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Oct 05, 2018, 18:46 pm    by : जनता जनार्दन संवाददाता
विप्लवी पुस्तकालय, प्रलेस बेगूसराय एवं नीलांबर कोलकाता के संयुक्त तत्वावधान में पिछले दिनों गोदरगावां के चर्चित विप्लवी पुस्तकालय में 'गांधी की परिकल्पना का भारत' विषय पर परिचर्चा एवं
Aug 17, 2018, 16:07 pm    by : जनता जनार्दन डेस्क
पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी जितने राजनेता के रूप में सराहे गए उससे कहीं ज्यादा अपनी कविताओं के लिए चर्चित रहे। वाजपेयी ने कई दफे अभिव्यक्ति के लिए कविता को माध्यम बनाया। व
Aug 16, 2018, 19:45 pm    by : जनता जनार्दन संवाददाता
अटल जी बेहद जिंदादिल इनसान थे. ऊंचाई पर पहुंचकर भी गर्व ने उन्हें नहीं छुआ था. अटल बिहारी वाजपेयी अगर राजनेता और भारत के प्रधानमंत्री न भी होते तो भी एक कवि, पत्रकार और हिंदी सेवी के रूप में देश
Nov 17, 2017, 11:58 am    by : विम्मी करण सूद
'जैसे' और 'पानी प्यार' के बाद रेणु शाहनवाज़ हुसैन का अगला काव्य संग्रह आने को तैयार है जिसका नाम है 'घर की औरतें और चांद' । हाल ही में रेणु ने 'द रायसन्स' में इस संग्रह में से कुछ कवित
Oct 02, 2016, 18:47 pm    by : मनोज पाठक
पार्थो दा / साम गान / के / सुर और तान / स्पंदित प्रति पल !
May 17, 2016, 13:32 pm    by : बीपी गौतम
कवि सम्मेलनों में स्वयं को हरिवंश राय बच्चन की परंपरा का बताते हुए अमिताभ बच्चन पर अपमानजनक टिप्पणी करते रहे हैं, लेकिन समय ने आज कुमार विश्वास को अमिताभ बच्चन नहीं, बल्कि हनी सिंह की परंपरा स
Jan 09, 2016, 10:15 am    by : जनता जनार्दन संवाददाता
दिल्ली में शनिवार से शुरू हो रहे विश्व पुस्तक मेले में देश और दुनिया के कई लेखकों की पुस्तकें उपलब्ध होंगी, लेकिन इस बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का उर्दू कविताओं का संग्रह '
May 26, 2015, 16:54 pm    by : अनंत विजय
रामधारी सिंह दिनकर ने साफ तौर पर लिखा है –साहित्य के क्षेत्र में हम न तो किसी गोयबेल्स की सत्ता मानने को तैयार हैं, जो हमसे नाजीवाद का समर्थन लिखवाए और न ही किसी स्टालिन की ही, जो हमें साम्यवाद
Apr 09, 2015, 16:01 pm    by : अनंत विजय
हिंदी साहित्य के लिए यह साल कुछ अच्छे संकेत नहीं दे रहा है । कई दिग्गज साहित्यकार हमसे दूर जा रहे हैं । अभी पिछले दिनों वरिष्ठ कथा-आलोचक विजय मोहन सिंह के निधन के सदमे से साहित्य जगत उबरने की को
Mar 22, 2015, 17:23 pm    by : अनंत विजय
हिंदी समाज से या यों कहें कि हिंदी प्रदेशों से कॉफी हाउस संस्कृति के लगभग खत्म हो जाने से साहित्य विमर्शों के लिए जगह बची नहीं थी । राजेन्द्र यादव के निधन से तो हिंदी साहित्य की जीवंतता भी लगभ