मोदी सरकार ने बांग्लादेश को दिए थे 111 एन्क्लेव, चली गई 10 हजार एकड़ जमीन

जनता जनार्दन संवाददाता , Apr 01, 2024, 17:27 pm IST
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मोदी सरकार ने बांग्लादेश को दिए थे 111 एन्क्लेव, चली गई 10 हजार एकड़ जमीन लोकसभा चुनाव का दौर है और माहौल में राजनीतिक सरगर्मी न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. दक्षिण भारत में पैठ के लिए बीजेपी ने कच्चातिवु द्वीप का मुद्दा उछाला तो कांग्रेस ने भी पलटवार करने में देर नहीं की. उसने भारत- बांग्लादेश के बीच हुए लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट (LBA) का मुद्दा उठा दिया. यह एग्रीमेंट 2015 में दोनों देशों में हुआ था, जिसमें भारत ने अपने कब्जे वाले 111 एंक्लेव बांग्लादेश को सौंप दिया था. पीएम मोदी ने आखिर यह समझौता क्यों किया और कच्चातिवु विवाद क्या है, यह आपको विस्तार से समझाते हैं.

सबसे पहले आपको कच्चातिवु द्वीप के बारे में बताते हैं. यह द्वीप तमिलनाडु के रामेश्वरम से 19 किमी दूर समुद्र में बसा एक छोटा सा द्वीप है. इसका क्षेत्रफल करीब डेढ़ वर्ग किमी है. माना जाता है कि इस द्वीप की उत्पत्ति समुद्री तूफान या वोल्केनो से हुई थी. इस द्वीप पर भारत और श्रीलंका दोनों अधिकार जताते थे. आजादी के बाद संसद में दिए एक बयान में तत्कालीन पीएम ने एक तरह से इसे श्रीलंका का हिस्सा मान लिया. हालांकि कागजी तौर पर ऐसा नहीं हुआ. 

वर्ष 1970 में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने श्रीलंका के साथ गोपनीय समझौता कर इसे श्रीलंका का हिस्सा मान लिया. जब यह बात बाहर आई तो तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. उसके बाद से यह मुद्दा तमिलनाडु की राजनीति में संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है. इसका बड़ा नुकसान तमिलनाडु के मछुआरों को उठाना पड़ रहा है. रामेश्वरम के मछुआरे जब भी मछली पकड़ने के लिए समुद्र में जाते हैं तो कच्चातिवु द्वीप पर तैनात श्रीलंकाई नेवी के जवान मछुआरों को पकड़कर उनकी नाव जब्त कर लेते हैं. 
 

श्रीलंका को यह द्वीप गिफ्ट करने पर तमिलनाडु के लोगों में गहरी नाराजगी रही है. वे इसके लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार मानते रहे हैं. बीजेपी ने इसी नाराजगी को कैश करने के लिए तमिलनाडु पार्टी प्रदेश के. अन्नामलाई के जरिए आरटीआई डलवाई, जिसमें इस द्वीप को श्रीलंका को देने के लिए कांग्रेस की तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी को जिम्मेदार ठहराया गया है. इसके बाद पीएम मोदी तमिलनाडु के बीजेपी नेताओं ने राज्य के लोगों से अपील की कि वहे उनका हक छीनने पर कांग्रेस और उसकी सहयोगी डीएमके को चुनावों में सबक सिखाएं.


अब हम बांग्लादेश के साथ हुए लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट पर आते हैं, जिसमें पीएम मोदी ने भारत के 111 एंक्लेव बांग्लादेश को दे दिए थे. कच्चातिवु का मुद्दा उठने पर अब कांग्रेस ने भारत- बांग्लादेश सीमा समझौते की याद दिलाकर मोदी सरकार पर हमला बोला है. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने पोस्ट कर कहा, 'वर्ष 2015 में, मोदी सरकार ने बांग्लादेश के साथ भूमि सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते में 17,161 एकड़ भारतीय भूमि बांग्लादेश को दे दी गई, जबकि उसे बांग्लादेश से केवल 7,110 एकड़ जमीन मिला. ऐसा करने से सीधे तौर पर भारत का भूमि क्षेत्र 10,051 एकड़ कम हो गया. लेकिन पड़ोसी देशों के साथ मधुर संबंधों और राष्ट्रीय हित को देखते हुए कांग्रेस ने मोदी सरकार पर बचकाना आरोप लगाने के बजाय कांग्रेस ने संसद के दोनों सदनों में इस विधेयक का समर्थन किया.

भारत और बांग्लादेश करीब 4,000 किलोमीटर लंबी भूमि सीमा साझा करते हैं. इस सीमा का निर्माण सर रेडक्लिफ की ओर से नक्शे पर खींची गई सीमा और भारत- पाक विभाजन से हुआ था. हालांकि असल समस्या तब शुरु हुई, जब बांग्लादेश के बनने से ऐसे क्षेत्रों का निर्माण हो गया, जो वैधानिक रूप से ते भारत के थे लेकिन वे बांग्लादेशी भूमि से हुए थे. वहीं ऐसे भी कई क्षेत्र थे, जिन पर बांग्लादेश का हक था लेकिन वे भारतीय भूमि से घिरे हुए थे. इस स्थिति की वजह से दोनों देश अपने लोगों तक आसान पहुंच नहीं बना पा रहे थे. 

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस तकनीकी समस्या को देखते हुए दोनों देशों ने बाउंड्री का नए सिरे से सीमांकन करने और दोनों देशों के बीच 160 से ज्यादा इलाकों की अदला-बदली करने पर चर्चा शुरू की. तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने वर्ष 1974 में बांग्लादेश के तत्कालीन पीएम शेख मुजीबुर रहमान के साथ लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट पर साइन किए. समझौते के मुताबिक दोनों देशों को अपनी-अपनी संसद में इस एग्रीमेंट की पुष्टि करवानी थी. बांग्लादेश ने तो ऐसा कर दिया लेकिन ऐन मौके पर तत्कालीन इंदिरा सरकार पीछे हट गई. 

इसके बाद तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह और बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना के बीच 2011 में एक और समझौता हुआ और यथास्थिति बनाए रखने पर सहमति बनी. थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) की रिपोर्ट के अनुसार, समझौते के तहत भारत को बांग्लादेश से 2,777.038 एकड़ जमीन हासिल करनी थी, जबकि 2,267.682 एकड़ जमीन उसे पड़ोसी मुल्क को सौंपनी थी.

इसके बाद वर्ष 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आई, जिसने विदेश नीति को धार देने के लिए पड़ोसी प्रथम की नीति अपनाई. न्यूयार्क में यूएन की महासभा की बैठक के दौरान उनकी बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना से मुलाकात हुई. इस बैठक में भूमि समझौते की बात उठने पर पीएम मोदी शांत रहे और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. इसके बाद उनकी दूसरी मुलाकात काठमांडू में सार्क शिखर सम्मेलन के दौरान हुई, जिसमें भी हसीना ने यह मुद्दा उठाया. इसके बाद पीएम मोदी ने इस उलझे मुद्दे को सुलझाने का फैसला ले लिया.

उन्होंने सबसे पहले समझौते से प्रभावित होने वाली असम और पश्चिम की सरकारों से बात की. चूंकि असम में बीजेपी की सरकार थी, इसलिए खास दिक्कत नहीं हुई. इसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल की ममता सरकार से बात कर उसे भी समझौते के लिए राजी किया. फिर उन्होंने प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस की भी इस मुद्दे पर सहमति ली. इसके बाद उन्होंने जून 2015 में ढाका में हुए एक सम्मेलन में बांग्लादेशी पीएम शेख हसीना के साथ ऐतिहासिक सीमा समझौते पर साइन कर दिए. 

इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच अनसुलझे 162 इलाकों की अदला-बदली की गई. इसके तहत 111 इलाके (17,160 एकड़ भूमि) बांग्लादेश को दे गई. जबकि भारत के हिस्से में 51 इलाके (7,110 एकड़ भूमि) आई. सभी 162 इलाकों में रहने वाले लोगों को विकल्प दिया गया कि वे भारत या बांग्लादेश, किसी की भी नागरिकता को चुन सकते हैं. इसके बाद बांग्लादेश के हिस्से में आए 51 इलाकों के 14,854 निवासियों ने भारतीय नागरिकता ली. वहीं 36 हजार से ज्यादा लोगों ने बांग्लादेश की नागरिकता ली. बांग्लादेश की नागरिकता चुनने वाले लोगों में सभी मुसलमान थे. 

मोदी सरकार की ओर से किए गए इस समझौते से बिना देश के रह रहे करीब 50 हजार लोगों को राष्ट्रीयता हासिल हो गई और वे सभी उन मूलभूत अधिकारों को हासिल कर पाए, जिसके वे अधिकारी थे. मोदी सरकार ने भारत के हिस्से में आए लोगों के कल्याण के लिए 1005.99 करोड़ रुपये के पुनर्वास पैकेज को भी मंजूरी दी.

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