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Jan 01, 2013, 4:13 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
'प्रेम निर्झर बह गया है, रेत सा तन रह गया है !' पता नहीं क्यों 'आगत का स्वागत है' की सांसारिक, संस्कारगत और प्राकृतिक बाध्यता को स्वीकारने का दिल नहीं कर रहा। एक रस्म अदायगी भर है यह नया साल