हम जिस दौर में गुजर रहें हैं, वहां तेजी से बदल रहे हैं पत्रकारिता के मानक: शशि शेखर

श्रेष्ठ गुप्ता , Feb 13, 2017, 21:46 pm IST
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हम जिस दौर में गुजर रहें हैं, वहां तेजी से बदल रहे हैं पत्रकारिता के मानक: शशि शेखर

देश के दूसरे सबसे बड़े पुस्तक मेले यानी "पटना पुस्तक मेला" में जब एक मंच पर दो दिग्गज पत्रकार नजर आए और सवाल-जवाब का सिलसिला चला तो दर्शक दीर्घा में मौजूद लोगों ने भरपूर आनंद लिया. 'हिन्दुस्तान' के प्रधान संपादक शशि शेखर ने वरिष्ठ टीवी पत्रकार एवं साहित्यकार अनंत विजय के सवालों के खुलकर जवाब दिए. गूगल पत्रकारिता और साहित्य से जुड़े तमाम मुद्दों पर शशि शेखर ने बेबाक अंदाज में अपनी राय रखी. उसी बातचीत के कुछ अंश...

अनंत विजयः आप लिखते क्यों है? आपको लिखने से क्या मिलता हैं ?

शशि शेखर- मैं लिखने के लिए नहीं लिखता हूं, बल्कि इसलिए लिखता हूं कि मैं लिखने के लिए ही बना हूं. एक रोज मैंने चाय बनाने की सोचा और अपनी पत्नी से कहा कि आज चाय मैं बनाउंगा, यह कहकर मैं रसोई में गया. गैस की तरफ देखते हुए पहले तो देखा की इसे ऑन कैसे करूं? जब तक कुछ और करता, तब तक मेरी पत्नी ने मुझ से कहा कि आप जिस काम में माहिर हैं, वहीं करें. एक बार मैंने कश्मीर पर लिखा. वहां के जवाहर टनेल के पार घाटी को निहारते हुए सीआरपीएफ के जवानों के साथ के अनुभव पर लिखा था. मेरे एक दोस्त ने कहा, क्या लिखा है, पुलिस वाले लोगों से तमाम लोग डरते हैं. मेरा मानना है कि फर्जी या गुगल का लेखन न करें, बल्कि खुद पढ़-देख और समझकर लिखें. आशंकित जवानों से मैंने कहा, आपको मानवीय स्पर्श की जरूरत है और मैं उनका हाथ पांच मिनट के लिए पकड़े रहा और उन्होंने छुड़ाया नहीं. अब मैं इस लेख को बिना देखे, बिना महसूस किए कैसे लिख सकता था. भवानी बाबू की पंक्ति याद आ रही है, जिस तरह तू सोचता है, उस तरह तू दिख, जिस तरह तू बोलता है, उस तरह तू लिख.

अनंत विजयः गुगल पत्रकारिता को आप कितना खतरनाक मानते हैंं? क्या सोशल मीडिया का ट्रेंड ही न्यूज़रूम का एजेंडा या पत्रकारिता की दिशा तय कर रहा है? फेसबुक शेयर्स या टि्वटर टेंड्र वाली पत्रकारिता पर आपकी क्या राय है?
शशि शेखर-  मैं कोई फतवा नहीं दूंगा, क्या उचित है, क्या अनुचित है. पर हम जिस दौर में गुजर रहे हैं, वहां पत्रकारिता के मानक तेजी से बदल रहे हैं. यहां तो चुनाव जीतने की दुकान खुली हुई है, जब आपका काम दूसरे को टंगड़ी मारकर गिराना हो और ट्रेंडिग की भी बात हो, तो उसे क्या कहेंगे, नहीं पता. हालांकि, खिलाफ जाना पत्रकारिता है, धारा के साथ जाना पत्रकारिता हो या धारा के सामने खड़ा हो जाना पत्रकारिता, यह फैसला तो पत्रकारों के करना है.

अनंत विजयः जिस तरह की ट्रेंडिंग वाली पत्रकारिता हो रही है, पत्रकारिता को प्रभावित करने की कोशिश हो रही है, इस पर आपका सोचते है.
शशि शेखर-  यहां राष्ट्र और उसकी संस्कृति समाप्त हो जाती है, जहां सच बोलने वाले का पराभाव हो जाता है. यहां तो लोग ट्रेंड करावाते है, सोशल साइट्स पर प्रशंसक भी खरीद लेते हैं. मैं कई बार तारीफ से डर जाता हूं. अभी आपने प्रथम पुरूष कहा कहा, तो डर लगा. हमें अभी बहुत रास्ता तय करना है भाई. मैंने तो अभी 36 साल ही काम किया और 36 साल काम करना चाहता हूं.

अनंत विजयः मैंने कहीं सुना या पढ़ा था कि आपने कभी साहित्यिक पत्रिका या अख़बार निकालने की योजना बनाई थी?
शशि शेखर-  कभी विचार बनाया था कि एक ऐसी साहित्यिक पत्रिका, जो सच में समाज का दर्पण हो निकालनी चाहिए. लेकिन कुछ अच्छे-बुरे अनुभव भी रहे और फिर छात्र जीवन के दौरान ही 'आज' के जरिए पत्रकारिता में गया तो वापस ही निकल सका, और इस बात का अफस़ोस भी नहीं.

अनंत विजयः तो, आप पत्रकारिता को साहित्य से बेहतर मानते हैं?
शशि शेखर- साहित्य बड़ा काम है. पत्रकार सुबह दो घंटे में खत्म हो जाता है. साहित्कार पीढियों तक रहता है. चूंकि मेरे पिता जी साहित्य से जुड़े थे, तो कई साहित्कारों को मैंने करीब से जाना. उन्हें देखा तो लगा कि पत्रकार आचरण में उतना दोहरा नहीं होता, जितना अकसर मैंने साहित्यकारों को देखा है. दिल्ली में एक साहित्यकार के यहां गया तो वह शेर याद आया, 'यह भी वही काफिर सनम निकले.' मैं ख़बर को किए्रट नहीं करता, बल्कि ख़बर को कवर करता हूं.

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