Wednesday, 14 January 2026  |   जनता जनार्दन को बुकमार्क बनाएं
आपका स्वागत [लॉग इन ] / [पंजीकरण]   
 

ओली के भारत आने से पहले ही हो गया तख्तापलट, नेपाल में कौन भड़का रहा आग

जनता जनार्दन संवाददाता , Sep 09, 2025, 18:33 pm IST
Keywords: Nepali Congress President Deuba    Communications Minister    Nepal PM KP Sharma Oli   नेपाल   काठमांडू  
फ़ॉन्ट साइज :
ओली के भारत आने से पहले ही हो गया तख्तापलट, नेपाल में कौन भड़का रहा आग

नई दिल्ली: नेपाल में पिछले कुछ दिनों से जो कुछ हो रहा है, वह केवल घरेलू असंतोष नहीं, बल्कि उसके पीछे कई परतें हैं- स्थानीय नाराज़गी, युवा वर्ग की हताशा, और वैश्विक ताकतों की संभावित दखल. इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र बने हैं प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, जिन्होंने भारी विरोध प्रदर्शनों और बढ़ते जनदबाव के बीच मंगलवार को इस्तीफा दे दिया.

सोमवार को काठमांडू और अन्य इलाकों में सोशल मीडिया पर पाबंदियों के खिलाफ जब प्रदर्शन शुरू हुए, तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि मामला इतना बढ़ जाएगा. कम से कम 19 लोगों की मौत और सैकड़ों घायल होने के बाद, जब प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के निजी आवास तक पहुंच गए और वहां आगजनी की घटनाएं हुईं, तो सरकार का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया.

बालकोट स्थित ओली के निवास पर हमला और प्रधानमंत्री कार्यालय में घुसपैठ के बाद, उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया.

क्या ये प्रदर्शन अचानक हुए?

संभावना नहीं. सतह पर भले ही विरोध तेज़ी से उभरा हो, लेकिन इसके पीछे गहराई में कई महीनों की नाराज़गी छिपी थी. देश में बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, युवाओं का पलायन, और राजनीतिक अस्थिरता लंबे समय से चिंता का विषय रहे हैं. सरकार की जवाबदेही को लेकर लोगों में गहरा असंतोष था.

नेपाल के युवाओं में, खासतौर पर Gen Z और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स में, सरकार के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा था. खराब सड़कों, शिक्षा व्यवस्था और आर्थिक मंदी के बीच, सोशल मीडिया पर यूट्यूबर्स और डिजिटल क्रिएटर्स लंबे समय से इन मुद्दों को उजागर कर रहे थे.

क्या कोई बाहरी ताकतें हवा दे रही हैं?

वरिष्ठ पत्रकार केशव प्रधान, जो नेपाल और दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मामलों के जानकार हैं, मानते हैं कि प्रदर्शन पूरी तरह आंतरिक असंतोष पर आधारित हैं, लेकिन बाहरी शक्तियों की दिलचस्पी से इनकार नहीं किया जा सकता.

प्रधान का कहना है कि प्रदर्शनकारी जो प्लेकार्ड और नारे लेकर आए, वे विशुद्ध रूप से घरेलू मुद्दों पर केंद्रित थे- "नो मोर करप्शन", "जॉब्स नाउ", "गिव अस फ्यूचर" जैसे संदेश इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह आंदोलन जनता की पीड़ा का नतीजा है.

लेकिन इस समय जो सियासी समीकरण बन रहे हैं जैसे कि ओली की चीन से हालिया वापसी और भारत यात्रा की तैयारी, इन्हें देख कर लगता है कि इस आग में कहीं न कहीं अंतरराष्ट्रीय राजनीति की चिंगारी जरूर छिपी है.

चीन, अमेरिका और नेपाल की राजनीति

नेपाल एक ऐसा भू-राजनीतिक केंद्र बन गया है जहां चीन और अमेरिका, दोनों की दिलचस्पी बढ़ती जा रही है. ओली के प्रधानमंत्री रहते हुए, नेपाल ने चीन के Belt and Road Initiative (BRI) के साथ समझौता किया, जबकि अमेरिका ने Millennium Challenge Corporation (MCC) के तहत $500 मिलियन डॉलर का निवेश प्रस्तावित किया.

इन दोनों परियोजनाओं के बीच नेपाल में "पूर्व बनाम पश्चिम" की तरह की बहस शुरू हो गई है. चीन समर्थक नेताओं का झुकाव BRI की ओर है, वहीं कुछ वर्ग MCC को अमेरिकी हस्तक्षेप मानते हैं.

भारत की भूमिका और ओली की दूरी

नेपाल और भारत के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से गहरे रहे हैं. सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और पारिवारिक संबंधों की एक लंबी कड़ी दोनों देशों को जोड़ती है. लेकिन ओली के शासन में भारत और नेपाल के संबंधों में तनाव दिखा.

2020 में ओली सरकार ने लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताते हुए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था, जिस पर भारत ने कड़ा विरोध जताया. यह मामला ऐतिहासिक सुगौली संधि (1816) तक जा पहुंचा.

इसके बाद, ओली की चीन के साथ नजदीकियां और भारत से दूरी साफ नज़र आने लगी. प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा चीन की थी, जबकि परंपरागत रूप से नेपाल के प्रधानमंत्री सबसे पहले भारत का दौरा करते हैं.

ओली की प्रस्तावित भारत यात्रा

सितंबर 2025 में ओली की भारत यात्रा प्रस्तावित थी. इससे पहले 17 अगस्त को भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री नेपाल पहुंचे थे और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की ओर से ओली को आमंत्रण दिया था.

हालांकि, अब जब ओली ने इस्तीफा दे दिया है, तो यह यात्रा रद्द हो गई है और भारत-नेपाल संबंधों पर फिर से एक अनिश्चितता का माहौल बन गया है.

विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदर्शनों की टाइमिंग ओली की भारत यात्रा से पहले, चीन से लौटने के तुरंत बाद यह संयोग नहीं, बल्कि शायद एक सियासी गणित का हिस्सा भी हो सकता है.

अन्य अंतरराष्ट्रीय लेख
वोट दें

क्या आप कोरोना संकट में केंद्र व राज्य सरकारों की कोशिशों से संतुष्ट हैं?

हां
नहीं
बताना मुश्किल