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मानस मीमांसाः अथ रुद्राष्टकम्- चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं

मानस मीमांसाः अथ रुद्राष्टकम्- चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं कानपुरः 'हरि अनंत हरि कथा अनंता' की तर्ज पर प्रभु चरित का कोई आदि, अंत नहीं... त्रेता, द्वापर, सतयुग, कलयुग के कालचक्र में अध्यात्म के अनगिन पाठ के बीच प्रभु के कितने रंग, रूप, कितने अवतार, कितनी माया, कैसी-कैसी लीलाएं, और उन सबकी कोटि-कोटि व्याख्या.

गोसाईं जी का श्री रामचरित मानस हो या व्यास जी का महाभारत, कौन, किससे, कितना समुन्नत? सबपर मनीषियों की अपनी-अपनी दृष्टि, अपनी-अपनी टीका...

इसीलिए संत, महात्मन, महापुरूष ही नहीं आमजन भी इन कथाओं को काल-कालांतर से बहुविध प्रकार से कहते-सुनते आ रहे हैं. सच तो यह है कि प्रभुपाद के मर्यादा पुरूषोत्तम अवताररूप; श्री रामचंद्र भगवान के सुंदर चरित्र करोड़ों कल्पों में भी गाए नहीं जा सकते. तभी तो प्रभु के लीला-चरित्र के वर्णन के लिए साक्षात भगवान शिव और मां भवानी को माध्यम बनना पड़ा.

राम चरित पर अनगिन टीका और भाष उपलब्ध हैं. एक से बढ़कर एक प्रकांड विद्वानों की उद्भट व्याख्या. इतनी विविधता के बीच जो श्रेष्ठ हो वह आप तक पहुंचे यह 'जनता जनार्दन' का प्रयास है. इस क्रम में मानस मर्मज्ञ श्री रामवीर सिंह जी की टीका लगातार आप तक पहुंच रही है.

हमारा सौभाग्य है कि इस पथ पर हमें प्रभु के एक और अनन्य भक्त तथा श्री राम कथा के पारखी पंडित श्री दिनेश्वर मिश्र जी का साथ भी मिल गया है. श्री मिश्र की मानस पर गहरी पकड़ है. श्री राम कथा के उद्भट विद्वान पंडित राम किंकर उपाध्याय जी उनके प्रेरणास्रोत रहे हैं. श्री मिश्र की महानता है कि उन्होंने हमारे विनम्र निवेदन पर 'जनता जनार्दन' के पाठकों के लिए श्री राम कथा के भाष के साथ ही अध्यात्मरूपी सागर से कुछ बूंदे छलकाने पर सहमति जताई है. श्री दिनेश्वर मिश्र के सतसंग के अंश रूप में प्रस्तुत है, आज की कथाः

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अथ रुद्राष्टकम्-
तुषाराद्रिसंकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटिप्रभा श्रीशरीरं।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगंगा लसद्भालवालेन्दु कंठे भुजंगा।।

उत्तरकांड, मानस, भगवान शिव की स्तुति, अनुपम
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हिमाचल के समान गौर-वर्ण के, करोणों कामदेवों के समान, सौन्दर्य-शीर्ष भगवान शिव की स्तुति के बीच गांभीर्य शब्द-प्रयोग सोद्देश्य है। भगवान शिव अपने समस्त क्रियाकलापों से मिथ्या-प्रदर्शन के बजाय, अखंड-सत्य का साक्षात्कार कराते हैं।

विवाह की मांगलिक बेला में उनके गणों द्वारा किया जाने वाला उनका श्रृंगार, शिव की तात्त्विक-दृष्टि के अनुरूप था--
सिवहिं संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौर सँवारा।।
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन विभूति पट केहरि छाला।।
ससि ललाट सुन्दर सिर गंगा। नयन तीन उपवीत भुजंगा।।
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव वेष सिवधाम कृपाला।।
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसह चढ़ि बाजहिं बाजा।।

सामान्यतः पुष्पों से लेकर स्वर्ण मणियों तक के मौर विवाह में प्रयुक्त होते देखे जाते हैं, जिन्हें बाद में विवाह के उपरान्त “नदी सिरावत मौर” के रूप में भी अभिब्यक्त किया गया है। भगवान शिव के गणों को बताया गया था कि दूल्हे का मुख्य चिह्न उनके सिर पर धारण करने वाला मौर है। शिव गणों को लगा कि मौर के निर्माण में किसी बाह्य वस्तु के प्रयोग की आवश्यकता ही क्या है? शिव तो निरंतर सर्पों को ही आभूषण के रूप में धारण करते हैं, तो क्यों न उन सर्पों को ही मौराकृति प्रदान कर दी जाय? सर्पों के द्वारा निर्मित आभूषण, अद्भुत दृश्य उपस्थित कर रहे थे।

दूल्हे की झाँकी दर्शनीय थी। जब यह अद्भुत वारात नगर में पहुँची तो जहाँ भगवान विष्णु को देखकर, नगरवासी
आह्लादित हुए, वहीं-
सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे।।

स्वगतकर्त्ता जिन वाहनों पर आरूढ़ होकर आए थे, वे भाग खड़े हुए। यदि कोई दूसरा वर होता, तो इस पूर्वाभास से सावधान हो जाता। शिव क्षण भर में स्वयं को “कोटि कंदर्प कमनीय” के रूप में परिणत कर सकते थे। किन्तु वे जीवन के यथार्थ स्वरूप, जीवन-दर्शन का साक्षात्कार कराने के लिए, दृढ़-प्रतिज्ञ थे। जीवन के यथार्थ से भागकर, कल्पित लोक में रहने वाला, शिव की दृष्टि में बाल-बुद्धि का है।

बाल-बुद्धि से प्रेरित होकर हिमांचल और मयना, उन्हें अपनी श्रद्धारूपा पार्वती अर्पित करें, यह शिव को स्वीकार नहीं है। वे चाहते हैं कि जीवन के यथार्थ को समझकर ही, श्रद्धा समर्पित की जाय। जीवन, मृत्यु, ऐश्वर्य, दरिद्रता, सौन्दर्य व वीभत्सता में एकरस रहने वाली श्रद्धा ही श्रद्धापद की अधिकारिणी है।

मयना ने यह समझ कर स्वयं को भुलावा देने की चेष्टा की थी कि शिव संसार में चाहे जिस रूप में आते हों, विवाह की मांगलिक बेला में हमारे समक्ष एक भिन्न रूप में आयेंगे। किन्तु उनकी कल्पनायें चकनाचूर हो गयीं। वे रोष में देवर्षि को ही बुरा भला कहने लगीं। शिव चुपचाप जनवासे में चले गये, यह सोचकर कि बुद्धि रूपिणी मयना जब सत्संग से परिष्कृत होकर श्रद्धा को समर्पित करेगी, तभी कार्य पूर्ण होगा। सारे देवता विचलित हो गये, किन्तु अंत में शिव की धारणा ही सत्य निकली। यही सौन्दर्य-गांभीर्य है। जिसकी अभिब्यक्ति मात्र शिव के “सत्यं, शिवम्, सुन्दरम्” से ओतप्रोत ब्यक्तित्त्व के द्वारा ही लोक में संभव,दृष्टिगत होती है।

भगीरथजी का प्रयास तभी सफल हुआ, जब उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने ब्रह्म-कमंडल से निःसृत, विष्णु-पदी गंगा को अपनी जटाओं में आधार-भूमि दिया। गोस्वामीजी ने रामकथा की तुलना, रामभक्ति की तुलना, इसीलिए गंगा से की।

रामभगति जहँ सुरसरि धारा।
राम कथा मंदाकिनी, चित्रकूट चित चारु।।
धन्य धन्य गिरिराज कुमारी। तुम समान नहिं कोउ उपकारी।।
पूछेहु रघुपति कथा प्रसंगा। सकल लोक जगपावनि गंगा।।

भगवान शिव के विषय में लिखा गया कि-
काल ब्याल कराल भूषणधरं गंगा शशांकप्रियम्।।

और भगवान शिव से संयुक्त होकर दूषण भी भूषण हो जाते हैं--
बन्दे बोधमयं नित्यं गुरुम् शंकररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोपि चंद्रः सर्वत्र वंद्यते।।

मानस में सर्प को विविध दुर्गुणों का प्रतीक माना गया है। किन्तु भगवान शिव के धारण करने के कारण वह भी धन्य हो गया। शिव का आभूषण ही सर्प है। भगवान शिव विविध प्रकार के सर्पों को अपने शरीर पर धारण करते हैं, जैसा आपने उनके वैवाहिक-श्रृंगार की पंक्तियों में ऊपर देखा था। “कुंडल”के रूप में वे छोटे सर्प को धारण करते हैं, तो बड़े सर्प को “कंकण” के रूप में। ”मौर”के रूप में यह आवश्यक था कि वह फणवाला हो। ”यज्ञोपवीत” के रूप में वे लंबा विशाल सर्प धारण करते हैँ। आध्यात्मिक परिपाटी में प्रत्येक सर्प की ब्याख्या देखें।

कान में धारित सर्प ‘संशय’ का प्रतीक है। सर्प भले ही छोटा क्यों न हो, उसकी विषाक्तता कम नहीं होती। माना जाता है कि सर्प के बच्चे और भी जहरीले होते हैं। संशय भले ही अत्यंत छोटा हो, यदि वह एक बार ब्यक्ति को डस लेता है, तो उसका परिणाम अनर्थकारी ही होता है। पक्षिराज गरुण, जिनका आहार ही सर्प है, भुसुंडिजी के समक्ष अपना संशय, इसी रूप में रखते हैं--
संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता।दुखद लहरि कुतर्क बहुब्राता।।

भगवान शंकर की पत्नी सती ही संशयग्रस्तता की एक प्रमाण हैं। सती यदि शिव की अर्धांगिनी हैं, तो पक्षिराज गरुण, भगवान विष्णु के पार्षद हैं। इसी से संशय सर्प की भयानकता सिद्ध होती है। किन्तु उसी सर्प को भगवान शिव कान में कुण्डल के रूप में धारण करके, यह बताते हैं कि भगवत-कथा श्रवण करने वाले के लिए, संशय, दूषण न होकर भूषण है।

हाथ में कंकण के रूप में धारण किये जाने वाला सर्प “लोभ” का प्रतीक है। लोभ से प्रेरित होकर जब कोई अर्थ-संग्रह करता है, तो यह कहा जाता है कि वह दोनों हाथों से धन बटोर रहा है। यदि ब्यक्ति एक हाथ से ले और दूसरे से दे, तो लोभ की बृत्ति में संतुलन आयेगा।किन्तु यदि केवल लेना ही सीखे और देने की बृत्ति उसमें
न हो, तो यह लोभ का सबसे विकृत रूप है। भगवान शिव इस लोभ-सर्प को भी भूषण बना देते हैं। क्योंकि वे दोनों हाथों से देते रहते हैं।

सिर पर “मौर” के रूप में दिखाई देने वाला सर्प, ”काम-सर्प” है। साधारणतया संसार में, जब काम ब्यक्ति के सिर पर सवार होता है, तब उसकी बुद्धि में जड़ता आ जाती है, और वह ज्ञान-वैराग्य से शून्य, पूरी तरह अंधा हो जाता है--
मदन अंध ब्याकुल सब लोका।निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका।।
किन्तु जब शिव पर काम का आक्रमण होता है, तो अंधत्व की बात तो दूर, उनकी तृतीय दृष्टि और खुल जाती है--
तब सिव तीसर नयन उघारा।चितवत काम  भयउ जरि छारा।।

ध्यान की स्थिति में जब नेत्र मुँद जाते हैं, तब उसका उद्देश्य भीतर देखना होता है, अंतःकरण में ईश्वर का साक्षात्कार होता है और भगवान शिव के हृदय में तो भगवान राम की दिब्य छवि थी--
संकर सोइ मूरति उर राखी।

अतः काम का उनके हृदय में प्रविष्ट होने का कोई प्रश्न ही नहीं। उनकी दृष्टि के समक्ष अनित्य काम टिक ही नहीं सकता। फिर भी भगवान शंकर ने जब विवाह की लीला रची, तो उन्होंने शोभा के रूप में काम-सर्प को सिर पर धारण कर लिया, क्योंकि विवाह के देवता तो काम ही हैं और जहाँ मस्तक से निकलकर गंगा की अविरल भक्ति-धारा प्रवाहित हो रही हैं, वहाँ काम-सर्प अनर्थकारी कैसे हो सकता है।

हृदय पर यज्ञोपवीत के रूप में धारण किया हुआ सर्प “भयावह-काल” का प्रतीक है। जिसके हृदय में कालातीत भगवान राम विद्यमान हैं, उसे काल का भय कैसा?
कालव्यालकरालभूषणधरं।
इस तरह भगवान शिव, जिनके श्रीविग्रह पर सुशोभित दुर्गुणों के प्रतीक सर्प, दूषण भी भूषण बन जाते हैं, उनकी मैं स्तुति करता हूँ।

आगे की पंक्तियाँ --

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं,
प्रसन्नानं नीलकंठं दयालं।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं,
प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।4॥

उत्तरकांड, मानस, भगवान शिव की स्तुति-विशिष्ठ, श्लाघ्य।

------विद्वज्जन! विगत  संप्रेषण में था कि भगवान शिव, कान में कुण्डल के रूप में संशय-सर्प को धारण करके यह बताते हैं कि भगवत-कथा श्रवण करने वाले के लिए संशय कोई दोष नहीं उत्पन्न कर सकता। यहाँ गुरुदेव, “चलत्कुंडलं” के माध्यम से कहते हैं कि भगवत्कथा का श्रवण निरंतर, निर्बाधित गति से चलता रहे। महर्षि बाल्मीकि भगवान के रहने के स्थान में प्रथम स्थान के लिए कहते हैं--

जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।
श्रीमद्भागवत् में प्रह्लादजी ने कहा है--
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद सेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।।
इसमें भी श्रवण-भक्ति को प्रथम स्थान दिया गया है।

श्रीमद्भागवत् में वर्णन आता है कि भगवान ने सोचा कि जीव के भीतर प्रवेश करने के लिए कोई दरवाजा तो दिखाई देता नहीं, अतः “ब्रज के माखन-चोर” ने सोचा कि सेंध लगाने के लिए कोई जगह है क्या? और तब उनकी दृष्टि अचानक कान पर गयी। उन्हें लगा कि सेंध लगाने के लिए, यह छेद बहुत बढ़िया है। और तब भगवान कथा के रूप में कान के मार्ग में पैठ कर, भक्त के हृदय में पहुँच जाते हैं और भक्त के अंतःकरण में जितने मल/विकार आदि हैं, उनको चुराकर ले जाते हैं--
“प्रविष्टः कर्णरंघ्रैण स्वानाम् भक्त सरोरुहम्।
घुनोत्य समलं कृष्ण सलिलस्य यथा शरत्।।

इस प्रकार भगवान का कथा रूप जो श्रीविग्रह है, उसका हमारे भीतर प्रवेश करने का मुख्य मार्ग है, कान। यह हमारा यथामति प्रवाह है। इस शब्द से अनेक भाव निकलते हैं।

भ्रूसुनेत्रं विशालं----भगवान शिव के सुन्दर भृकुटी सहित सुन्दर त्रिनेत्रों की स्तुति के संबंध में विद्वान् श्रीशर्माजी का भाव स्तुत्य है। भगवान शिव, योग, ज्ञान, वैराग्य-निधि हैं।
तुम्ह पुनि राम दिन राती। जपहु सदा अनंग आराती।।

रामनाम तो सूर्य, चंद्र, अग्नि का कारण-सृजक है--
बन्दउँ राम नाम रघुबर के।हेतु कृसानु भानु हिमकर के।।

इसीलिए शिव के तीनों नेत्र, सूर्य, चंद्र, अग्नि के प्रतीक हैं। तृतीय नेत्र जो अग्नि-ताप के गुणों से युक्त है, वह विध्वंसक है। उसके समक्ष ही “राम” और “काम” की परीक्षा होती है। अनित्य-काम उसके समक्ष भस्म हो जाता है। वही काम जब राम का आश्रय ग्रहण कर, राम-विवाह के समय, उनका अश्व बनता है, तो भगवान शंकर के सभी पन्द्रह नेत्रों को भगवान राम, अतिप्रिय लगते हैं। गुरुदेव भगवान शिव का आवाहन शिष्य पर अनुकूल होने के लिए करते हैं कि प्रभु जिस प्रकार आपने--
काम जारि रति कर बर दीन्हाँ। अति उपकार कृपानिधि कीन्हाँ।।
साँसति करि पुनि करहु पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर इहइ सुभाऊ।।
उसी प्रकार भुसुंडि पर कृपा करें।

प्रसन्नाननं ------सच्चिदानंद शिव सदा नित्यानंद-मग्न रहते हैं। इस स्तुति का अन्त ही ”प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।” वाक्य से किये जाने के मूल में उनके-प्रसन्नतापूर्ण स्वभाव की स्मृति दिलाना है। गोस्वामीजी ने इस स्तुति को “रुद्राष्टक”की संज्ञा दी, ”शिवाष्टक” नहीं लिखा, क्योंकि रुद्र शब्द उग्रता/ क्रोध का प्रतीक है, जिसका अर्थ होता है- “रुलाने वाला”। अतः गुरुदेव की स्तुति भगवान को उनके “शिवत्त्व-स्वरूप” में लाने के लिए थी, ताकि उनके शिष्य पर नित्य-प्रसन्न- शिव ,कल्याण-दृष्टि डालें। भगवान शिव तो सभी देवताओं से पहले प्रसन्न होने वाले देवाधिदेव हैं-

आषुतोस तुम्ह अवढर दानी।। आरति हरहु दीन जन जानी।।

नीलकंठं दयालं -------जब समुद्र-मंथन से विष निकला, तो देवताओं ने भगवान विष्णु से पूछा, इस विष का क्या करना है?

जरत सकल सुर बृन्द,विषम गरल जेहिं पान किय।
भजसि न तेहिं मतिमंद,को कृपालु संकर सरिस।।

भगवान विष्णु ने कहा कि शंकरजी को जाकर पिला दो। जब भगवान विष्णु से देवताओं ने पूछा- ऐसा क्यों? तब उन्होंने कहा कि एक बार समुद्र का मंथन और भी हुआ था और उस मंथन में जो अमृत निकला था, उसे शंकरजी ने अकेले पी लिया था। इसलिए मैं सोच रहा हूँ कि वे जब अकेले अमृत पी गये, तो विष भी अकेले पान करें। लोगों ने जानना चाहा कि वह कौन सा समुद्र-मंथन था?

रामायण में लिखा हुआ है कि वेद हैं समुद्र और एक बार ऋषियों, मुनियों तथा देवताओं ने वेद-समुद्र का मंथन किया--
ब्रह्मांभोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाब्ययम्।

वेदों के समुद्र मंथन के उपरान्त उसमें से वेद-मंत्र निकले। और ऋषियों, मुनियों, देवताओं ने मंत्रों का बँटवारा कर लिया। जो कर्मकांडी मुनि थे, उन्होंने कर्मकांड के यज्ञों के मंत्र ले लिए। जो ज्ञानी थे, उन्होंने वेदान्त के मंत्र ले लिए। पर अंत में उस मंथन में “रामनाम” भी निकला था। ऋषियों ने सोचा कि बड़े बड़े मंत्र तो ठीक हैं। भला इन दो अक्षरों का क्या महत्त्व है? वस्तुतः वे बेचारे पहचान नहीं पाए कि अमृत तो यही है, सार यही है। परन्तु शंकरजी ने कहा- भाई! सारा वेद आप लोग ले जाइए। बस ये दो अक्षर, मुझे दे जाइए। इतना कहकर शंकरजी
ने दो अक्षरों के रामनाम को उठाकर मुख में धारण कर लिया--
श्रीमचछम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा।

इसीलिए भगवान विष्णु ने कहा कि उस दिन अमृत अकेले पी गये थे, अब विष ले जाओ। परीक्षा भी हो जायेगी कि पहले जो अमृत पिया था, वह प्रभावशाली है कि अब जो विष पी रहे हैं। शंकर जी मूर्तिमान विश्वास हैं। उन्होंने पूछा कि यह दुख भेजा किसने? बताया गया कि भगवान विष्णु ने तो वे तुरन्त जहर पी गये, परन्तु
उस विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। जब किसी ने उनसे पूछा कि संसार को जला देने वाले विष से आप बच कैसे गये?

भगवान शिव ने कहा, इसमें मेरा कोई चमत्कार नहीं है। क्योंकि “रामनाम” पहले से था और जब लोग विष लेकर आए, तो मैंने “विष” में “राम” मिला दिया, तो “विश्राम” बन गया। इस प्रकार भगवान नीलकंठ से गुरुदेव ने उनका आवाहन किया कि नीलकंठ-प्रभु! मेरे शिष्य पर अपनी विशालता का परिचय देते हुए उसे श्राप से मुक्ति दो।

मृगाधीशचर्माम्बरं, मुण्डमालं। ----------रामायण में कहा गया कि जगज्जननी श्रीसीताजी का हृदय बड़ा कोमल है। गहराई से मारीच के स्वर्ण-मृग के प्रसंग को देखें।श्रीसीताजी ने यह नहीं कहा कि यह मृग बड़ा सुन्दर है, अपितु वे कहती हैं कि--
सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुन्दर छाला।।

मृग नहीं बल्कि मृग का चमड़ा सुन्दर है। इसी वाक्य में सारा रहस्य छिपा है। यह मृग, ब्यक्ति के मन का प्रतीक है। और मन की तरह इस मृग में भी चंचलता विद्यमान है। यही हमारे आपके जीवन का भी अनुभव है। मन को दुष्ट कहें या प्रेमी? तो इसका उत्तर यही है कि जब इसमें कपट छल आता है, तो लगता है इससे बड़ा कोई दुष्ट नहीं है और जब प्रभु की ओर अभिमुख होता है, तब लगता है इससे बढ़कर कोई प्रेमी नहीं है।

इस चंचल मन रूपी मारीच को जब श्रीसीताजी देखती हैं तो उनके मन में करुणा उत्पन्न होती है। और तब वे करुणा भरे हृदय से प्रभु से अनुरोध करती हैं कि जो श्रेष्ठ मन वाले हैं, उनको तो आप मिल ही जाते हैं, लेकिन जो बेचारा मोह के बंधन में पड़ा हुआ है, उसके प्रति भी तो आप करुणा का परिचय दीजिए।

और “आनहु चर्म कहति बैदेही।” का सांकेतिक अभिप्राय यही है कि जब यह चमड़ा हो जायेगा, तभी सुन्दर बनेगा। क्योंकि जब तक मृग है, भागता ही रहेगा।। इसलिए चमड़ा बन जाने का अभिप्राय है कि जब मन चंचलता से शून्य हो जाय। मृग में रक्त भरा हुआ है, पर चमड़ा रक्त रहित है। रक्त से शून्य हो जाने का अर्थ है कि मन में जो राग की बृत्ति है, वह मिट जाये। और जब चंचलता मिट गयी, राग मिट गया, तब उसका उपयोग अत्यंत श्रेष्ठ कार्य में हुआ।

वर्णन आता है कि भगवान राम लंका में जब सुबैल शैल पर गये तो लक्ष्मणजी ने वही मृगचर्म प्रभु को बैठने के लिए दिया। जो मन कभी रागी था, जब उसका राग और चंचलता समाप्त हो गयी, तब वही मन आज प्रभु का आसन बन गया। वैराग्य-निधि भगवान शिव भी मृगचर्म ही वस्त्र के रूप में धारण करते हैं।

मुण्डमालं ---भगवान शिव जिसे बहुत चाहते हैं, उसी का मुंडमाल अपने हृदय पर धारण करते हैं। यही भाव छिपा है, शर्माजी ने इसे स्पष्ट कर दिया है। ऐसे सर्वेश सर्वप्रिय भगवान शिव का मैं गुरुदेव के साथ आराधन करता हूँ। वे दयालु आप सभी पर निरंतर कृपा करें. आज बस यहीं तक---

नमन सबहिं।
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