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Sep 16, 2017, 7:11 am    by : दिनेश्वर मिश्र
बाल्मीकिजी राम के समकालीन थे। उन्हें कहीं- कहीं दशरथ के मंत्रियों के समूह में सम्मिलित होना भी बताया गया है। अतः वे सर्वश्रेष्ठ राजा के रूप में राम को सर्व सद्गुण-संपन्नता के साथ अधिष्ठापित
Sep 15, 2017, 9:06 am    by : दिनेश्वर मिश्र
दक्षिण तो दक्षिण, उत्तर में भी राम निर्विवाद नहीं हैं । यहाँ भी उन्हें एक ओर वर्ण-ब्यवस्था के आधार पर आलोचना का विषय बनाया जा रहा है। राम शुद्र बिरोधी और ब्राह्मणवादी हैं. कोई आश्चर्य नहीं होग
Sep 14, 2017, 7:16 am    by : दिनेश्वर मिश्र
महाभारत के मुख्य नायक पांडव हैं और प्रतिद्वंद्वी उनके ही बन्धु कौरव हैं। दोनों राज्य के लिए संघर्ष करते हुए, करोड़ों ब्यक्तियों को कट जाने देते हैं। रामचरितमानस में बन्धुत्व के आदर्श राम और
Sep 12, 2017, 7:31 am    by : दिनेश्वर मिश्र
भक्ति में भगवान के दर्शन भी हो सकते हैं--यह भक्ति की विशेषता है, जबकि ज्ञान की परानिष्ठा होने पर भी भगवान के दर्शन नहीं होते। रामायण में भी भक्ति को मणि की तरह बताया है किन्तु ज्ञान को तो दीपक की
Sep 11, 2017, 7:11 am    by : दिनेश्वर मिश्र
एक तो ज्ञान का, पुरुषार्थ का मार्ग है, जिससे हम बुद्धि को निर्मल बनायें। पर तुलसीदासजी तो नन्हें बालक की तरह हैं। वे मानते हैं कि अगर बड़ा बालक हो, तो उसे अपनी गन्दगी तो धोना ही पड़ेगा, क्योंकि ब्य
Sep 03, 2017, 19:31 pm    by : पंडित शशिपाल शर्मा 'बालमित्र'
विप्र ने पहला वर भक्ति का माँगकर सभी मायाग्रस्त सभी जीवों पर क्रोध न करने का वर माँगा है। भगवान आप कृपासिंधु हैं अतः आप सब जीवों पर अक्रोध बनाए रखें। इस वर के लाभार्थी तो इस 28वें कलिकाल के वासी
Sep 02, 2017, 8:00 am    by : पंडित शशिपाल शर्मा 'बालमित्र'
हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले शिव को मैं नमस्कार करता हूँ जो तीनों प्रका के कष्टों का निवारण करते हैं । निश्चित ही त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक है। इसमें 3 तरह
Sep 01, 2017, 7:18 am    by : पंडित शशिपाल शर्मा 'बालमित्र'
विपत्ति के समय लोककल्याण के लिए कंठ में हलाहल विष को धारण करने वाले शिव ने लोगों के निरंतर कल्याण के लिए गंगा को केवल भगीरथ की तपस्या सफल करने के लिए ही धारण नहीं किया था, अपितु विष्णुजी के वामन
Aug 31, 2017, 7:36 am    by : पंडित शशिपाल शर्मा 'बालमित्र'
निर्वाणरूपं- भगवान साक्षात निर्वाणरूप हैं अतः जन्म-मरण आदि समस्त कष्टों से वहाँ मुक्ति है। ‛पुनरपि मरणं पुनरपि जननं' के भीतर ही समस्त कष्ट समाए हैं। इस प्रकार जन्म-मरण के बंधन में पड़े हम स
Aug 30, 2017, 7:30 am    by : जगदीश प्रसाद दुबे
गुरू जी मुझसे हित की बात कहते थे, परन्तु मुझे उनकी बात अच्छी नहीं लगती थी. श्री भुशुण्डि जी आग कहते हैं कि एक बार मैं शिव जी के मन्दिर में शिव नाम का जाप कर रहा था उसी समय गुरू जी वहां आ गये पर अभिम