जब मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे, साहेब का मुंह है या झूठ का छापाखाना

जब मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे, साहेब का मुंह है या झूठ का छापाखाना
चुनावी साल है, तीन राज्यों में मुंह की खाने और बुआ भतीजे के गठबन्धन के बाद 'साहेब' का बुरा हाल है।
लिहाजा झूठ और जुमलों और लफ़्फ़ाजी के साथ साहेब यानी प्रधान सेवक जनता के बीच कदरदान मेहरबान करते हुए फिर आएंगे।हालांकि पांच साल पूर्व साहेब जनता के बीच आयें तो एक मंजे हुए मदारी की तरह जनता को अपनी चिकिनी चुपड़ी बातों से खूब रिझायें। जनता भी पूरी तरह से सम्मोहित हो इनके हर बात पर ताली बजाती रही।

साहेब भी जनता को प्यार से पुचकारते हुए भाईयों बहनों कहते हुए अभी यह कर दूंगा, वह कर दूंगा, यह जादू दिखाऊंगा, उसे पकड़ लाऊंगा, इसकी जेब से नोट काला धन निकालूंगा,उसके पेट से विकास पैदा कर दूंगा।
 
साहेब से 'लल्लनटॉप मैजिक' की उम्मीद लगाई जनता सब सुनती रही देखती रही। टाइम बीतता गया तो कुछ जनता बिदकने लगी और कुछ इनके मैजिक पर सवाल खड़ी करने लगी।हद तो तब हो गयी जब जमूरे 'शाह' ने साहेब के एक मैजिक, की सबके जेब (खाते) में पन्द्रह लाख रुपये होंगे को जनता को सम्मोहित करने का 'जुमला मंत्र' बता दिया यहीं से जनता की हिप्नोटाइज हो चुकी आंखे खुलने लगी।

उसके बाद साहेब जनता को रोकने के लिए झूठ पर झूठ वाला मंत्र फूंकने जिसमें प्रमुख झूठ मंत्र--पहला झूठ-- तीन लाख करोड़ काला धन आया, मगर आरबीआई का कहना है कि मात्र पन्द्रह हजार करोड़ काला धन वापस आया।
दूसरा झूठ मंत्र--साहेब ने एक मंच से जनता को सम्बोधित करते हुए कहा छ सौ करोड़ मतदाताओ ने एक राजनीतिक पार्टी को 2014 में बहुमत दिया,जबकि भारत की आबादी ही एक सौ पच्चीस करोड़ है।

झूठ मंत्र नम्बर तीन--मगहर में संत कबीर के निर्वाण स्थली पर भाषण में कहा था कि यहां पर संत कबीर, गुरु नानकदेव और गोरखनाथ ने बैठ कर आध्यात्मिक चर्चा की थी। जबकि सबके जन्म मृत्य में सौ से दो सौ साल का अंतर है।झूठ मंत्र नम्बर चार--एक सभा में साहेब ने कहा कि भगत सिंह से जेल में मिलने कोई नही मिलने गया था ,साहेब का इशारा नेहरू की तरफ था।

जबकि सच यह है कि नेहरू ने लाहौर जेल में 8 अगस्त, 1929 को भगत सिंह और उनके साथियों से मुलाकात की थी,जो प्रशासन के दुर्व्यवहार के खिलाफ जेल में भूख हड़ताल कर रहे थे। वैसे तो साहेब के झूठ की फैक्ट्री के कई उत्पाद हैं,मगर सभी उत्पादों की लिस्ट दूँगा तो एक मॉल जितनी जगह की जरूरत होगी।फिलहाल इतना जान जाईये साहेब जब भी मुंह खोलेंगे झूठ ही बोलेंगे।

इसलिए चुनावी वर्ष है सम्भल जाईये वरना 'साहेब' झूठ की पोटली के साथ आने वाले हैं, अगर आप सतर्क हो गयें तो झोला उठाकर जाने वाले भी हैं।

# लेखक एक हिंदी साप्ताहिक अखबार के संपादक हैं, सोशल मीडिया की यह पोस्ट उनके फेसबुक वाल से लिया गया है.
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