'हिन्दी भाषा: वर्तमान स्थिति एवं भविष्य': साक्षात्कार- केशरी नाथ त्रिपाठी

'हिन्दी भाषा: वर्तमान स्थिति एवं भविष्य': साक्षात्कार- केशरी नाथ त्रिपाठी केसरी नाथ त्रिपाठी वर्तमान में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं. उनका जन्म १० नवम्बर १९३४ को इलाहाबाद में हुआ था. उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए, एलएलबी की शिक्षा ग्रहण की और १९५६ से इलाहाबाद उच्चन्यायालय में अधिवक्ता के रूप में सिविल संवैधानिक एवं चुनाव कानून विशेषज्ञ के रूप में अपनी छाप छोड़ी. राजनीति में विशेष दखल के चलते वे उत्तर प्रदेश के विधानसभाध्यक्ष और पांच बार विधायक भी चुने गए. पर उनका मन हिन्दी की साहित्य सेवा में रमता रहा.

वह अनेक साहित्यिक संस्थाओं से संबद्ध और पुरस्कृत हुए. देश- विदेश के अनेक कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किया. मनोनुकृति के नाम से उनका पहला काव्य संकलन प्रकाशित हुआ. आपकी कविता 'आमंत्रण' को अनुभूति के काव्य संग्रह 'वसंती हवा' के लिये भी चुना गया. विश्व हिन्दी सम्मेलन भोपाल में हिन्दी की दशा और दिशा पर उनसे बातचीत किया श्याम नन्दन ने...

प्रश्न-    वर्तमान परिदृश्य में ’हिन्दी भाषा’ की क्या स्थिति है?

उत्तर-    हिन्दी की स्थिति, वर्तमान काल में, मैं कह सकता हूँ कि बहुत ही उत्साहवर्धक है और हिन्दी भाषा दिन प्रति दिन प्रगति कर रही है। इसको पढ़ने वालों, लिखने वालों की संख्या बढ़ रही है और इसका क्षेत्र विस्तार हो रहा है।

प्रश्न-    हिन्दी को ही भारत की राजभाषा बनाने की माँग लम्बे समय से चली आ रही है। देश में एक बहुत बड़ा वर्ग, इसका पक्षधर भी है। इस सन्दर्भ में आपका मन्तव्य क्या है?

उत्तर-    वास्तव में यदि देखा जाए तो हिन्दी, देश की भाषा है। 60 करोड़ से ज्यादा लोग हिन्दी समझते हैं, बोलते हैं और लिखते है। जहाँ हिन्दी के अलावा दूसरी भाषाएँ हैं, वहाँ भी हिन्दी का प्रचलन है और अच्छे प्रकार से प्रचलन है। एक प्रकार से देखा जाए तो हिन्दी, भारत में सर्वव्यापी भाषा है। इसलिए, हिन्दी को राजभाषा बनाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

प्रश्न- अन्य भारतीय भाषाओं के साथ सामंजस्य बनाने में हिन्दी की भूमिका को किस दृष्टि से देखते हैं, आप?

उत्तर-    भारत की अन्य भाषाओं से सामंजस्य बनाने में हिन्दी की बहुत ही सार्थक भूमिका है। हिन्दी का, किसी भी भाषा से कोई द्वेष नहीं हैं। ये बात बार-बार कही गई है लेकिन कुछ प्रदेशों को छोड़कर, केवल क्षेत्रीय कारणों से, क्षेत्रीय महत्वकांक्षाओं के कारण, लोग हिन्दी को स्थापित नहीं करना चाहते हैं, किन्तु विरोध का वह भाव भी अब समाप्त हो चुका है।

प्रश्न- हिन्दी की पुस्तकों का अन्य भारतीय भाषाओं में तथा अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद कार्य, इस दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है?

उत्तर- मैं समझता हूँ कि यह बहुत महत्वपूर्ण है। एक भाषा के ज्ञाता जब दूसरी भाषा की पुस्तकें पढ़ेंगे और साहित्य ही नहीं अन्य दूसरी विधाओं की रचनाओं को पढ़ंेगे, तो दोनों भाषाओं के लोगों का ज्ञानवर्धन होगा, दोनो भाषाएं समृद्ध होंगी। आपको स्मरण होगा कि जिस समय वामपंथियों ने अपना साहित्य, बहुत सस्ते दर पर, भारत में बेचना शुरू किया, उस समय कौन जानता था, रूसी साहित्य के बारे में? लेकिन उन दिनों वामपंथियों के प्रयास के कारण, वामपंथी लेखको के कारण रूसी साहित्य, भारत मे प्रचलित हो गया। कम्यूनिस्ट देशों के साहित्य भारत में प्रचलित हो गये और धीरे-धीरे ये लेखन की एक पद्धति बन गयी। अनुवाद के माध्यम से साहित्य समृद्ध होता है। साहित्य में नए-नए शब्द मिलते हैं और हमारी भाषा के शब्द भी दूसरी भाषा में, उसके साहित्य में स्थान बना लेते हैं।

प्रश्न- राष्ट्रीय एकात्मता के लिए पूरे देश में एक समान लिपि होने की बात आचार्य बिनोवा भावे, महात्मा गाँधी, आदि लोगों ने कही है। इस सन्दर्भ में आपके विचार क्या हैं?

उत्तर- देखिए! एक समान लिपि होगी तो उससे बहुत सुविधा भी होगी और राष्ट्रीय एकात्मता का अर्थ ये है कि हमारे अन्दर भाषा के आधार पर भी राष्ट्रीय आत्मगौरव का भाव उत्पन्न हो। हिन्दी और देवनागरी दोनों यह भाव उत्पन्न करने में समर्थ और सशक्त हैं।

प्रश्न-    क्या हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में सर्व स्वीकार्य नहीं है?

उत्तर-    देखिए! सर्व स्वीकार्य तो है। एक परिवार में चार सदस्य हों तो उनमें भी किसी एक बिन्दु पर आपस में मतभेद हो जाता है लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि वह परिवार के सदस्य नहीं हैं या इसका अर्थ ये भी नहीं कि उनमें मोटे तौर पर सहमति नहीं है। हिन्दी भी भारत को एक बड़े परिवार के रूप में देखती है, जहाँ कई अन्य भाषाएं हैं। लेकिन भाषायी विभिन्नता के बावजूद, हिन्दी सर्वश्रेष्ठ है। सभी लोगों को हिन्दी स्वीकार्य भी है।

प्रश्न-    भारत सरकार हिन्दी भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा की मान्यता दिलाने के लिए प्रयासरत है। इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।

उत्तर-  देखिए! प्रयास है, हो रहा है। यदि हिन्दी भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ में मान्यता मिल जाती है तो बहुत अच्छा है। लेकिन मैं, इसके साथ ही दूसरा प्रश्न करना चाहता हूँ। प्रश्न यह है कि जिन देशों की भाषा संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा के रूप में अनुमन्य नहीं हुई है, क्या उन देशों में प्रगति नहीं हुई? क्या उन देशों में राष्ट्रीयता का भाव जागृत नहीं हुआ है? क्या उन देशों में एकता नहीं हुई? तो संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा होने से कोई बहुत लाभ नहीं होगा। हाँ, भाषा का प्रचार अधिक हो जाएगा। एक मान्य भाषा का दर्जा उसे मिल जाएगा। हम, वहाँ अपनी बात को अपनी भाषा में कह सकेंगे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ एक सीमित संस्था है। हमें आवश्यकता है कि हम विश्व-मंच पर हिन्दी को रोजगार से जोड़ें। हिन्दी को सामान्य जन-जीवन से जोड़ें। तब आप देखेगें कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हमारी भाषा की मान्यता हो या नहीं, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। विश्व के अनेक देश ऐसे हैं, जिनकी भाषा, संयुक्त राष्ट्र संघ  की भाषा के रूप में नहीं हैं लेकिन फिर भी वो देश आगे बढ़ते जाते हैं। क्यों ? क्योंकि उस देश के निवासियों का संकल्प है कि हम अपनी भाषा के माध्यम से विश्व में स्थान बनाएंगे। हिन्दी के लिए, हिन्दी के सन्दर्भ में, भारतवासियों के अन्दर  भी यह संकल्प होना चाहिए।

प्रश्न- 10 वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन पूर्व के सम्मेलनों से कितना और कैसे भिन्न लगता है?

उत्तर- 10 वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन इस रूप में भिन्न है कि पहले के सम्मेलनों में ’हिन्दी साहित्य’ पर ज्यादा बल दिया जाता था, लेकिन इस बार ’हिन्दी भाषा’ पर बल दिया जा रहा है अर्थात् हिन्दी भाषा की अनेक विधाओं, हिन्दी भाषा से सम्बन्धित अनेक क्षेत्रों पर भी चर्चा हो रही है और खुलकर हो रही है। विज्ञान में हिन्दी, विधि में हिन्दी, तकनीकी क्षेत्रों में हिन्दी, व्यवसाय में हिन्दी, प्रशासन में हिन्दी आदि इस प्रकार जो हिन्दी के विविध क्षेत्र हैं, जहाँ हिन्दी का प्रयोग लाभकारी हो सकता है, उत्साहवर्धक हो सकता है, उन क्षेत्रों पर चर्चा हो रही है। इस प्रकार केवल साहित्य तक सीमित न करके हिन्दी को विस्तार देने का प्रयास और विस्तार देने के लिए क्या-क्या माध्यम हो सकते हंै, क्या-क्या साधन हो सकते हैं, उस पर विचार हो रहा है। इस दृष्टि से 10वाँ विश्व हिन्दी सम्मेलन पूर्व के अन्य सम्मेलनों से थोड़ा भिन्न है।

प्रश्न-  सम्मेलन में सत्रों के लिए विषय-चयन पर आपकी क्या राय है?

उत्तर-   विषय-चयन तो ठीक हुआ है और इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि तीन दिन के सम्मेलन में जहाँ उद्घाटन में समय लगता है, समापन में समय लगता है तो वहाँ सीमित विषयों पर ही चर्चा हो पाएगी। इसका मतलब ये नहीं कि बाकी विषय उपेक्षित हैं। समय-समय पर आवश्यकतानुसार, शेष आवश्यक विषयों पर चर्चा होती रहेगी।

प्रश्न-    वैश्विक पटल पर आपको हिन्दी का भविष्य कैसा दिखता है?

उत्तर-   हिन्दी का भविष्य, वैश्विक पटल पर बहुत अच्छा है। पहले जहाँ 7-8 देशों में ही हिन्दी बोली जाती थी, आज 30 से अधिक देशों में बोली, समझी जाती है। इसका कारण ये है कि हमारे भारतीयों ने विश्व के अनेक देशों में अपना स्थान बना रखा है और जब भारतीयों की संख्या दूसरे देशों में बढ़ेगी तो निश्चित रूप से हिन्दी का विकास उन देशों में होगा। इसलिए अब भारत को विश्व के हर क्षेत्र में, हर विधा में अपने नागरिकों के माध्यम से प्रभाव बनाने की आवश्कता है।

प्रश्न- कम्प्यूटर स्क्रिप्ट में रोमन लिपि सब जगह आ गई है। इसे आप देवनागरी लिपि और हिन्दी के सन्दर्भ में किस रूप में देखते है?

उत्तर-   नहीं। अब तो कम्प्यूटर में देवनागरी लिपि भी आ गयी है। सवाल ये है कि हम प्रयोग किस का करते हैं। अगर हम कम्प्यूटर, मोबाइल के माध्यम से देवनागरी लिपि का प्रयोग करने लगे तो हिन्दी स्वतः ही बढ़ने लगेगी। ये मन की झिझक है जिसे दूर करने की आवश्यकता है। एक बार बहुत ही प्रभावी ढ़ंग से आगे आकर, साहस के साथ कहना है कि हम हिन्दी हैं, हम हिन्दी-भाषी हैं और इसलिए हम हिन्दी भाषा का प्रयोग करेंगे।

प्रश्न-    इस सम्मेलन के माध्यम से अपनी युवा पीढ़ी को, हिन्दी भाषी जनता को कोई सन्देश देना चाहेंगे?

उत्तर-    ये सन्देश देना चाहता हूँ कि हिन्दी को राष्ट्रीय गौरव के साथ जोड़ें। हिन्दी के विकास के लिए संकल्पित हों और हिन्दी को समृद्ध करने के लिए जो विधिक और उपयुक्त साधन हैं, सबका उपयोग करें। हिन्दी सर्वव्यापी हो जाएगी। सभी क्षेत्रों में हिन्दी का प्रभाव हो जाएगा। हिन्दी ही दिखाई पड़ेगी।
धन्यवाद!

# साक्षात्कारकर्ता श्यामनन्दन, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिन्दी विभाग में शोध छात्र हैं.
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