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'साहित्य और पर्यावरण' पर 'रेखना मेरी जान' के संदर्भ में रत्नेश्वर सिंह और मनीषा कुलश्रेष्ठ की खास चर्चा

'साहित्य और पर्यावरण' पर 'रेखना मेरी जान' के संदर्भ में रत्नेश्वर सिंह और मनीषा कुलश्रेष्ठ की खास चर्चा नई दिल्लीः राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के सौजन्य से आयोजित विश्व पुस्तक मेला अपने शबाब पर है. पुस्तक प्रेमियों और लेखकों, प्रकाशकों के लिए यह किसी कुंभ से कम नहीं. चारों ओर बस किताबें ही किताबें. बाजार, शोहरत और प्रशंसकों की भरमार के बीच कहीं परिचर्चा, कहीं लोकार्पण, तो कहीं अपने प्रिय लेखक से पाठकों की मुलाकात.  प्रगति मैदान के पुनरोद्धार प्रक्रिया के बीच इतने भव्य पुस्तक मेले के आयोजन के लिए न्यास के अध्यक्ष बल्देवभाई शर्मा को बधाई दी जानी चाहिए.

पढ़ाकू और विद्वत लोगों के इसी मजमें के बीच एक दिन हमारे समय के तमाम सर्वाधिकों में से एक प्रखर आलोचक, साहित्यकार, वाचक और लिक्खाड़ अनंत विजय जी का फोन आया कि दस तारीख को मुझे पुस्तक मेले के लिए खाली रहना है. क्यों? इसकी खबर मिली प्रख्यात लेखक रत्नेश्वर सिंह की फेसबुक पोस्ट से. पता चला मुझे विश्व पुस्तक मेला के लेखक मंच से 'साहित्य और पर्यावरण' विषय पर बहुचर्चित उपन्यास 'रेखना मेरी जान' के विशेष संदर्भ में उपन्यास के लेखक रत्नेश्वर सिंह और लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ से होने वाली बातचीत का विषय प्रवर्तन करना है.

मेरी नजर में दोनों ही वर्तमान दौर के बेहद सशक्त लेखक हैं, और मैं....मरता क्या न करता....जो बोलना था, लिखकर ले गया...जो लिखा था, वह यह हैः

'साहित्य और पर्यावरण' विषय पर आज के संवाद में शामिल होने वाले हमारे दौर के विशिष्ट लेखक श्री रत्नेश्वर सिंह जी और लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ जी के साथ आप सबका स्वागत करते हुए मुझे अत्यंत खुशी है. पर अपने विषय पर बोलने से पहले मैं राष्ट्रीय पुस्तक न्यास और उसके अध्यक्ष श्री बल्देव भाई शर्मा का आभार व्यक्त करूंगा कि उन्होंने विश्व पुस्तक मेले की थीम 'पर्यावरण' पर केंद्रित की और इस विषय को साहित्यकार, लेखकों और पाठकों के बीच संवाद का केंद्र बनाया. पर्यावरण, जो हमारे चारों तरफ है, धरती, हवा, पानी, आसमान, हमारा जीवन भी…..गोस्वामी जी ने कहा था, ‘क्षिति-जल-पावक गगन समीरा, पंचतत्व यह अधम शरीरा’….पर जो अनमोल था, अनमोल है, और रहेगा, उसे ही हमने बेमोल कर दिया…मेरा सौभाग्य है कि आप सब जैसे इतने स्वनामधन्य गुणी लेखकों, पाठकों और श्रोताओं के बीच मुझे 'साहित्य और पर्यावरण' विषय पर आज के संवाद की शुरुआत करने के लिए कहा गया.

यह विषय जब पहली बार मेरे सामने आया तो जो कुछ मैंने साहित्य, पर्यावरण और प्रकृति को लेकर पढ़ा है, बहुत जोर डालने पर जो रचनाएं मेरे दिमाग में कौंधी, वे प्रारंभिक कक्षाओं में पढ़ी कुछ कविताएं थीं, जिनमें से कुछ का जिक्र मैं यहां करूंगा. संभवतः पहली या दूसरी कक्षा की एक रचना थी 'उठो लाल अब आंखें खोलो, पानी लाई हूं मुंह धो लो, बीती रात कमल दल फूले, इनके ऊपर भंवरे झूले, चिड़िया चहक रही पेड़ों पर, आसमान में लाली छाई....'  शायद पांचवीं कक्षा में पढ़ा था,  'हठकर बैठा चांद एक दिन माता से यह बोला, सिलवा दो मां मुझे ऊन को मोटा एक झिगोला, सन-सन करती हवा रात भर जाड़े में मरता हूं, ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह से यात्रा पूरी करता हूं.'  मैं यह नहीं जानता कि यहां मौजूद हमारे समवयस्कों को छोड़ कितनों ने ऐसी या इससे मिलती जुलती रचनाएं पढ़ी हैं. अगर मैं इसमें 'मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है,' या अंग्रेजी कविता 'ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार' को जोड़ भी लूं  तो भी इनकी गिनती दहाई तक नहीं पहुंचा पाया. तो ऐसा क्या मेरी कम-पढ़ता के चलते हुआ. शायद हां भी, और शायद नहीं भी. इसी शायद का जवाब है, ‘रेखना मेरी जान’, जिसके संदर्भ में पर्यावरण और साहित्य को लेकर आज का संवाद रखा गया है. यह पुस्तक अपनी सहज, सरल भाषा और विशिष्ट कथानक के बूते पर्यावरण, प्रकृति और समाज को हमारे दिमाग में पिरो देती है.

वैसे भी हमारे देश में प्रकृति चित्रण की सुदृढ़ परम्परा रही है, जो अकारण नहीं है. प्रकृति और मानव का सम्बन्ध उतना ही पुराना है जितना कि सृष्टि के उद्भव और विकास का इतिहास. प्रकृति की गोद में ही प्रथम मानव शिशु ने आँखें खोलीं और उसी की गोद में खेलकर बड़ा हुआ. हमारे विकास और विज्ञान के सारे पैमाने इसी प्रकृति के बूते ही गढ़े गए. मानव और प्रकृति के इस अटूट सम्बन्ध की अभिव्यक्ति भारतीय धर्म, दर्शन, साहित्य और कला में चिरकाल से होती रही है. साहित्य मानव जीवन का प्रतिबिम्ब है, और उस प्रतिबिम्ब में उसकी सहचरी प्रकृति का प्रतिविम्बित होना स्वाभाविक है. शायद इसीलिए विश्व के प्राचीनतम उपलब्ध साहित्य- ‘ऋग्वेद’ में उषा, सूर्य, मरुत, इंद्र आदि की अलौकिक शक्तियों को मानवी -क्रिया- कलाप के साथ केवल इसलिए चित्रित किया गया कि प्रकृति और पर्यावरण से हमारी एका हो सके. अब आप कह सकते हैं कि जब इतना प्रचुर साहित्य उपलब्ध है तो मेरे दिमाग में वह समूचा पर्यावरणीय साहित्य क्यों नहीं घूमा, जिसमें अद्वितीय ऋतु वर्णन और बेमिसाल उपमाएं मौजूद हैं. इसकी वजह शायद इस साहित्य की दुरुहता और गद्य पर पद्य का प्रभावी होना भी हो सकता है.

हमारे संस्कृत और हिंदी साहित्य में प्रकृति चित्रण की विशेष परम्परा रही है. प्रकृति, पर्यावरण, प्रेम और आस्था को लेकर वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ भरे पड़े हैं. भारतीय काव्य का हर काल प्रकृति चित्रण से लबालब रहा है. चाहे आदि काल रहा हो, भक्तिकाल, रीति काल या आधुनिक काल प्रकृति हर दौर में अपने संपूर्ण सौंदर्य में विद्यमान रही. कालीदास, वाल्मीकि, वेदव्यास, अब्दुर्रहमान, बब्बर, चंद बरदाई, विद्यापति, मलिक मोहम्मद जायसी, केशव, बिहारी, सेनापति, देव, पद्माकर, महाकवि माघ, जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी से लेकर अज्ञेय तक समूचे हिन्दी काव्य में प्रकृति अपनी समूची हलचल के साथ विद्यमान  है, पर क्या आज रचे जा रहे साहित्य को लेकर भी हम यह दावा कर सकते हैं. शायद नहीं. जबकि वर्तमान पश्चिमी साहित्य, कथा, कहानियां इस विषय से भरी पड़ी हैं. तो क्या साहित्य के लिए पर्यावरण अबूझ विषय हो गया? या आज के मानव को इस पर विचार करने की जरूरत नहीं?

हम सभी जानते हैं कि श्री रत्नेश्वर सिंह जी हमारे दौर के सर्वाधिक शक्तिशाली हस्ताक्षर मंन से एक हैं. उनसे संवाद करने वाली प्रख्यात लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ जी से भी आप सब बखूबी परिचित हैं. रत्नेश्वर जी अपनी किताब 'रेखना मेरी जान' के लिए' पौने दो करोड़ का करार करने से पहले ही अपनी कई बेस्ट सेलर किताबों की रचना से देश भर में चर्चित रहे हैं, फिर भी ‘रेखना मेरी जान’ ने इनकी शोहरत के सारे कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए तो इसकी वजह है…. मुझे यह कहने में कत्तई संकोच नहीं कि 'रेखना मेरी जान' पढ़ते समय आपको यह किताब बेशकीमती मालूम होगी. किसी शब्दचित्र, इतिहास और साइंस फिल्म की तरह यह आपको आर्कटिक से बंगलादेश तक, प्रेम से बिछोह तक, अमीरी से गरीबी तक, निर्माण से ध्वंस तथा साइंस से प्रकृति और मानवीय संवेदना से जोड़ती है.  

'एक दिन की जिंदगी' से शुरू पहले अध्याय से आखिरी इक्कीसवें अध्याय 'सुमोना...सुमोना' तक, इस किताब को पढ़ते समय न जाने कितनी बार मुझे लगा जैसे 'दिल ने धड़कना ही बंद कर दिया हो' कितनी बार मैंने ‘मुश्किलों की सवारी', की और इसके पात्रों की जीवनयात्रा से गुजरते हुए कब 'किसका सीना किसका पांव' से होते हुए 'क्या अपना और क्या पराया' की मानसिकता से गुजरकर 'बर्फ की आगोश में’ भी 'पतनोत्थान का नव संगीत' सुनाई देने लगा, पता ही न चला. मैंने अभी जो विशेषण इस्तेमाल किए, वे सब ‘रेखना मेरी जान’ के अध्याय हैं. वाकई इन सबकी कोई कीमत है क्या? शायद नहीं. ये अनमोल हैं. हमारी धरती, प्रकृति व पर्यावरण की तरह, जो हमारे जन्म लेने के साथ हमें मुफ्त तो मिलती है, पर जिसे किसी भी कीमत से खरीदा नहीं जा सकता. रत्नेश्वर जी इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने प्रकृति और पर्यावरण से भी आगे बढ़कर ग्लोबल वार्मिंग जैसे दुरूह विषय पर लिखा.

अंत में रीतिकालीन कवि केशवदास के इस दोहे से मैं अपनी बात समाप्त करता हूं-
    देस, नगर, बन, बाग, गिरि, आश्रम, सरिता, ताल।  
    रवि, ससि, सागर, भूमि के भूषन, रितु सब काल॥
आप सबने इतने धैर्य से मुझे सुना, धन्यवाद.
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इन लिखी बातों में से कितनी मैंने वहां कही, याद नहीं, पर मनीषा कुलश्रेष्ठ जी द्वारा जिज्ञासु के अंदाज में की गई चर्चा और श्री रत्नेश्वर सिंह द्वारा दिए गए उत्तरों से वह मध्याहन बेहद शानदार गुजरा. रत्नेश्वर जी ने न केवल इस उपन्यास के लेखन से पूर्व आठ सालों के अपने लंबे अध्ययन और शोध का खुलासा किया बल्कि यह भी बताया कि इनदिनों वह पानी पर काम कर रहे हैं. उनके अनुसार जाति, धर्म, संबंध, देश, राजनीति, कूटनीति, सैन्यनीति और ज्ञान-विज्ञान से कहीं ज्यादा जरूरी है इस धरती और कायनात की चिंता, जिस पर कल और आज नहीं, अभी से काम शुरू किया जाना चाहिए. मनीषा कुलश्रेष्ठ जी का कहना था कि हममें से हर एक को धरती मां का कर्ज उतारना चाहिए. हमें यह सोचना चाहिए कि यह धरती हमें इतना कुछ देती है, बदले में हम इसे क्या देते हैं. कम से कम हममें से हर व्यक्ति साल में एक पौधा भी लगाए तो हम कुछ हद तक धरती माता के कर्ज की भरपाई कर सकेंगे. वाकई, धरती पर संकट कितना बड़ा है, इसे आप सब 'रेखना मेरी जान' पढ़कर ज्यादा समझ सकेंगे.  

इस चर्चा के दौरान कई चर्चित साहित्यिक हस्तियां और साहित्य प्रेमी मौजूद थे, जिनमें खासतौर पर गीता श्री, आराधना आशीष प्रधान, सुनीता शानू, सुजाता शिवेन, मनोज कामदेव, हरीश पाठक, सीमा सरीन, श्वेता झा का नाम उल्लेखनीय है. लेखक पत्रकार अरविंद कुमार सिंह और लालित्य ललित ने तो चर्चा को अपने संचालन और सुझावों से और भी महत्त्वपूर्ण बना दिया.
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