नमन राष्ट्रपिता! क्या महात्मा गांधी को कोई गोली मार सकती है?

नमन राष्ट्रपिता! क्या महात्मा गांधी को कोई गोली मार सकती है? नई दिल्ली: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आज 73वीं पुण्यतिथि है. साल 1948 में आज ही के दिन इस महान आत्मा के भौतिक शरीर की एक सिरफिरे आतताई ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. यह और बात है कि महात्मा गांधी इससे मरे नहीं. वे और उनके विचार आज भी जिंदा हैं, हमेशा रहेंगे.

महात्मा की लोकप्रियता आज देश और दुनिया के पार है. वह दुनिया के हर उस व्यक्ति के, लोगों के दिलों में, सत्य में, अहिंसा में, सत्याग्रह में, भाई-चारे में जीवित हैं. दुनिया भर में जब भी मानवता, बराबरी और इंसाफ की, इंसानियत की बात होती है, गांधी हमेशा अमर रहेंगे.

यही कारण है कि महात्मा गांधी की पुण्यतिथि को शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है. इस दिन महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देने के लिए देशभर में कई सभाएं आयोजित की जाती है. साथ ही राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित देश के कई गणमान्य नागरिक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए भी जाते हैं.

महात्मा गांधी का नाम ना केवल भारतीय जनमानस में बल्कि पूरी दुनिया में स्थायी छाप की तरह मौजूद है. 13 जनवरी 1948 को उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता बनाए रखने और साम्प्रदायिक उन्माद के खिलाफ कलकत्ता में आमरण अनशन शुरू किया था. ये उनके जीवन का आखिरी अनशन था.

18 जनवरी, 1948 को अपना अनशन खत्म करने के ठीक 11 दिन बाद 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई. अपनी हत्या से तीन दिन पहले ही गांधीजी दिल्ली में शांति लाने के उद्देश्य से महरौली स्थित कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी दरगाह गए थे. उस समय दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा में जल रही थी. दरगाह छोड़ने से पहले गांधीजी ने लोगों की एक बड़ी सभा को संबोधित करते हुए सांप्रदायिक सद्भाव और एकता का संदेश दिया था.

हत्या वाले दिन 30 जनवरी 1948 को हमेशा की तरह महात्मा गांधी तड़के साढ़े तीन बजे उठे थे. सुबह उठकर उन्होंने प्रार्थना की, दो घंटे काम किया और छह बजे फिर सोने चले गए. आठ बजे गांधीजी दोबारा उठे, सुबह की ताजा खबरें पढ़ी, ब्रजकृष्ण ने उनकी तेल से मालिश की. फिर गांधीजी नहाने चले गए. नहाने के बाद उन्होंने बकरी का दूध, उबली सब्जियां, टमाटर और मूली खाई. साथ में संतरे का रस भी पिया. इसी समय पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में गांधीजी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे अब भी गहरी नींद में थे.

धीरे-धीरे दिन ढल गया. शाम चार बजे के करीब वल्लभभाई पटेल अपनी बेटी के साथ गांधीजी से मिलने पहुंचे. शाम पांच बजे के बाद तक उनसे मंत्रणा करते रहे. उधर, सवा चार बजे के आसपास गोडसे और उसके साथियों ने कनॉट प्लेस के लिए एक तांगा किया. वहां से फिर उन्होंने दूसरा तांगा किया और बिरला हाउस से 200 गज पहले उतर गए.

पांच बजकर दस मिनट पर पटेल और गांधीजी की बातचीत खत्म हुई. इसके बाद गांधी जी शौचालय गए और फिर फौरन ही प्रार्थना वाली जगह की ओर चल दिए. मौजूदगी से बेखबर महात्मा गांधी आभा (गांधी की प्रार्थना सभाओं में भजन गाती थीं) और मनु (महात्मा गांधी की दूर की रिश्तेदार) से बात करते हुए प्रार्थना स्थल की तरफ जा रहे थे. इसी दौरान बाईं तरफ से नाथूराम गोडसे गांधी जी तरफ झुका. मनु को लगा कि वह गांधी के पैर छूने की कोशिश कर रहा है. आभा ने कहा कि उन्हें पहले ही देर हो चुकी है. इसी बीच गोडसे ने मनु को धक्का दिया जिससे उनके हाथ से माला और पुस्तक नीचे गिर गई.

मनु पुस्तक उठाने के लिए नीचे झुकीं तभी गोडसे ने पिस्टल निकाली और एक के बाद एक तीन गोलियां गांधीजी के सीने और पेट में उतार दीं. आभा ने गिरते हुए गांधी के सिर को अपने हाथों का सहारा दिया. महात्मा गांधी हमेशा-हमेशा के लिए ये दुनिया छोड़कर चले गए.

शायद आपको मालूम ना हो कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सबसे प्रसिद्ध हस्ती महात्मा गांधी को इससे पहले भी पांच बार मारने की कोशिश हुई थी. मगर हत्या का जोखिम होने के बावजूद उन्होंने इसकी चिंता नहीं की और हमेशा दूसरों की सुरक्षा के बारे में चिंतित रहे.

मशूहर पत्रकार और सिविल राइट्स एक्टिविस्ट्स तीस्ता सीतलवाड़ द्वारा संपादित ‘Beyond Doubt: A Dossier on Gandhi's Assassination’ में सभी पांच हत्या के प्रयासों का दस्तावेजीकरण हैं. ये किताब साल 2015 में प्रकाशित हुई थी.

आर्काइव सबूतों के अनुसार पुणे में पहली बार गांधी जी की हत्या का प्रयास हुआ. यहां वो भाषण देने के लिए पहुंचे थे कि तभी षड्यंत्रकारियों ने एक कार में बम धमाका किया जिसमें बापू थे. उनके सचिव प्लारेलाल ने अपनी किताब 'महात्मा गांधी: द लास्ट फेज' में लिखा है कि इस साजिश के चलते निर्दोष लोगों की मौत होने पर बापू को कितना दुख हुआ.

महात्मा गांधी की हत्या के पांच प्रयासों में से तीन में गोडसे शामिल था. दूसरी बार हत्या की कोशिश महाराष्ट्र के पंचगनी में हुई जब गांधी जी को आराम करने की सलाह दी गई क्योंकि प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने उनके विरोध में नारेबाजी करते हुए हंगामा किया. जवाब में गांधी ने प्रदर्शनकारियों के लीडर नाथूराम गोडसे को चर्चा के लिए बुलाया जिसे खारिज कर दिया गया. बाद में प्रार्थना सभा के दौरान गोडसे को खंजर के साथ राष्ट्रपिता की तरफ भागते हुए देखा गया. सौभाग्य से मणिशंकर पुरोहित और सतारा के भिलारे गुरुजी ने उसे पकड़ लिया. दोनों ने कपूर आयोग के समक्ष इस हमले के बारे में गवाही भी दी थी.

हिंदू महासभा गांधी और जिन्ना की मुलाकात के खिलाफ थी. गोडसे और एलजी थट्टे ने गांधी जी को मुंबई सभा में जाने से रोकने के लिए आश्रम को चुना. यहां आश्रम के लोगों ने गोडसे को पकड़ लिया जब उसने गांधी जी पर हमला करने की कोशिश की थी.

महात्मा गांधी की हत्या का एक और प्रयास तब हुआ जब वो ट्रेन से पुणे की यात्रा कर रहे थे. ट्रेन पटरियों पर रखे पत्थर की चलते दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी हालांकि ड्राइवर के कौशल के चलते ज्यादा हानि नहीं हुई. इसमें गांधी सुरक्षित बच गए थे.

इस दिन बिड़ला भवन में एक बैठक के दौरान महात्मा गांधी की हत्या की फिर साजिश रची गई. मदनलाल पाहवा, नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे, दिगंबर बैज, गोपाल गोडसे और शंकर किस्तैया ने हत्या को अंजाम देने के लिए बैठक में भाग लेने की योजना बनाई थी. वो मंच पर बम और फिर गोली चलाने वाले थे. मगर सौभाग्य से इस योजना को अमल में नहीं लाया जा सका क्योंकि मदनलाल को पकड़ लिया गया.
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