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जागीरदार की लोकभक्ति

जागीरदार की लोकभक्ति लोग-बाग एक भ्रष्ट जागीरदार से बहुत परेशान थे। उन्होंने किसी तरह उसे हटाया और एक ऐसे व्यक्ति को अपना जागीरदार चुन लिया, जो देशभक्ति और लोकभक्ति की बहुत बातें किया करता था।

लोगों ने अपने पैसे से नए जागीरदार को एक बहुत सुंदर कुमैत घोड़ी भी खरीदकर दे दी। जागीरदार को गांव-गांव घूमने का बड़ा शौक था। वह अचकन-वचकन लगाता और पगड़ी-वगड़ी लगा तुर्रा निकाल अड़ोस-पड़ोस होता हुआ दूरदराज निकल जाता। अगर वह कहीं नहीं जाता तो अपने गांव में ही घोड़ी को दौड़ाता रहता।

नया जागीरदार एक दिन अपनी घोड़ी को गांव के चारों ओर दौड़ा रहा था। एक चबूतरे की चट्‌टान से टकराकर घोड़ी गिर पड़ी। जागीरदार भी औंधे मुंह गिरा। घोड़ी ने कुछ देर बाद दम तोड़ दिया।

गांव के लोग एकत्र हो गए। जागीरदार ज़ोर-ज़ोर से कराह रहा था। यह देख लोग उसके प्रति सहानुभूति दिखाने लगे। लोगों ने समझा, घोड़ी मर गई, इसलिए जागीरदार दुखी है। वे देशभक्तिमय सहानुभूति भाव से बोले  : साहब, इतने रुपए में दूसरी खरीद लेना। कराहते क्यों हो? जागीरदार ने कहा : लेकिन इतने पैसे आएंगे कहां से?

देशभक्ति में सराबोर गांववासियों ने कहा : आप भी जागीरदार साहब, क्या कमाल करते हो! पांच सौ रुपए में नई घोड़ी आ जाएगी और हम आपको यह रुपए एकत्र करके अभी दे देते हैं। यह भी कोई बड़ी बात है!

जागीरदार की सांस में सांस आती दिखी तो जागीरदार के भक्तों ने देशभक्ति के नारे शुरू कर दिए।

जागीरदार ने कराहते हुए कहा : मैं अभी पिछली यात्रा में एक अरबी घोड़ा देखकर आया था। वह पांच हजार में मिलेगा। अब पांच सौ वाली घोड़ी तो चलते-चलते मर जाती है। और फिर आपकी भी तो इज्जत है कुछ दुनिया में।

भक्तिभाव में डूबे लोगों ने कहा : क्यों नहीं, क्यों नहीं। आप ले लीजिए। और सबने पांच हजार रुपए एकत्र कर जागीरदार को दे दिए।

जागीरदार ने एक अबलक रंग का एक ताकतवर अरबी घोड़ा खरीद लिया। घोड़ा हिनहिनाता तो पूरी जागीर की रगों में शौर्यशाली लहू दौड़ने लगता।

कुछ समय बीता। और लोग सोचने लगे कि ज़मीन के लगान का वक्त आएगा तो जागीरदार वसूली में हिसाब बराबर कर लेगा। खुश हुआ तो ब्याज भी दे देगा। लगान का वक्त आया। लोगों ने सोचा : जागीरदार खुद ही बोल देगा। लेकिन नहीं बोला तो लोगों ने आग्रह किया, महाराज, कृपा करो।

जागीरदार ने भृकुटियां तानीं और बोला : कैसी कृपा! मेरी घोड़ी तो तुम्हारे गांव का चक्कर लगाते हुए मरी थी। ऐसे में उसकी कीमत अदा करना तुम्हारा कर्तव्य था। फ़र्ज़ था। देश का कुछ सोचते हो कि नहीं! मैं घर-बार-परिवार छोड़कर ये सदा तुम लोगों की खातिर इस अरबी घोड़े की पीठ पर चढ़ा रहता हूं। कुछ मेरे भी त्याग की फ़िक्र है कि नहीं?

लोग चौंके। हतप्रभ। करें तो क्या करें। वे सोच ही रहे थे कि एक और वज्रपात हो गया। जागीरदार के लोग नया फ़रमान लेकर आ गए।

लोगों ने पूछा : ये क्या है?
जागीरदार के लोग बोले : नया लगान!
लोगों ने कहा : ये कैसा लगान भाई?
जागीरदार के लोगों ने कहा : इस लगान का नाम है घुड़-पड़ी लगान!

लोगों ने चौंकते हुए कहा : घुड़-पड़ी लगान? ये तो पहली बार सुना भाई।

जागीरदार के लोगों ने तर्क दिया : अबे समझ नहीं आता क्या! आप लोगों के चबूतरे से टकराकर घोड़ी पड़ी थी कि नहीं? इसलिए घोड़ी पड़ने पर घुड़ पड़ी लगान! लोगों  का माथा घूम गया!

लोग बहुत विचलित और परेशान हुए। किसी ने कहा : तर्क से कुछ तो जागीरदार मानेगा। उसी से मिलते हैं।

लोगों ने जागीरदार से काफी अनुनय-विनय किया, लेकिन जागीरदार टस से मस नहीं हुआ। वह बोला : देखो, तुम लोगों ने आज तक बहुत हराम का कमाया और खाया है। मैं तुमसे वह सब वसूल करके ही रहूंगा। तुम मुझे जानते नहीं हो!

लोगाें ने कहा : साहब, आपको 5000 रुपए देकर अरबी घोड़ा भी खरीद कर दे दिया। अब क्या बाकी रह गया? घोड़ी तो आपकी महज 500 रुपए की थी।

जागीरदार एक बार हंसा और अगली बार रोने लगा : बोला, तुम मेरी देशभक्ति पर संदेह करते हो! देखो, अगर वह घोड़ी तुम लोगों के कारण मरी नहीं होती तो हर साल 500 रुपए का बछेड़ा देती। अब बताओ, मेरा 500 रुपए का सालाना नुकसान हुआ कि नहीं?

लोगों ने कुछ ज्यादा तर्क वितर्क किया तो जागीरदार ने कड़क आवाज़ में कहा : मैं तुम्हारी सब चोरियां जानता हूं। सारा हिसाब करके दम लूंगा। और वह तो घोड़ी थी। अब मेरे पास अरबी घोड़ा है। यही तुम पर कुदवाऊंगा और हिसाब चुकता करूंगा। यह  सुनकर लोगों ने जागीरदार साहब की देशभक्ति और त्याग के नारे लगाए और अब वे सब खुशी-खुशी हर साल 500 रुपए लाग देते हैं! इसे घुड़-पड़ी लगान या टैक्स का नाम दिया जाता है।

# वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन की फेसबुक वाल से साभार.
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