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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026: सफलता को नए दृष्टिकोण से देखती द अनबिकमिंग

जनता जनार्दन संवाददाता , Jan 21, 2026, 9:46 am IST
Keywords: Jaipur Literature Festival 2026   Presented by Vedanta   Amer   Jaipur   जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026  
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जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026: सफलता को नए दृष्टिकोण से देखती द अनबिकमिंग जयपुर: जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में कार्तिकेय वाजपेयी की पुस्तक द अनबिकमिंग के औपचारिक लोकार्पण के साथ एक गहन, विचारोत्तेजक और आत्मचिंतनपूर्ण साहित्यिक अनुभव साकार हुआ। यह उपन्यास फेस्टिवल की फर्स्ट एडिशन श्रृंखला का हिस्सा रही। सूर्य महल की भव्य पृष्ठभूमि में आयोजित इस सत्र ने सजग और उत्सुक श्रोताओं को आकर्षित किया तथा ऐसे संवाद को जन्म दिया, जिसमें उस प्रवाह अवस्था पर सार्थक चर्चा हुई—जहाँ सहजता स्वाभाविक रूप से विकसित होती है और चेतना स्वयं कर्मों का मार्गदर्शन करती है। यह विमर्श पहचान, जीवन के उद्देश्य और आंतरिक मुक्ति की खोज जैसे गहरे विषयों तक विस्तृत हुआ।

पुस्तक का लोकार्पण माननीय जगदीप धनखड़, भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति, तथा संजय के. रॉय, फेस्टिवल निर्माता एवं प्रबंध निदेशक, टीमवर्क आर्ट्स की गरिमामयी उपस्थिति में सम्पन्न हुआ, जिसने इस क्षण को विशेष प्रतिष्ठा और प्रतीकात्मक अर्थ प्रदान किया।


पेशेवर क्रिकेट के परिवेश की पृष्ठभूमि में रची गई और पूर्वी दर्शन की गहरी अवधारणाओं से अनुप्राणित द अनबिकमिंग कर्म में निहित पूर्णता की परिभाषा तथा उस खोज में सफलता के अर्थ की यात्रा को उकेरती है। यह कथा उपस्थिति, प्रवाह, क्षणभंगुरता और सामाजिक अपेक्षाओं व स्थापित भूमिकाओं से मुक्त होने के लिए आवश्यक साहस जैसे विषयों पर गहन चिंतन करती है।एक ज्ञानवर्धक संवाद में लेखक कार्तिकेय वाजपेयी ने संजय पुगालिया के साथ पुनर्निर्माण, नेतृत्व और सार्वजनिक व्यक्तित्व तथा आंतरिक स्पष्टता के बीच नाज़ुक संतुलन जैसे विषयों पर चर्चा की। पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया के एडल्ट पब्लिशिंग ग्रुप की पब्लिशर मिली ऐश्वर्या द्वारा संचालित इस बातचीत ने साहित्य को व्यक्तिगत अनुभवों से कुशलता से जोड़ा, जिससे श्रोताओं को पेशेवर और निजी जीवन— दोनों की अनिश्चितताओं से जूझने के लिए एक गहन और सार्थक दृष्टिकोण प्राप्त हुआ।


इस मौके पर लेखक कार्तिकेय वाजपेयी ने अपने विचार रखते हुए कहा “द अनबिकमिंग सफलता को त्याग देने की अवधारणा से कहीं आगे जाती है; यह हमें उपलब्धियों की सीमाओं से परे अपने वास्तविक स्वरूप की खोज के लिए आमंत्रित करती है। यह यात्रा हमें उन पहचानों और भूमिकाओं से विरक्त होने के लिए प्रेरित करती है जिनसे हम चिपके रहते हैं, ताकि हम सजगता, जागरूकता और दूसरों की सेवा के माध्यम से अपने उद्देश्य से फिर से जुड़ सकें। कई बार ‘बनते जाने’ की निरंतर दौड़ को थामकर और ‘द अनबिकमिंग’ को अपनाने में ही हमें अपने सच्चे अस्तित्व का अनुभव होता है।”

भारतीय मीडिया में अपने दशकों लंबे अनुभव से संजय पुगलिया ने नेतृत्व को केवल पदों से परे समझने पर बल दिया। उन्होंने यह रेखांकित किया कि ईमानदारी, अनुकूलनशीलता और अनिश्चितताओं को स्वीकार करने की क्षमता ही दीर्घकालिक और सार्थक सार्वजनिक जीवन को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

संजय पुगलिया ने इस मौके पर कहा “यह किताब आज के नवयुवकों और विशेषकर जेन-ज़ी पीढ़ी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस पुस्तक में कार्तिकेय ने क्रिकेट और आध्यात्मिकता के अनुभवों के माध्यम से जीने की कला को बड़े सहज और प्रभावशाली अंदाज़ में प्रस्तुत किया है। जीवन की गति, असफलताओं से जूझने के तरीक़े, और अपने भीतर की ऊर्जा और उद्देश्य को पहचानने का जो भाव इस पुस्तक में है, वह युवा पाठकों को न केवल प्रेरित करता है बल्कि उन्हें अपने समय के प्रश्नों से संवाद करने का अवसर भी देता है”।


सत्र का समापन द अनबिकमिंग पर केंद्रित एक सार्वभौमिक ध्यान-चिंतन के साथ हुआ, जहाँ इसे किसी एक कथा के बजाय विभिन्न पेशों और पीढ़ियों में समान रूप से प्रतिध्वनित होने वाले अनुभव के रूप में देखा गया। यह अनावरण फेस्टिवल के सबसे आत्ममंथनपूर्ण क्षणों में से एक के रूप में उभरा और इसने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की उस भूमिका को पुनः रेखांकित किया—एक ऐसे मंच के रूप में, जहाँ साहित्य गहन आत्म-चिंतन और दीर्घकालिक संवाद के नए द्वार खोलता है।
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