आज की कविता ने देखे हैं रुतबे के अजीब पैमाने

शशिपाल शर्मा 'बालमित्र' , Sep 21, 2017, 6:50 am IST
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आज की कविता ने देखे हैं रुतबे के अजीब पैमाने नई दिल्लीः भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, काल खंड और सनातन परंपरा के अग्रणी सचेता प्रख्यात संस्कृत विद्वान पंडित शशिपाल शर्मा बालमित्र द्वारा संकलित दैनिक पंचांग, आज की वाणी, इतिहास में आज का दिन और उनकी सुमधुर आवाज में आज का सुभाषित आप प्रतिदिन सुनते हैं.

जैसा कि हमने पहले ही लिखा था, पंडित जी अपनी सामाजिक और सृजनात्मक सक्रियता के लिए भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात हैं. उनके पाठकों शुभेच्छुओं का एक बड़ा समूह है.

जनता जनार्दन ने भारतीय संस्कृति के प्रति अपने खास लगाव और उसकी उन्नति, सरंक्षा की दिशा में अपने प्रयासों के क्रम में अध्यात्म के साथ ही समाज और साहित्य के चर्चित लोगों के कृतित्व को लेखन के साथ-साथ ऑडियो रूप में प्रस्तुत करने का अभिनव प्रयोग शुरू कर ही रखा है, और पंडित जी उसके एक बड़े स्तंभ हैं.

इसी क्रम में पंडित शशिपाल शर्मा बालमित्र ने एक स्वरचित कविता रची और अपने एक प्रशंसक के अनुरोध पर सस्वर पाठ भी किया. तो आप भी आनंद लीजिए. प्रस्तुत है पंडित शशिपाल शर्मा बालमित्र की कविता उनकी आवाज के ऑडियो के साथः

आज की कविता

आज की कविता ने देखे हैं
       रुतबे के अजीब पैमाने।
पान-मसाले और सुपारी
       गुटखा के ऊँचे दीवाने ।।

टी.वी. पर आकर बतलाते
      कई सितारे यह-वह खा लो ।
चाहे कितने पाप किए हों
      फिर भी ऊँचा रुतबा पा लो।।

पृथ्वीराज कपूर हुए थे
       बहुत बड़े थे अभिनेता ।
कुल को रुतबा दिया चल दिए
       उनका नाम न कोई लेता।।

कैसे-कैसे अब कपूर हैं
     अंड-संड सब खाते हैं।
किसको खाकर रुतबा मिलता
     शान सहित बतलाते हैं।।

बड़े दंभ से बोल उठा था
     ऋषि कपूर खाता गोमांस।
उस रुतबे से नीचे आकर
      चली सुपारी की बकवास ।।

माना कुछ भी खाना-पीना
     या फिर गोभक्षी हो जाना।
है अधिकार तुम्हारा अपना
     जग भर में क्यों फैलाना।।

क्या इससे बढ़ जाता रुतबा
     या फिर धौंस जमाते हो।
सबके दिल को ठेस लगाकर
     माँस गाय का खाते हो ।।

शर्म करो पृथ्वी दादा की
     तुमने नाक कटा डाली।
उस सज्जन के पोते होकर
     गौमाता भी खा डाली ।।

बालमित्र सम्मान तुम्हारा
     दो कौड़ी का रह जाता।
पापी जीभ किसी की कितनी
     जब कोई यह बतलाता ।।

खाकर कोई पान-सुपारी
    पाप नहीं कट सकते हैं।
रुतबा कुल का मिला धूल में
    विज्ञापन बस दिखते हैं।।

-शशिपाल शर्मा 'बालमित्र'*
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