प्रज्ञायोग सहज किन्तु अत्यंत लाभदायी

प्रज्ञायोग सहज किन्तु अत्यंत लाभदायी हरिद्वारः योग ग्रन्थों में कई तरह के योगों का वर्णन मिलता है. ज्ञानयोग, कर्मयोग, हठयोग, राजयोग, प्राणयोग, स्वरयोग, सूर्ययोग, नादयोग, बिन्दुयोग, कुण्डलिनी योग आदि योगों के बारे में विस्तार से बताया गया है. इन्हीं में से एक सरल सुगम किन्तु अत्यन्त प्रभावशाली योग है-प्रज्ञायोग. यह वह योग है, जिसके बिना संसार का कोई भी कार्य नहीं चलता।

संसार के जितने भी ऊंचे दर्जे के उल्लेखनीय कार्य हैं, जिनको प्रखर प्रतिभा सम्पन्न मनस्वी पुरुषों ने सम्पन्न किया है, वे सब प्रज्ञा के बल से ही हुए हैं. बुद्धि जब परिष्कृत हो जाती है तो अत्यन्त प्रखर बन जाती है. मन, बुद्धि, चित्तादि अन्त:करण जब निर्मल हो जाते हैं तो इन्हीं के संयुक्त परिष्कृत रूप प्रज्ञा के रूप में परिलक्षित होते हैं. ऐसी ही प्रज्ञा से योग की भूमिका सम्पन्न होती है.

प्रज्ञायोग क्या है? पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा है- प्रज्ञायोग में ज्ञान, कर्म, भक्ति की तीनों शक्तियां शामिल हैं, जिन्हें लक्ष्मी, सरस्वती और काली कहते हैं. ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों का इसमें समावेश है. जागृत प्रज्ञा वालों में इन तीनों ही शक्तियों के प्रभाव प्रस्फुटित होते देखे गए हैं. इसे विवेक जागरण का अभ्यास भी कहा जा सकता है. इसे आत्मबोध, तत्वबोध की साधना भी कहा जा सकता है.

प्रज्ञायोग कैसे करें? पूज्य आचार्य जी ने कहा है कि इसे चारपाई पर बैठे-लेटे किसी भी समय किया जा सकता है। इसे सोने-जागने के समय भी किया जा सकता है. जब सवेरे जागें तो बिस्तर से उठने से पहले ही यह विचार करें कि हमारा नया जन्म हुआ है। आज हम नया जन्म ले रहे हैं। विचार कीजिए कि आज का उपयोग हम अच्छे से अच्छा करेंगे। आज के दिन को हम बेकार नहीं जाने देंगे। यह इस योग का एक भाग हुआ.

दूसरे भाग का अभ्यास रात को सोते समय करें। जब सोने जाएं, तब विचार करें कि आज का जन्म, आज का दिन खत्म हुआ। अब हम भगवान की गोद में जा रहे हैं। आज की बातों की समीक्षा करें कि हमने कोई गलती तो नहीं की। अगर की तो उसका सुधार-परिमार्जन कैसे होना चाहिए, इस पर चिन्तन करें.

यह क्रम नित्य का होना चाहिए. प्रात: जागरण के साथ एक योग और रात में सोने के समय बिस्तर पर ही एक योग करें। प्रात:कालीन योगाभ्यास को आत्मबोध साधना और रात्रिकालीन योगाभ्यास को तत्त्वबोध साधना भी कहा जाता है। परन्तु अब तक विचार भर हुआ है, कर्म नहीं। विचार करने को ज्ञान कहते हैं और काम करने को कर्म कहते हैं। जब ये दोनों ज्ञान और कर्म एक साथ होते हैं, विचार कर्म के रूप में परिणत होते हैं, तभी योग की भूमिका प्रस्तुत होती है। केवल कहने-सुनने से ही योग नहीं बनता, करना भी होता है.

कर्म करने से फल मिलता है. कुछ करें तो परिणाम पैदा हो. केवल जानने या बात करने भर से कुछ नहीं होता. प्रात: जागरण, रात्रि शयन या जो भी समय हो, अभ्यास करने से ही फल होगा. यह योग प्रज्ञा से संबंधित इसलिए है क्योंकि इसका पूरा अभ्यास बौद्धिक चेतना पर आधारित है. अन्तर्निरीक्षण इसका प्रथम सोपान है। अन्तर्निरीक्षण के लिए अन्तर्चक्षु की आवश्यकता है और प्रज्ञायोग अन्तर्चक्षु को जागृत और विकसित करने का सरल तथा प्रभावी साधन है.

इस योग-विधा को प्रज्ञायोग-व्यायाम के अभ्यास के साथ करने से ज्यादा फलदायी होती है। प्रज्ञायोग-व्यायाम किसी भी जानकार गायत्री साधक से सीखा जा सकता है. यह सूर्य नमस्कार की तरह ही योगासनों का एक आवर्तन है.

आज विश्व भर में योग के प्रति रुचि बढ़ रही है। 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का निर्धारण इसी जन-रुचि का प्रमाण-परिणाम कहा जा सकता है। इस अवसर पर जो लोग कठिन योग-साधनों का अभ्यास न कर पाएं, वे सहज सुलभ प्रज्ञायोग का अभ्यास करके समग्र स्वास्थ्य का लाभ उठा सकते हैं। यह हर धर्म, संप्रदाय, जाति, आयु वर्ग के स्त्री-पुरुष आसानी से कर सकते हैं और स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ आत्मिक सुख का आनन्द उठा सकते हैं.
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