शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के 102वें जन्मदिन पर गूगल ने बनाया डूडल

शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के 102वें जन्मदिन पर गूगल ने बनाया डूडल नई दिल्ली: सर्च इंजन गूगल ने शहनाई के जादूगर प्रख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के 102वें जन्मदिन के मौके पर डूडल बनाकर श्रद्धांजलि दी है. गूगल के होमपेज पर बने इस डूडल को चेन्नई के कलाकार विजय कृष ने बनाया है. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को किसी परिचय की जरूरत नहीं हैं. उन्होंने देश-दुनिया में शहनाई वादन को एक नया मुकाम दिलाया.

बिस्मिल्लाह खान ताउम्र मस्तमौला रहे और उन्हें फक्कड़ी में जिंदगी जी. लेकिन उनकी शहनाई का जादू कभी कम नहीं हुआ. यही वजह रही कि उनकी 102वीं जयंती पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें याद किया है. गूगल ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की 102वीं टाइटल से डूडल क्रिएट किया है.

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की जिंदगी काफी दिलचस्प रही है. उस्ताद ने संघर्ष भी देखा लेकिन हर पल को भरपूर जिया भी.  उस्ताद बिस्मिल्लाह खान शहनाई के जादूगर थे और उनकी शहनाई ने उन्हें बुलंदियों पर पहुंचाया. यह बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का ही जादू था कि उन्हें 2001 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

बिस्मिल्लाह खान की शहनाई हमारे आजादी के जश्न का अहम हिस्सा रही और इसके बिना हमारा जश्न हमेशा अधूरा रहा. लता मंगेशकर पर किताब लिखने वाले राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता यतींद्र मिश्र ने 'सुर की बारादरी' में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के साथ कई दिलचस्प बातें की हैं और उनके अनुभव भी साझा किए हैं. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के बचपन से लेकर जवानी तक के ये किस्से बहुत ही मजेदार हैं, और कमाल के हैं. बिस्मिल्लाह खान के बारे ऐसा ही एक किस्सा इस किताब से यहां दिया जा रहा हैः

"वे अपनी जवानी के दिनों को याद करते हैं. वे अपने रियाज को कम, उन दिनों के अपने जुनून को अधिक याद करते हैं. अपने अब्बाजान और उस्ताद को कम, पक्का महाल की कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी वाली दुकान व गीता बाली और सुलोचना को ज्यादा याद करते हैं. कैसे सुलोचना उनकी पसंदीदा हीरोइन रही थीं, बड़ी रहस्यमय मुस्कराहट के साथ गालों पर चमक आ जाती है...

" जैसे-जैसे अमीरूद्दीन (उस्ताद का बचपन का नाम) जवान होता गया, सुलोचना के प्रति उसका शौक भी जवान होता गया. इधर सुलोचना की नई फिल्म सिनेमाहॉल में आई और उधर अमीरूद्दीन अपनी कमाई लेकर चला फिल्म देखने, जो बालाजी मंदिर पर रोज शहनाई बजाने से उसे मिलती थी. एक अठन्नी मेहनताना. उस पर यह शौक जबरदस्त कि सुलोचना की कोई नई फिल्म न छूटे और कुलसुम की देसी घी वाली दुकान. वहां की संगीतमय कचौड़ी. संगीतमय कचौड़ी इस तरह क्योंकि कुलसुम जब कलकलाते घी में कचौड़ी डालती थी, उस समय छन्न से उठने वाली आवाज से उन्हें सारे आरोह-अवरोह दिख जाते थे."

बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च 1916 में हुआ था. उनके नाम के पीछे भी एक अनोखी कहानी है. कहा जाता है कि उनके जन्म के समय उनके दादा जी ने अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हुए 'बिस्मिल्लाह' कहा और उनका नाम बिस्मिल्लाह पड़ गया.

बहुत कम उम्र में ही उन्होंने ठुमरी, छैती, कजरी और स्वानी जैसी कई विधाओं को सीख लिया था. बाद में उन्होंने ख्याल म्यूज़िक की पढ़ाई भी की और कई सारे राग में निपुणता हासिल कर ली.

देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न पाने वाले वह तीसरे क्लासिकल म्यूज़िशयन रहे. साल 1968 में उन्हें पद्म भूषण, 1980 में पद्म विभूषण और 1961 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया था. उस्ताद ने 14 साल की उम्र में सार्वजनिक जगहों पर शहनाई वादन शुरू कर दिया था. हालांकि, 1937 में कोलकाता में इंडियन म्यूज़िक कॉन्फ्रेंस में उनकी परफॉर्मेंस से उन्हें देशभर में पहचान मिली. 1938 में लखनऊ में ऑन इंडिया रेडियो की शुरुआत उनके लिए बड़ा ब्रेक साबित हुई. इसके बाद उनकी शहनाई को अक्सर रेडियो पर सुना जा सकता था. खान ने एडिनबर्ग म्यूज़िक फेस्टिवल में भी परफॉर्म किया था, इससे उन्हें दुनिया में ख्याति मिली.

आजादी के तुरंत बाद, महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू जैसी शख्सियतों के सामने शहनाई बजाने वाले वह पहले भारतीय शहनाई वादक थे. 21 अगस्त 2006 में उनकी मृत्यु हो गई. इसके साथ ही देश ने शहनाई के अपने लाल और काशी के मंदिरों ने शहनाई का वह सुर हमेशा के लिए खो दिया.
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