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Mar 24, 2015, 2:07 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
पैसा सिर्फ माध्यम है, न तो साध्य न ही साधन. पैसे से आप अन्न खरीद तो सकते हो पर तभी, जब वह उपजा हो, और उपज के लिए आपको बोना तो अन्न ही पड़ेगा, पैसों की खेती होती नहीं है, हां पैसों के दम पर खेती की और करा
Mar 15, 2015, 1:32 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
यह कौन सा समाज है, जिसमें हम रह रहे हैं, और यह कौन सा भारत है, जिसमें 'स्त्री' एक शरीर से इतर कुछ और नहीं? आखिर वह कौन सी वजह है कि महिलाओं को लेकर आम से लेकर खास पुरुषों की सोच केवल 'मर्द' रूपी
Mar 07, 2015, 12:25 pm    by : जय प्रकाश पाण्डेय
आम आदमी पार्टी में जो कुछ चल रहा, उससे यह उजागर होता है कि हमारे नेताओं में अहम कितना है? और सफलता कैसे इनका दिमाग खराब कर देती है. योगेन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण का योगदान 'आप' की दिल्ली की स
Mar 03, 2015, 2:12 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
यह नरेन्द्र मोदी सरकार का पहला पूरा बजट था. इसलिए देश की जनता की उम्मीदें उफान पर थीं, क्योंकि 'अच्छे दिन' लाने का सपना दिखाने वाले पिछली बार 2014 में अंतरिम बजट के समय यह कह कर बच निकले थे कि उनक
Jan 26, 2015, 2:04 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
हम और हमारी मीडिया चाहे जितना मुगालता पाल लें, यह तय है कि अमेरिका की दोस्ती किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि भारत में कार्यपालिका के उस मुखिया से है, जो उसके लिए मौकों और बाजार के नए द्वार खोल
Jan 04, 2015, 5:15 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
होना तो यह चाहिए था कि हर बदलने वाले दिन के साथ इनसान बेहतरी की तरफ बढ़ता, पर हो इसका उलटा रहा है. 'वसुधैव कुटुम्बकम' का दर्शन मानने वाले देश के नागरिक अब मानव मात्र, सम्पूर्ण विश्व तो दूर, अपने
Oct 15, 2014, 4:37 am    by : जय प्रकाश पांडेय
वक्त बदल रहा है, पर इतनी तेजी से भी नहीं कि उससे तालमेल न बिठाया जा सके. कम से कम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देख कर तो यही लग रहा है. मोदी एक साथ इंटरनेट पर ट्‌वीटर व फेसबुक और बिल्डिंगों व सडक
Oct 08, 2014, 1:50 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
हर किसी के जीवन में कुछ घटनायें, कुछ बातें होती हैं, जो न केवल आपको झकझोर कर रख देती हैं, बल्कि जिनसे आपके जीवन की दिशा ही बदल जाती है. रत्‍नाकर डाकू से 'महर्षि बाल्मिकी' बनने और मोहन दास करमचं
Aug 15, 2012, 11:24 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
आखिर क्या हो गया हमारे लोकतंत्र को ? किसकी नजर लग गयी हमें? कहीं तो कुछ ऐसा है, जो हमसे हमारे आजादी के मायने छीन रहा है, हम वह हासिल नहीं कर पा रहे जिसका सपना अपने को कुरबान करते वक्त हमारे स्वतंत्
Apr 05, 2012, 6:27 am    by : जय प्रकाश पांडेय
किसी दौर में देश के भले और लोकतंत्र की मजबूती के लिए करोडो -अरबों रूपये का नुकसान सहने वाले स्वाधीनता सेनानी रामनाथ गोयनका के इस अखबार के मौजूदा कर्णधारों ने सेना की एक छोटी सी टुकड़ी की रूटीन