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आज की कविता ने देखा है नए दौर का फ़ैशन ऐसा

शशिपाल शर्मा 'बालमित्र' , Sep 14, 2017, 6:44 am IST
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आज की कविता ने देखा है नए दौर का फ़ैशन ऐसा नई दिल्लीः भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, काल खंड और सनातन परंपरा के अग्रणी सचेता प्रख्यात संस्कृत विद्वान पंडित शशिपाल शर्मा बालमित्र द्वारा संकलित दैनिक पंचांग, आज की वाणी, इतिहास में आज का दिन और उनकी सुमधुर आवाज में आज का सुभाषित आप प्रतिदिन सुनते हैं.

जैसा कि हमने पहले ही लिखा था, पंडित जी अपनी सामाजिक और सृजनात्मक सक्रियता के लिए भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात हैं. उनके पाठकों शुभेच्छुओं का एक बड़ा समूह है.

जनता जनार्दन ने भारतीय संस्कृति के प्रति अपने खास लगाव और उसकी उन्नति, सरंक्षा की दिशा में अपने प्रयासों के क्रम में अध्यात्म के साथ ही समाज और साहित्य के चर्चित लोगों के कृतित्व को लेखन के साथ-साथ ऑडियो रूप में प्रस्तुत करने का अभिनव प्रयोग शुरू कर ही रखा है, और पंडित जी उसके एक बड़े स्तंभ हैं.

इसी क्रम में पंडित शशिपाल शर्मा बालमित्र ने एक स्वरचित कविता रची और अपने एक प्रशंसक के अनुरोध पर सस्वर पाठ भी किया. तो आप भी आनंद लीजिए. प्रस्तुत है पंडित शशिपाल शर्मा बालमित्र की कविता उनकी आवाज के ऑडियो के साथः

आज की कविता

आज की कविता ने देखा है
      नए दौर का फ़ैशन ऐसा।
विष के बीजों की फसलों से
      लोग बचाते कितना पैसा।।

आम की आशा में बो देते
       ये बबूल के बीज बड़े।
काँटों से जब कंठ कट गया
       चकित रह गए खड़े-खड़े।।

शोषण का ये चक्र चलाकर
       पोषण की चाहत रखते हैं।
जब रक्षक भक्षक बन जाता
       भक्षक को दोषी कहते हैं।।

ठेकेदारी पनप चुकी है
       रक्षक-सेवक देने की।
रक्षक का वेतन वे खाते
        बात दलाली लेने की।।

जब दलाल को मिले दलाली
       क्या उसको पहचान से लेना।
ऐरा-ग़ैरा-नत्थू-ख़ैरा
      उसको है बस रक्षक देना।।

एक भेड़िया सेवक बनकर
     स्कूलों में घुस जाता है।
हैवानियत दिखा बच्चों पर
     हवा जेल की खाता है।।

उसका जीवन कट जाएगा
     क्या अंदर या क्या बाहर।
लेकिन जिनके लाल लुट गए
    वे जा रोएँ किसके दर पर।।

बालमित्र संस्कृति हमारी
    कहे विश्व परिवार बने।
पर सेवक अपनाने छोड़े
     उन पर ठेकेदार तने।।

जिस सेवक का वेतन कोई
        बैठा ठेकेदार खा रहा।
वह दुष्कर्म करे या हत्या
        तब अचरज ही कहाँ रहा।।

शोषण देकर पोषण लोगे
      यह संभव होगा कैसे।
भींच रहे मुट्ठी में पैसे
       बच्चे भला बचेंगे कैसे।।

  -शशिपाल शर्मा 'बालमित्र'
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