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Apr 16, 2018, 11:07 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
एक देश और उसके नागरिक के रूप में यह देखना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि बलात्कार जैसे घातक अपराध का भी जातीय-धार्मिक विभाजन हो रहा. उन्नाव हो या कठुआ, दिल्ली हो या पटना, निर्भया हो या आसिफा, बेटिया
Jan 26, 2016, 2:07 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
हर साल छब्बीस जनवरी आती है, और इसके साथ ही देश को अवसर मिलता है, उन लोगों को, स्वतंत्रता सेनानियों को, कर्णधारों को याद करने का, जिनकी बदौलत न केवल हमें आजादी मिली, बल्कि जिनके चलते हमें दुनिया का
Aug 30, 2015, 12:38 pm    by : जय प्रकाश पाण्डेय
यह कम कमाल की बात नहीं कि पूर्वोत्तर के एक राज्य असम की दसेक साल पहले तक कि एक अनजान सी महिला ने हमारे अब तक के सभ्य कहे जाने वाले समाज की चूलें हिला दी, और देश हतप्रभ होकर देखता रह गया. सोशल फोरम,
Oct 15, 2014, 4:37 am    by : जय प्रकाश पांडेय
वक्त बदल रहा है, पर इतनी तेजी से भी नहीं कि उससे तालमेल न बिठाया जा सके. कम से कम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देख कर तो यही लग रहा है. मोदी एक साथ इंटरनेट पर ट्‌वीटर व फेसबुक और बिल्डिंगों व सडक
Jan 01, 2013, 4:13 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
'प्रेम निर्झर बह गया है, रेत सा तन रह गया है !' पता नहीं क्यों 'आगत का स्वागत है' की सांसारिक, संस्कारगत और प्राकृतिक बाध्यता को स्वीकारने का दिल नहीं कर रहा। एक रस्म अदायगी भर है यह नया साल