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बॉलीवुड बच्चों को नजरंदाज कर रहा है : नंदिता दास

बॉलीवुड बच्चों को नजरंदाज कर रहा है : नंदिता दास

मुम्बई: अगर आप अपने बच्चे के साथ एक बाल फिल्म देखना चाहते हैं तो आपको उसके लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ेगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारतीय सिनेमा उद्योग की बच्चों पर आधारित फिल्में बनाने में अब कोई दिलचस्पी नहीं रही है।

यह कहना है अभिनेत्री और चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी ऑफ इंडिया (सीएफएसआई) की अध्यक्ष नंदिता दास का।

अगले साल 100 साल का होने जा रहे बॉलीवुड में हर साल लगभग 1,000 फिल्मों का निर्माण होता है लेकिन नंदिता का कहना है कि इन फिल्मों में बच्चों की फिल्मों की संख्या बहुत कम होती है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि 'आई एम कलाम','स्टेनली का डब्बा' और 'चिल्लर पार्टी' जैसी फिल्में आई-गई साबित नहीं होंगी और इनसे बॉलीवुड में एक नए चलन की शुरूआत होगी।

उन्हें लगता है कि अगर फिल्म निर्माता बाल फिल्मों को नजरअंदाज करना बंद कर दें तो यह देश के बच्चों के लिए एक बहुत बड़ा तोहफा होगा।

दास ने कहा, निर्माता 'राउडी राठौर' जैसी फिल्में बना कर बच्चों का मनोरंजन तो करते हैं लेकिन उन्हें आयु वर्ग का भी ध्यान रखना चाहिए।

उन्होंने कहा, कैसे एक ही फिल्म छह साल, 16 साल और 60 साल के आयुवर्ग वालों को एक साथ आकर्षित कर सकती है। अगर उन्हें लगता है कि बच्चों को बाल फिल्में देखने का मौका मिलना चाहिए और यह तभी होगा जब ऐसी फिल्में बने और प्रदर्शित हों।

अभिनेत्री ने कहा, बाल फिल्मों की खस्ता हालत का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि सीएफएसआई अभी तक 250 बाल फिल्में बना चुकी है लेकिन अभी तक इनमें से एक भी फिल्म व्यावसायिक तौर पर प्रदर्शित नहीं हुई है।

42 साल की इस अभिनेत्री ने बताया सीएसएफआई अपनी फिल्म 'गट्टू' को पहली बार व्यावसायिक रूप से रिलीज करने जा रही है। यह फिल्म पतंगबाजी के शौकीन एक बच्चे की इच्छाओं और सपनों पर आधारित है।

उन्होंने बताया कि सीमित बजट होने के कारण 'गट्टू' के निर्माण और प्रचार का काम बेहद चुनौती भरा था।

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