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हिन्दी को कोई रोक नहीं सकता: सऊदी अरब के हिन्दी सेवी मोहम्मद इस्माइल

हिन्दी को कोई रोक नहीं सकता: सऊदी अरब के हिन्दी सेवी मोहम्मद इस्माइल मोहम्मद इस्माइल मूलतः हैदराबाद, आन्ध्र प्रदेश से हैं। 24 वर्षो से सऊदी अरब स्थित भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय विद्यालय, दम्माम में हिन्दी विभाग से जुड़े हैं जिसमें 19,000 हजार छात्र हिन्दी पढ़ते हैं। यह विद्यालय भारतीय राजदूतावास के अधीन संचालित होता है। सऊदी अरब में हिन्दी भाषा की सेवा करने के लिए आपको 10वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में 'विश्व हिन्दी सम्मान' से सम्मानित किया गया है।  खाड़ी देशों में हिन्दी की स्थिति और भविष्य पर उनसे बातचीत किया श्याम नन्दन ने...

प्रश्न-    हिन्दी शिक्षण से ही जुड़े हैं या कुछ रचनाएं भी की हैं?

उत्तर-   रचनाएँ मैने की हैं। मेरी ज्यादातर रचनाएं प्रकाशित नही हो पाई हैं। बचपन से मेरा शौक रहा है, कविताएं लिखना, बाल साहित्य में विशेष रूप से। कक्षाओं में पढ़ाने के लिए और हमारी सभ्यता, संस्कृति से सम्बन्धित जैसे- ’मीठे बोल’, ’परिश्रम का फल’, ’हकीकत और जिन्दगी’ ये मेरी कुछ प्रकाशित रचनाएं हैं। हम, हर वर्ष एक पत्रिका प्रकाशित करते है जिसमें बच्चों, अध्यापकों, छात्र-छात्राओं द्वारा रचित कविताएं कहानियां, चुटकुले छपते हैं। इस पत्रिका में हिन्दी का भी एक विभाग होता है जिसमें छात्र अपनी रचनाशीलता दिखाते हैं, लिखते हैं। बहुत कुछ लिखा जाता है।

प्रश्न-    सऊदी अरब में लोग भारत के प्रति क्या सोच रखते हैं?

उत्तर-    भारत के लो्गों को बहुत मेहनती मानते हैं। बहुत आदर करते हैं। वहाँ सबसे मेहनती और सबसे अधिक वहाँ के कानून का पालन करने वाले भारतीय ही माने जाते हैं। वहाँ पर मजदूरों में सबसे ज्यादा संख्या भारतीय मजदूरों की है और शिक्षित लोगों में भी भारतीयों की संख्या ज्यादा है। वहाँ की स्थानीय जनता का किसी से विरोध नहीं है, सबका सम्मान करते हैं। शान्तिप्रिय मुल्क है। अगर आप अपने काम से काम रखें तो आपका जीवन बहुत सुखी रहता है। इसी के कारण हम आज 24 साल से वहीं रह गए। वहाँ बहुत अच्छा मेलजोल का माहौल है। वहाँ के लोग भारत का, और भारतीय सभ्यता का सम्मान करते हैं।

प्रश्न-    हिन्दी भाषा के प्रति क्या मनोभाव है?

उत्तर-    वहाँ शुद्ध हिन्दी नहीं है। भारत के अन्य भाषा क्षेत्रों से जाने वाले लोग भी है इसलिए वहाँ अवधी, भोजपुरी का असर हिन्दी पर है। वहाँ उर्दू मिश्रित अर्थात हिन्दुस्तानी भाषा भी बोली जाती है और हाँ यदि उर्दू मिश्रित हिन्दी बोली जाए, तो दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिन्दी बन जाएगी। वहाँ तो दुकानदार भी अपना सामान बेचने के लिए हिन्दी बोलते हैं। वे लोग भी हिन्दी सीख रहे हैं। हिन्दी उनकी आवश्यकता है। वहाँ केरल, तमिलनाडु से भी लोग आते है जितने भी लोग आ रहे हैं, इन सभी लोगों की सम्पर्क भाषा हिन्दी ही है। हिन्दी बहुत सम्पन्न भाषा है और इसका प्रसार टेलीविजन और चलचित्रों के माध्यम से भी हो रहा है। बहुत सारे लोग हिन्दी अच्छी तरह से जानते हैं।

प्रश्न-    हिन्दी शिक्षण की क्या स्थिति है प्राथमिक, माध्यमिक शिक्षा में?

उत्तर-   भारतीय दूतावास के नियन्त्रण में संचालित कई विद्यालय हैं। भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय विद्यालय, दम्माम में 19,000 छात्र, भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय विद्यालय, जेद्दा में 10,000 तथा जुवेल में 7000 छात्र हिन्दी सीखते हैं। अन्य जगहों पर 10 पाठशालाएं हैं जिनमें छात्रों की बड़ी संख्या है। ब्ठैम् की 29 पाठशालाएं हैं। 8वीं जमात तक हिन्दी को अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाता है। उसके ऊपर 9वीं जमात से ही हिन्दी ऐच्छिक हो जाती है।

प्रश्न-    क्या विश्वविद्यालयों में भी हिन्दी पढ़ाई जाती है?

उत्तर-    नहीं, वहाँ भारतीय मूल के छात्रों के लिए कोई विश्वविद्यालय ही नहीं है। जैसा मैंने आपको पहले बताया कि यहाँ कोई सरकारी अनुदान नहीं मिलता। यहाँ मजदूरी करने या सरकारी ओहदे पर आए भारतीय मूल के लोगों के लिए विद्यालय चलते हैं और केवल 12वीं जमात तक ही चलते हैं। उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए 12वीं के बाद सभी छात्रों को हिन्दुस्तान ही जाना पड़ता है।

प्रश्न- सऊदी अरब में हिन्दी में क्या-क्या हो रहा है साहित्य-पत्रिकारिता आदि में?

उत्तर-    पत्रिकाएं हमारी अपनी पाठशाला से ही निकलती हैं और बच्चें अपने बूते पर प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए बाहर विदेश जाते हैं। कई तरह के चलचित्र से जुड़े कार्यक्रमों में जाते हैं।

प्रश्न-    हिन्दी के समाचार-पत्र एवं पत्रिकाओं का भी प्रकाशन होता है?

उत्तर-    नहीं, क्योंकि समस्याएँ बहुत हैं वहाँ। सभी कुछ वहाँ सरकार के अधीन देखा जाता है। वहाँ बहुत सख्त कानून है। हम, वहाँ बाहर से पुस्तकें, पत्रिकाएं भी नहीं मंगा सकते। हम केवल राजदूतावास के मार्फत ही पुस्तकें पा सकते हैं। इसलिए मैनें बाल साहित्य की किताबें उपलब्ध करने के लिए सरकार से अनुरोध किया है।

प्रश्न-    क्या कुछ संस्थायें हिन्दी के प्रसार एवं विकास के लिए वहाँ काम कर रही हैं?

उत्तर-    केवल हिन्दी के लिए तो नहीं हैं लेकिन केरल अभिभावक संघ, हैदराबाद अभिभावक संघ तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पुरातन छात्र परिषद् आदि संस्थाएं हैं। ये सब केवल हिन्दी के लिए ही नहीं बल्कि अन्य भाषाओं के लिए भी काम करते हैं। उन्होंने हमें भी सम्मानित किया है। वहाँ पर अन्य गैर सरकारी संगठन, भारतीय राजदूतावास के अधीन 10 जनवरी को ‘विश्व हिन्दी दिवस’ मनाते हैं, जिसमें विभिन्न प्रकार की प्रतियोगितायें होती हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम भी चलाये जाते हैं। कवि सम्मेलन, उर्दू शेरो-शायरी भी होती है।

प्रश्न-    जो भारतवासी वहाँ बस गए या कार्यरत हैं, हिन्दी उनके व्यवहार में कितनी है?

उत्तर-    जो भारतीय वहाँ कार्यरत हैं, वे अनिवार्य रूप से हिन्दी सीखते हैं। जब आपस में मिलते हैं तो आपस में बात प्रायः मातृभाषा में ही करते हैं। हाँ यदि दक्षिण भारत के लोग मिलते हैं तो वे दक्षिण भारतीय भाषाओं में ही बात करते हैं, लेकिन जब और क्षेत्र के लोग मिलते है तो हिन्दी में बात करते हैं। आपसी संवाद प्रायः हिन्दी में ही होता है।

प्रश्न-    सऊदी अरब के सामान्य जन-जीवन में हिन्दी का कितना प्रयोग और स्वीकार्यता है?

उत्तर-    सऊदी लोगों के लिए हिन्दी एक विदेशी भाषा है। जो व्यापार करते हैं, वो लोग जान रहे हैं या कोई छात्र पढ़ाई के लिए आ रहा है, तो वह कुछ बात कर सकता है। ऐसे लोग बहुत कम हैं, शायद  1 परतिशत भी नहीं है। हाँ, यह है कि भारतीय लोगों के सामान्य जीवन में हिन्दी अच्छी तरह प्रयुक्त होती है।

प्रश्न-    सऊदी अरब में भारतीय अपने बच्चों को हिन्दी पढ़ाने का आग्रह रखते हैं?

उत्तर-    अनिवार्य रूप से। क्योंकि वहाँ की सरकार के आदेश के अनुसार हर एक देश के अपने अपने विद्यालय होते हैं। उसमें उस देश से सम्बन्धित सभी छात्रों को अनिवार्य रूप से पढ़ना पड़ता है और ब्ठैम् के विद्यालयों में त्रिभाषा सूत्र के अनुसार हिन्दी को अनिवार्य रूप से पढ़ना पड़ता है। सभी छात्र हिन्दी पढ़ते हैं और आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि जो दक्षिण भारत के छात्र हैं, वो हिन्दी भाषा में सबसे अधिक अंक प्राप्त करते हैं।

प्रश्न-    भारतीय भाषाओं की साहित्यिक, धार्मिक या अन्य पुस्तकों का अरबी भाषा में अनुवाद हुआ है?

उत्तर-    अनुवाद बहुत सारी पुस्तकों का हुआ है, लेकिन हम कह सकते हैं कि पुस्तकों का अनुवाद वहाँ उपलब्ध होना कठिन है। जैसे हमारे भारत में ग्रन्थालय हैं, वैसे वहाँ बहुत कम होते हैं। जो हैं भी, वो वहाँ के देशवासियों के लिए ही होते हैं। हम लोग पाठशाला के ग्रंथालय से ही पुस्तकें लेते हैं, पढ़ते हैं। अधिकतर साहित्य, बाल साहित्य से सम्बन्धित होता हैं।

प्रश्न-    सऊदी अरब में हिन्दी शिक्षण में, प्रचार प्रसार में क्या-क्या समस्याएं सामने आती हैं, जिनका उल्लेख आप करना चाहेंगे?

उत्तर-    हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए हम जो काम कर रहे हैं, उसके लिए सबसे पहले तो प्रशिक्षित अध्यापक-अध्यापिकाएं नहीं मिलते। दूसरी चीज बोलचाल की  भाषा आसान होती जा रही है, लेकिन पुस्तकों की भाषा दिन प्रतिदिन कठिन होती जा रही है। परीक्षा-प्रणाली से बच्चे डर रहे हैं। बच्चे तो बच्चे, माता-पिता भी डर रहें हैं और सरकार की तरफ से कोई प्रोत्साहन भी नहीं मिलता है। कोई अनुदान नहीं मिलता है। भारतीय मूल के लोगों की उच्च शिक्षा के लिए कोई विश्वविद्यालय नहीं है। उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए 12वीं के बाद भारत ही आना पड़ता है। ये पहली बार है कि विदेश मंत्रालय ने हमें पहचाना, हमें यहाँ बुलाया और हमारा सम्मान किया, उनका बहुत-बहुत आभार प्रकट करता हूँ, क्योंकि वो भी बहुत अधिक देख रहे हैं, लेकिन वहाँ जो हिन्दी भाषी लोग हैं, उनका प्रोत्साहन बच्चों को मिले तो बेहतर परिणाम मिलेगें।

प्रश्न-    सऊदी अरब में हिन्दी शिक्षण एवं प्रचार-प्रसार के लिए भारत सरकार से किस प्रकार के सहयोग की अपेक्षा रखते हैं आप?

उत्तर-    पाठ्य-पुस्तकें आसान करना चाहिए। जैसा मैंने कहा कि बोलचाल की भाषा आसान हो रही है, पुस्तकों की भाषा कठिन हो रही है। पुस्तकों में पुराने साहित्यकारों का साहित्य न दें जिनमें बच्चों की अभिरुचि न रहे पढ़ने में। बाल अभिरुचि की रचनाएं अगर उसमें आती हैं तो वह बहुत ही अच्छा होगा। दूसरी चीज प्रशिक्षित अध्यापक-अध्यापिकाएं होने चाहिये। आर्थिक सहयोग, प्रशासनिक सहयोग व प्रोत्साहन भी मिलना चाहिये।

प्रश्न-    हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए आपकी एवं संस्था की कुछ आगामी योजनायें क्या हैं?

उत्तर-    वहाँ पर कार्यशालाओं के माध्यम से शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाता है कि कैसे बच्चों को पढ़ाएं ताकि बच्चे हिन्दी से डरे नहीं। आगे भी हम ऐसी कार्यशालाएं आयोजित करते रहेंगे।

प्रश्न-    वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी का कैसा भविष्य दिखता है आपको?

उत्तर-    हिन्दी को कोई रोक नहीं सकता। किसी सहायता की जरूरत नहीं है। ये अपने आप प्रवाहित हो रही है। हिन्दी अप्रभंश काल से ही बढ़ती आ रही है, तमाम अवरोधों, चुनौतियों के बाद भी। आगे भी ऐसे ही बढ़ती जाएगी। एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमें किसी भाषा से द्वेष नहीं रखना चाहिए। दक्षिण की जितनी भाषाएं हैं, उनके शब्दों को स्वीकार करना चाहिए और इनको आगे बढ़ाते रहना चाहिए। हिन्दी खुद-ब-खुद बढ़ती जाएगी।

प्रश्न-    इस सम्मेलन के माध्यम से आप हिन्दी भाषी लोगों से हिन्दी पे्रमियों से कुछ कहना चाहेंगे?

उत्तर-    मैं इससे बहुत प्रभावित हुआ हूँ। ये बहुत अच्छा काम है। ऐसे सम्मेलन होने चाहिए। इन सम्मेलनों से ही सबको प्रोत्साहन मिलता है और मैं भोपाल की जनता से बहुत खुश हूँ। इनकी मेहमाननवाजी से बहुत प्रभावित हूँ। इतना बड़ा सम्मेलन, इतने सुचारू रूप से पहले कभी नहीं हुआ। बहुत अच्छा सम्मेलन हुआ। इसके लिए विदेश मंत्रालय, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और जो भी लोग इसकी व्यवस्था में शामिल हैं प्रशंसा के पात्र है।
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