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Jan 04, 2015, 5:15 am    by : जय प्रकाश पाण्डेय
होना तो यह चाहिए था कि हर बदलने वाले दिन के साथ इनसान बेहतरी की तरफ बढ़ता, पर हो इसका उलटा रहा है. 'वसुधैव कुटुम्बकम' का दर्शन मानने वाले देश के नागरिक अब मानव मात्र, सम्पूर्ण विश्व तो दूर, अपने
May 14, 2011, 4:43 am    by : जय प्रकाश पांडेय
'ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है, ये जो पब्लिक है...' संभवत: 70 के दशक में लोगों की जबान पर चढ़ चुके इस गाने की आगे की लाइनें हैं- 'हीरे-मोती तुमने छिपाए, कुछ हम लोग न बोले, पर आटा-चावल भी छिपा तो भूखो