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क्या अंतरिक्ष में छिड़ेगी जंग? चीन बना रहा स्पेस में तैरने वाला युद्धपोत
जनता जनार्दन संवाददाता ,
Feb 04, 2026, 12:58 pm IST
Keywords: Luanniao Space Carrier हाइपरसोनिक मिसाइलों शक्ति प्रदर्शन वायुमंडल की सीमा
जिस दौर में दुनिया अभी ड्रोन और हाइपरसोनिक मिसाइलों के असर को समझ ही रही है, उसी बीच चीन ने भविष्य के युद्ध की एक ऐसी तस्वीर पेश कर दी है जो कल्पना और हकीकत की सीमा को धुंधला कर देती है. बीजिंग ने ‘लुआननियाओ’ नाम के जिस विशाल अंतरिक्ष विमान वाहक की परिकल्पना सामने रखी है, वह सिर्फ एक हथियार नहीं बल्कि आने वाले दशकों की सैन्य सोच का प्रतीक माना जा रहा है. यह परियोजना चीन के महत्वाकांक्षी ‘नांतियानमेन’ यानी ‘साउथ हेवनली गेट’ मिशन का हिस्सा है, जिसके जरिए चीन पृथ्वी के वायुमंडल की ऊपरी सीमा से पूरी दुनिया पर निगरानी रखने की क्षमता हासिल करना चाहता है. लुआननियाओ: आकार, ताकत और तकनीक का मेल चीनी सरकारी मीडिया में जारी विजुअल्स के मुताबिक लुआननियाओ एक विशाल त्रिकोणीय, ग्रे रंग का स्पेस एयरक्राफ्ट कैरियर होगा. इसकी लंबाई करीब 242 मीटर और चौड़ाई लगभग 684 मीटर बताई जा रही है, जबकि वजन करीब 1.20 लाख टन होगा. यह आंकड़े इसे आज के किसी भी आधुनिक समुद्री एयरक्राफ्ट कैरियर से कहीं बड़ा बनाते हैं. दावा है कि यह अंतरिक्ष विमान वाहक अपने भीतर 88 ‘शुआन नू’ नाम के मानवरहित लड़ाकू जेट्स ले जाने में सक्षम होगा. ये ड्रोन-जेट्स स्टील्थ तकनीक से लैस होंगे और हाइपरसोनिक मिसाइलों से हमला कर सकेंगे, जिससे दुश्मन को प्रतिक्रिया का मौका तक न मिले. क्या अमेरिका की सैन्य बढ़त को चुनौती देगा चीन? डिफेंस एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अगर लुआननियाओ जैसी प्रणाली वास्तव में अस्तित्व में आ जाती है, तो मौजूदा वैश्विक डिफेंस स्ट्रक्चर पूरी तरह बदल सकता है. विशेषज्ञ पीटर लेटन के अनुसार, ऐसा प्लेटफॉर्म सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों और पारंपरिक फाइटर जेट्स की पहुंच से बहुत ऊपर होगा. यह सीधे लक्ष्य के ऊपर जाकर हमला कर सकता है, जिससे चीन को ताइवान और साउथ चाइना सी जैसे संवेदनशील इलाकों में अमेरिका पर रणनीतिक बढ़त मिल सकती है. चीन का तेजी से बढ़ता रॉकेट और सैटेलाइट इंफ्रास्ट्रक्चर पहले ही वॉशिंगटन की चिंता बढ़ा चुका है. तकनीकी हकीकत या सिर्फ दिखावटी शक्ति प्रदर्शन? हालांकि इस भव्य कल्पना को लेकर संदेह भी कम नहीं हैं. कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी विशाल संरचना को वायुमंडल की सीमा पर टिकाए रखने के लिए जिस प्रोपल्शन सिस्टम और ईंधन तकनीक की जरूरत होगी, वह फिलहाल दुनिया के किसी भी देश के पास नहीं है. इसे कक्षा में पहुंचाने के लिए स्पेसएक्स जैसी री-यूजेबल सुपर हेवी रॉकेट तकनीक चाहिए, जिसमें चीन को अभी लंबा सफर तय करना है. कुछ जानकार इसे चीन का एक रणनीतिक ‘प्रोपेगेंडा प्रोजेक्ट’ भी मानते हैं, जिसका मकसद तकनीकी बढ़त से ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना है. साउथ हेवनली गेट मिशन का बड़ा एजेंडा लुआननियाओ अकेला प्रोजेक्ट नहीं है. ‘साउथ हेवनली गेट’ मिशन के तहत चीन छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों जैसे ‘बैदी’ पर भी काम कर रहा है, जो अंतरिक्ष के बेहद करीब जाकर ऑपरेट कर सकते हैं. 2024 के विमानन मेले में इनका मॉडल दिखाकर चीन ने साफ संकेत दिया था कि वह पारंपरिक युद्ध सीमाओं से आगे निकलना चाहता है. कई विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घोषणाएं चीन की घरेलू जनता में गर्व पैदा करने और पड़ोसी देशों पर रणनीतिक दबाव बनाने का जरिया भी हैं. सपनों से हकीकत तक का सफर भले ही लुआननियाओ आज एक दूर की कल्पना लगे, लेकिन चीन के हालिया अंतरिक्ष मिशन यह दिखाते हैं कि उसके सपने सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं हैं. 2024 में ‘चांग-ई-6’ मिशन के जरिए चंद्रमा के सुदूर हिस्से से नमूने लाकर चीन ने इतिहास रच दिया था. अब ‘चांग-ई-7’ मिशन के तहत चांद पर पानी की तलाश की तैयारी चल रही है. जहां अमेरिका की अंतरिक्ष रफ्तार कुछ धीमी नजर आती है, वहीं चीन लगातार नई उपलब्धियां जोड़ रहा है. भविष्य की जंग का संकेत लुआननियाओ को हकीकत बनने में भले ही 20 या 30 साल लग जाएं, लेकिन इस कॉन्सेप्ट ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य की जंग जमीन और समुद्र तक सीमित नहीं रहेगी. अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक खोज का क्षेत्र नहीं, बल्कि सामरिक शक्ति का नया मैदान बनता जा रहा है. चीन की यह परिकल्पना आने वाले समय में वैश्विक सैन्य संतुलन पर गहरा असर डाल सकती है. |
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