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एल्गोरिदम, प्यार और पहचान- जेन जी के दौर की उलझनों पर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में मंथन
जनता जनार्दन संवाददाता ,
Jan 21, 2026, 9:52 am IST
Keywords: JLF 2026 जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल.Jaipur Literature Festival.Gen Z
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के अंतिम दिन चारबाग में आयोजित सत्र 'Gen Z, the Millennials and Mummyji' में डिजिटल संस्कृति के प्रभावों पर चर्चा हुई। सत्र में वक्ताओं ने बताया कि इंटरनेट और सोशल मीडिया ने लोगों को अभिव्यक्ति का मंच दिया है, लेकिन इसके साथ ही समाज में ध्रुवीकरण, भ्रम और असहमति से बचने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। पहचान अब विचारों से कम और प्रस्तुति से ज्यादा बन रही है, जबकि प्यार और रिश्ते नए माध्यमों के कारण अलग भाषा और अलग नियमों में ढल रहे हैं। सत्र में लेखक और सांस्कृतिक टिप्पणीकार अनुराग माइनस वर्मा, सामाजिक विचारक संतोष देसाई और लेखिका रिया चोपड़ा ने अपने विचार रखे। बातचीत का संचालन चिराग ठक्कर ने किया। सच, एल्गोरिदम और इको चैंबर : तथ्य भी मान्यता बनकर लौटता हैचर्चा की शुरुआत इस सवाल से हुई कि आज इंटरनेट पर हम 'सच' को कैसे देखते हैं। वक्ताओं ने कहा कि आज तथ्य इस तरह पेश किए जाते हैं कि वे धीरे-धीरे व्यक्ति की मान्यता बन जाते फिर वही मान्यता तथ्य की तरह स्थापित हो जाती है। वक्ताओं के अनुसार, इसका बड़ा कारण एल्गोरिदम है। एल्गोरिदम व्यक्ति को वही दिखाता है जो वह पहले से पसंद करता है। किसी वीडियो या विचार को पसंद करने का मतलब यह हो जाता है कि आगे भी उसी तरह की बातें दिखाई जाएंगी। यह सिलसिला इको चैंबर बनाता है, जहां व्यक्ति बार-बार अपने ही विचारों की पुष्टि देखता है। वक्ताओं ने यह भी कहा कि एआई का असर इस प्रक्रिया को और तेज करता है। एआई अगर हर बात पर सहमति जताता रहे, तो व्यक्ति धीरे-धीरे असहमति रहित दुनिया में रहने लगता है, लेकिन जैसे ही वह डिजिटल दुनिया से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया में आता है, उसे अलग राय वाले लोग मिलते हैं, अलग अनुभव मिलते हैं और सच के अलग-अलग संस्करण सामने आते हैं। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि सबसे बड़ा नुकसान यह है कि 'मैं गलत भी हो सकता हूं' या "मैं असहमत हो सकता हूं" वाली क्षमता कमजोर हो रही है। ऑनलाइन बहसों में अक्सर लोग या तो एक-दूसरे को कैंसल कर देते हैं, ब्लॉक कर देते हैं। इससे इको चैंबर और मजबूत होता है, और एक खंडित वास्तविकता बनती है, जिसे वक्ताओं ने 'फॉक्स ट्रुथ" कहा। |
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