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आज की कविता फिर से पढ़ती ईदगाह पर लिखी कहानी

शशिपाल शर्मा 'बालमित्र' , Sep 13, 2017, 6:40 am IST
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आज की कविता फिर से पढ़ती ईदगाह पर लिखी कहानी नई दिल्लीः भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, काल खंड और सनातन परंपरा के अग्रणी सचेता प्रख्यात संस्कृत विद्वान पंडित शशिपाल शर्मा बालमित्र द्वारा संकलित दैनिक पंचांग, आज की वाणी, इतिहास में आज का दिन और उनकी सुमधुर आवाज में आज का सुभाषित आप प्रतिदिन सुनते हैं.

जैसा कि हमने पहले ही लिखा था, पंडित जी अपनी सामाजिक और सृजनात्मक सक्रियता के लिए भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात हैं. उनके पाठकों शुभेच्छुओं का एक बड़ा समूह है.

जनता जनार्दन ने भारतीय संस्कृति के प्रति अपने खास लगाव और उसकी उन्नति, सरंक्षा की दिशा में अपने प्रयासों के क्रम में अध्यात्म के साथ ही समाज और साहित्य के चर्चित लोगों के कृतित्व को लेखन के साथ-साथ ऑडियो रूप में प्रस्तुत करने का अभिनव प्रयोग शुरू कर ही रखा है, और पंडित जी उसके एक बड़े स्तंभ हैं.

इसी क्रम में पंडित शशिपाल शर्मा बालमित्र ने एक स्वरचित कविता रची और अपने एक प्रशंसक के अनुरोध पर सस्वर पाठ भी किया. तो आप भी आनंद लीजिए. प्रस्तुत है पंडित शशिपाल शर्मा बालमित्र की कविता उनकी आवाज के ऑडियो के साथः

आज की कविता

आज की कविता फिर से पढ़ती
    ईदगाह पर लिखी कहानी।
आज पकाती है जब रोटी
    उठती यादें नई-पुरानी।।

मुंशी प्रेमचंद की गाथा
     छोटी कक्षा में जानी थी।
टोपी छोड़ खरीदा चिमटा
   हामिद की अक्ल सयानी थी।।

जले न माँ का हाथ आग पर
    उसके मन में यह आया था।
ऐसा प्यारा जज़्बा उसका
     उसके मन को भी भाया था।।

किंतु आज हर बात जुदा है
       टोपी से भी नहीं लगाव।
उसकी माता दक्ष बड़ी थी
     चिमटे का भी रहा न चाव।।

माँ ने ही उसको सिखलाया
       कैसे रोटी बनती गोल।
पकती हाथ जले बिन कैसे
     शिक्षा दे डाली अनमोल।।

जब-जब गोल चपाती सिकती
      फूल तवे पर नाच दिखाती।
माँ के मुस्काते मुखड़े की
      छवि नैनों में है छा जाती।।

बालमित्र जब तवा हो उल्टा
     हाथ पकाने वाला जलता।
जलने से हो अगर बचाना
    बिन चिमटे के काम न चलता।।

खुली आग पर भुनते पापड़
    चिमटे से पकड़े जाते हैं।
मगर तवे पर फूले फुलके
    हाथ न कभी जलाते हैं।


-शशिपाल शर्मा 'बालमित्र'*
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