'स्पेशल 26' की तरह ही है सीबीआई

'स्पेशल 26' की तरह ही है सीबीआई भारत की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई की छवि को लेकर जितनी निपुणता के साथ ‘स्पेशल 26 फिल्म’ को परदे पर लाया गया है,  वह एक उल्लेखनीय पक्ष है। संभव है कि  इसकी बोल्डनेस को प्रचारित करके यदि इस को प्रदर्षित की जाती तो इस पर संबंधित वर्ग की भौहें तन सकती थी और कोई नया विवाद खड़ा हो सकता था लेकिन बड़ी सफाई से निर्देशक और निर्माता ने एक बहुत बड़ी सच्चाई को परदे पर लाने का साहस किया है।

चूंकि यह फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है इसलिए इसके प्रस्तुतिकरण में फिक्षन का खाद मिलाने के बाद जो पौधा तैयार किया गया है वह मनोहारी है और इस बहाने यह फिल्म कई सवाल उठाती है जिनमें एक है कि अपराधियों को पकड़ने की सरकारी प्रक्रिया जितनी ढ़ीली और सुस्त क्यों है? यह फिल्म  देश की एक सच्ची घटना, जो 19 मार्च 1987 को घटी थी उस पर उससे प्रेरित है, लेकिन अपराधियों द्वारा अपराध करने की क्रिया उतनी शानदार और व्यवसायिक है कि दोनों की दक्षता में आसमान जमीन का फर्क दिखलाई देता है। जो साबित करता है कि सरकार को मूर्ख बनाना चतुर और चालाक अपराधियों के लिए कितना आसान है? उसका कारण यह हे कि अपाधी अपराध करने के लिए स्वतंत्र होते हैं जबकि सीबीआइ जैसी जांच एजेंसियों के हाथ कानून  और राजनीतिक रसूख  से बंधे होते है।
 
यह फिल्म न्यायिक प्रक्रिया के उस पक्ष पर भी करारा व्यंग्य है जिसमें कहा जाता है कि बिना प्रमाण के किसी को भी आप अपराधी साबित नहीं कर सकते।, जबतक कि आप उसके अपराध  के खिलाफ प्रमाण नहीं जुटाते तब तक वह एक शरीफ इंसान है।  न्यायिक प्रक्रिया की इस व्याख्या के अनुसार आज देश की राजनीति में लगभग 267 ऐसे अपराधियों को पुलिस सलामी देती है जिन्हें जेल की सलाखों के अंदर होना चाहिए था। इसका लाभ केवल प्रोफेशनल अपराधियों को मिलता है क्योंकि उन्हें सरकारी सुस्त प्रतिभा का पूरा अंदाजा होता है। इसलिए सीबीआई जैसी संस्था के हाथ बंधे होते है।

उदाहरण के लिए आरुषि हत्या कांड को इस आलोक में समझा जा सकता हैं। चतुर अपराधियों के सामने हमारी सीबीआई बेचारी सी दिखने लगती है। इस फिल्म की थीम ऐसी ही है। जिस तरह से सीबीआई के चरित्र को लेकर पूरे देश में बदनामी हो रही है वैसी स्थिति में यह फिल्म का उपहास जले पर नमक छिड़कता हुआ नजर आता है। यदि पिछले 30 वर्षों का रिकार्ड खंगाल कर देखें तो पता चलता है कि आंकड़ों को देखें तो जिस हिसाब से देश की इस महान संस्था ने जितने मामले दर्ज किए हैं, खास कर मंत्रियो,नेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों से सबंधित अधिकतर भ्रष्टाचार के मामलों में, असफलता मिली है। यह एक सच्चई है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता। इससे यह भी साबित होता है कि इस देश के चतुर और स्मार्ट अपराधी सीबीआई की टीम से ज्यादा चुस्त होते हैं।

यह केवल विषयवस्तु की दृष्टि से ही यह फिल्म एक खुशगवार बयार की तरह नहीं लगती है। बल्कि इसका अभिनय, लेखन और तकनीकी पक्ष भी काफी प्रभावशाली है। अभिनय पक्ष इतना सषक्त है कि कहीं से कहीं भी  अभिनय का एहसास नहीं होता बल्कि सामने जो किरदार नजर आते हैं वे बड़े जीवंत और यथार्थ हैं बड़े से बड़ा अभिनेता या छोटे से छोटा सहायक अभिनेता सभी अपने अपने चरित्रों में पगे दिक्षलाई देते है। इसके अतिरिक्त बिना किसी धुंधं के और बिना खून का एक कतरा बहाए किसी थी्रलर को बांध कर रखने की कोशिश इसकी सबसे बड़ी सफलता है जबकि इसमें न तो उबाउ नग्नता है और न किसी प्रकार का आईटम गर्ल है ओर न उसका नृत्य है।

इस फिल्म में रोमांस भी है तो सलीकेदार है और उसके गीतों का को बड़ी गंभीरता के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया गया है। इसका छायांकन ओर संपादन भी काफी जानदार हैं इस फिल्म में फलैश फॅरवार्ड तकनीक का बेहतर इस्तेमाल किया गया हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि अमीरी में सिर्फ दिखावे या पैसा खर्च करने से कोई अमीर नहीं कहलाता इसके लिए अमीरी का संस्कार भी होना चाहिए। इस हिसाब से दबंगवाजी और बासेपुर स्टाइल में बनी फिल्मों की भीड़ में यह फिल्म अपनी इस अमीरी संस्कार के कारण सबसे अलग दिखलाई देता है बिना खून खराबे ओर ठांयठांय के भी बांध कर रखने वाली थ्रीलर फिल्म भारतीय युवा फिल्म निर्देशकों को आ गया है। निर्देशक नीरज पाण्डेय की टीम जिसमें अक्षय कुमार, अनुपम खेर और मनोज बाजपेयी जैसे मंजे हुए अभिनेता हैं, प्रशंसा के योग्य है।
राधेश्याम तिवारी
राधेश्याम तिवारी लेखक राधेश्याम तिवारी हिन्दी व अग्रेज़ी के वरिष्ठतम स्तंभकार, पत्रकार व संपादकों में से एक हैं। देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख निरंतर प्रकाशित होते रहते हैं। फेस एन फैक्ट्स के आप स्थाई स्तंभकार हैं। ये लेख उन्होंने अपने जीवनकाल में हमारे लिए लिखे थे. दुर्भाग्य से वह साल २०१७ में असमय हमारे बीच से चल बसे

 
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