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Nov 14, 2017, 6:56 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
यह ठीक है कि अमेरिका इस्लामिक स्टेट या बाहर के आतंकियों से निबटने में सक्षम है, पर वह घरेलू हथियार लॉबी के हाथों पड़ गए लोगों की सनक का शिकार होने से कैसे बचेगा. रंगभेदी हिंसा या कहीं भी अचानक ग
May 01, 2015, 3:31 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
देश की राजधानी दिल्ली के दिल जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी की रैली के दौरान जिस तरह से गजेंद्र सिंह की जान गई, उससे न केवल देश के किसानों की समस्या, आम आदमी की बेचारगी और उसकी किसी भी तरह से कुछ कर ग
Jan 26, 2015, 2:04 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
हम और हमारी मीडिया चाहे जितना मुगालता पाल लें, यह तय है कि अमेरिका की दोस्ती किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि भारत में कार्यपालिका के उस मुखिया से है, जो उसके लिए मौकों और बाजार के नए द्वार खोल
Jan 04, 2015, 5:15 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
होना तो यह चाहिए था कि हर बदलने वाले दिन के साथ इनसान बेहतरी की तरफ बढ़ता, पर हो इसका उलटा रहा है. 'वसुधैव कुटुम्बकम' का दर्शन मानने वाले देश के नागरिक अब मानव मात्र, सम्पूर्ण विश्व तो दूर, अपने
Oct 08, 2014, 1:50 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
हर किसी के जीवन में कुछ घटनायें, कुछ बातें होती हैं, जो न केवल आपको झकझोर कर रख देती हैं, बल्कि जिनसे आपके जीवन की दिशा ही बदल जाती है. रत्‍नाकर डाकू से 'महर्षि बाल्मिकी' बनने और मोहन दास करमचं
Aug 15, 2012, 11:24 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
आखिर क्या हो गया हमारे लोकतंत्र को ? किसकी नजर लग गयी हमें? कहीं तो कुछ ऐसा है, जो हमसे हमारे आजादी के मायने छीन रहा है, हम वह हासिल नहीं कर पा रहे जिसका सपना अपने को कुरबान करते वक्त हमारे स्वतंत्
Apr 05, 2012, 6:27 am    by : जय प्रकाश पांडेय
किसी दौर में देश के भले और लोकतंत्र की मजबूती के लिए करोडो -अरबों रूपये का नुकसान सहने वाले स्वाधीनता सेनानी रामनाथ गोयनका के इस अखबार के मौजूदा कर्णधारों ने सेना की एक छोटी सी टुकड़ी की रूटीन
Dec 31, 2011, 6:59 am    by : जय प्रकाश पांडेय
हर साल पहली जनवरी को नए साल के स्वागत से पहले दिसंबर की आख़िरी तारीखों के आते ही बीतने वाले साल की घटनाओं व उपलब्धियों के लेखेजोखे के साथ, नए साल की चुनौतियों पर चर्चा करना मीडिया की कितनी पुरात
Aug 14, 2011, 3:32 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
किसी देश के जीवन में 65 सालों की उम्र कोई खास मायने नहीं रखती, पर उसका महत्त्व तब काफी बढ़ जाता है जब यह उम्र खुली हवा में, अपनी धरती, अपना आसमान, अपने सपने, अपने अरमान और अपनी उम्मीदों के साथ हासिल क
Jun 22, 2011, 5:28 am    by : जय प्रकाश पांडेय
आजकल टेलीविजन के समाचार चैनलों पर सरकारी एड का बोलबाला है, जिसमें देश और देशवासी लहलहाते, खुशहाल और प्रसन्नचित्त दिखाई देते हैं. यहां केवल टेलीविज़न की बात इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इनमें गीत-