल

साल 2026 में मकर संक्रांति का पुण्य काल 14 जनवरी को दोपहर 3 बजकर 13 मिनट से आरंभ होगा. इसी समय से महापुण्य काल भी शुरू हो जाएगा, जो शाम 4 बजकर 58 मिनट तक रहेगा. मान्यता है कि महापुण्य काल में किया गया दान और पूजा अत्यंत शुभ फल प्रदान करती है.इस दिन गंगा स्नान का विशेष मुहूर्त सुबह 9 बजकर 03 मिनट से लेकर सुबह 10 बजकर 48 मिनट तक रहेगा. जो लोग पवित्र नदी तक नहीं जा सकते, वे घर पर स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं.

मकर संक्रांति 2026 की पूजा विधि

मकर संक्रांति के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना उत्तम माना गया है. स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें और सूर्यदेव का ध्यान करें. तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें रोली, अक्षत और लाल फूल डालें तथा सूर्य को अर्घ्य अर्पित करें.इस दिन तिल, गुड़, चावल, कंबल, वस्त्र और अन्न का दान विशेष पुण्यकारी होता है. घर में तिल-गुड़ के लड्डू, खिचड़ी और मौसमी व्यंजन बनाकर पहले भगवान को भोग लगाएं, फिर प्रसाद रूप में ग्रहण करें.पूजन के दौरान ‘ॐ घृणि सूर्याय नमः’ मंत्र का जाप करें. साथ ही श्रीमद्भगवद्गीता और सूर्य उपासना से संबंधित ग्रंथों का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना गया है.

मकर संक्रांति के विविध नाम

भारत की सांस्कृतिक विविधता इस पर्व में भी देखने को मिलती है. अलग-अलग राज्यों में मकर संक्रांति को भिन्न नामों से मनाया जाता है. तमिलनाडु में यह पोंगल के रूप में प्रसिद्ध है, पंजाब में लोहड़ी, गुजरात में उत्तरायण और उत्तर भारत में इसे खिचड़ी या मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है. हर क्षेत्र में इसकी परंपराएं अलग हैं, लेकिन भाव और उद्देश्य एक ही सूर्य उपासना और कृतज्ञता.

मकर संक्रांति का धार्मिक और सामाजिक महत्व

मकर संक्रांति का दिन स्नान और दान के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है. इस दिन गंगा सहित अन्य पवित्र नदियों, तीर्थों, तालाबों और सरोवरों में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है. ऊनी वस्त्र, कंबल, जूते, धार्मिक पुस्तकें और पंचांग का दान करने का विशेष महत्व है.यह पर्व सूर्यदेव की आराधना को समर्पित है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनि से मिलने मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिससे पारिवारिक समरसता और सौहार्द का संदेश मिलता है. साथ ही यह पर्व फसल कटाई से जुड़ा होने के कारण किसानों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है.

पौराणिक मान्यताएं

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने असुरों का संहार कर पृथ्वी पर धर्म की स्थापना की थी. एक अन्य मान्यता के अनुसार, इसी दिन मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं और भागीरथ के प्रयासों से जनकल्याण का मार्ग प्रशस्त हुआ था. इसी कारण इस दिन को मोक्ष और पुण्य प्राप्ति का विशेष अवसर माना जाता है.

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