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प्रख्यात साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन
जनता जनार्दन संवाददाता ,
Jan 30, 2026, 13:42 pm IST
Keywords: साहित्यकार साहित्य अकादेमी Sahitya Sahitya News UttarPradesh विनोद कुमार शुक्ल
नई दिल्ली: साहित्य अकादेमी द्वारा आज प्रख्यात कवि एवं कथाकार तथा साहित्य अकादेमी के महत्तर सदस्य विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। श्रद्धांजलि सभा में साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक, साहित्य अकादेमी हिंदी परामर्श मंडल के संयोजक गोविंद मिश्र तथा हिंदी परामर्श मंडल के अन्य सदस्यों - रामदेव शुक्ल, सियाराम शर्मा, उर्मिला शिरीष, तुलसी रमण, महादेव टोप्पो, व्यासमणि त्रिपाठी, देवसिंह पोखरिया, ब्रजरतन जोशी, पुखराज जांगिड़ उपस्थित थे। अन्य सदस्य - खेमसिंह डहरिया, दिनेश दधीचि, विकास दवे एवं प्रत्युष दवे ने सभा में आॅनलाइन उपस्थित थे।
रामदेव शुक्ल ने विनोद कुमार शुक्ल के लेखन को विशेष बताते हुए कहा कि उनका लेखन इतना विविध और श्रेष्ठ था कि पाठकों के अतिरिक्त फिल्मकारों को भी उसने अपनी तरफ खींचा। प्रत्यूष दुबे ने उनके जाने को अपूरणीय क्षति बताते अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए। तुलसी रमण ने उनकी हिमाचल यात्रा को याद करते हुए बताया कि उन्होंने उस यात्रा पर पाँच कविताएँ लिखी थीं। दिनेश दधीचि ने उनकी सादगी और ईमानदारी की चर्चा करते हुए उनकी अनूठी भाषा शैली को याद करते हुए उनके योगदान को अतुलनीय बताया। खेमसिंह डहेरिया ने उनकी रचनाओं में आम जीवन के संदर्भों की चर्चा की। विकास दवे ने उनकी रचनाओं में जन सामान्य की उपस्थिति की चर्चा करते हुए उनको याद किया। महादेव टोप्पो ने उनके ध्यान खीचने वाले शीर्षकों याद करते हुए कहा कि वे अपने पड़ोसी के जीवन को देखने की क्षमता रखते थे इसी कारण उनकी कविताओं में आदिवासी जीवन भी भरपूर मात्रा में नज़र आता है। उन्होंने मुझे प्रभावित ही नहीं किया बल्कि लिखने की प्रेरणा भी दी। सियाराम शर्मा ने उन्हें अप्रतिम गद्यकार के रूप में याद करते हुए कहा कि वे साधारण व्यक्ति के अभाव को भी बड़े ऐश्वर्य के साथ चित्रित करते थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ के परिवेश को बहुत गहनता से जाना-समझा और प्रस्तुत किया। व्यासमणि त्रिपाठी ने उनकी चित्रमयी भाषा का उल्लेख करते हुए कहा कि वे हिंदी साहित्य के साधक थे और हिंदी समाज उनका हमेशा ऋणी रहेगा। देवसिंह पोखरिया ने श्री शुक्ल के गद्य और पद्य की सरलता को याद करते हुए कहा कि वे अपने लेखन में लोक जीवन के दृश्य बुनते थे। वे अपने आप में एक युग प्रवर्तक थे। उर्मिला शिरीष ने उनके जीवन की सादगी को याद करते हुए कहा कि उनकी चुप्पी ही उनकी ताक़त थी। उनके लेखन में निम्न मध्यवर्गीय परिवार ही नहीं, बल्कि स्थानीय जंगल-ज़मीन और पशु-पक्षी भी हैं। उन्होंने जैसा जिया, वैसा ही लिखा भी। पुखराज जांगिड़ ने उनके लेखन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उनका साहित्य वैश्विक था और वे अपने क्राफ्ट के प्रति बेहद सजग थे। उनके लेखन में विश्वबोध की झलक थी। गोविंद मिश्र ने उनके कई संस्मरण साझा करते हुए कहा कि वे हमारे समय के ऐसे विशिष्ट रचनाकार थे जिन्होंने लाइम लाइट में आए बिना अपना उत्कृष्ट सृजन जारी रखा और अपने लेखन में, अपनी जीवन शैली को भी ढाल लिया। साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष माधव कौशिक ने 24 भारतीय भाषाओं के लेखकों की तरफ से अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि विनोद कुमार शुक्ल सही मायनों में बड़े रचनाकार थे और उन्होंने लीक से हटकर भाषा का ऐसा सर्जनात्मक फ्रेम बनाया, जिसमें हम सभी को अलग तरीके से प्रभावित किया। उनके लेखन की खिड़की हमेशा खुली रहेगी और हम सब तक उसका उजास हमेशा पहुँचता रहेगा। श्रद्धांजलि सभा के उपरांत सभी ने विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में एक मिनट का मौन रखकर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। |
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