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नित्य मानस चर्चाः उत्तरकांड व्याख्या, क्या सचमुच प्रभु लौटे निज-धाम? रामवीर सिंह ,  Jun 26, 2017
इस धरती पर वेदों की रक्षा करने वाले ब्राह्मणरूपी धान की खेती को विकसित करने के लिए आप नवीन "बृंद बलाहक" मेघों के समान हैं। प्रभु ! आप अनाथों के नाथ और दीन लोगों को प्रेम से स्वीकार करने वाले हैं। अपनी भुजाओं के बल पर आपने पृथ्वी का भार उतार दिया है। खर-दूषण को मारा है, विराध को मारकर ज़मीन में गाढ़ दिया है। इस प्रकार निशाचरों को नष्ट करने में आप कुशल हैं। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः उत्तरकांड व्याख्या, किमि गवने निज धाम रामवीर सिंह ,  Jun 25, 2017
प्रभु नगर से बाहर आ गए हैं। अयोध्या में जो मुक्ति नहीं चाहते, भक्ति चाहते हैं उन्हे नगर में छोड़ दिया। वशिष्ठ वहॉं मार्ग दर्शन के लिए पहुँच ही गए हैं। प्रभु ने नाना प्रकार के रथ, हाथी, घोड़े मँगवाए और सब साथियों को उनकी रुचि अनुरूप बॉंट दिए। हनुमानजी और भरत शत्रुघ्न जी साथ में हैं। यहॉं लक्ष्मणजी का नाम नहीं है। लेकिन जिस कल्प की कथा कही जा रही है, उसमें वे भी साथ थे। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः उत्तरकांड व्याख्या, कर्म और ज्ञान की सीमा है, भक्ति की नहीं रामवीर सिंह ,  Jun 24, 2017
कर्म और ज्ञान की सीमा है। भक्ति की नहीं। कर्म के द्वारा कर्म के बंधन नहीं छूट सकते। क्यों कि कर्म करने से ही तो वासनाएँ बनी हैं। सकाम कर्म तो हैं ही बंधन में बॉंधने वाले। वे बंधन के मैल को क्या धोएँगे। अपने अंदर के मल (काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि) जब तक रहेंगे दु:ख और अशांति तो बनी ही रहेगी। बुद्धि मलिन होगी तो अपने दुर्गुण भी अच्छे लगेंगे तथा दूसरे के गुणों में भी बुराई दिखाई देती रहेगी। वैसे भी ये मानसिक समस्याएँ हैं। केवल परमात्मा की कृपा से ही हल होती हैं। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः उत्तरकांड व्याख्या, जब बशिष्ठ जी को हुआ मोह रामवीर सिंह ,  Jun 23, 2017
ब्राह्मण का श्रेष्ठ कर्म है वेद पढ़ना और पढ़ाना। पुरोहिताई का कर्म इसलिए मंदा है क्यों कि यज्ञ करने कराने में तथा दान लेने में, यजमान और दाता की भूलचूक या पाप की ज़िम्मेदारी पुरोहित की होती है। यजमान के पापों से पुरोहित की तप:शक्ति क्षीण होती है. बशिष्ठ जी कह रहे हैं कि हे भगवान आपकी महिमा तो अपार है। मैं बखान नहीं कर सकता। वेद भी नहीं कर पाते। मैं तो उतना ही जानता हूँ जितना वेद जानते हैं। जब वेद ही ठीक से नहीं जानते तो मैं कैसे जान सकता हूँ। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः उत्तरकांड व्याख्या, असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ रामवीर सिंह ,  Jun 22, 2017
संसार में धर्म आध्यात्म की ओर मोड़ने वाले या तो प्रभु स्वयं हैं या वो जिन्हें भक्ति करते करते परमात्म भाव प्राप्त हो गया है।माता पिता भाई सब स्वार्थवश होते हैं। शिशुकाल से ही किसी भौतिक व्यवसाय में फँसाने की योजना बनाते रहते हैं। पुरजन भगवान की बात सुन कर हर्षित हैं और जब भगवान ने जाने का संकेत कर दिया तो अपने अपने घर की ओर बिदा भी हो लिए। लेकिन चलते समय भी आपस में वही चर्चा कर रहे हैं जो प्रभु ने सुनाई है। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः उत्तरकांड व्याख्या, भक्ति एक सरल मार्ग रामवीर सिंह ,  Jun 21, 2017
व्यक्ति को कोशिश करनी चाहिए कि सज्जन लोगों के साथ रहे, उन्हीं में प्रीति रखे। इस लोक से लेकर स्वर्गलोक तक के विषय सुखों को कोई महत्ता न दे, त्याग दे। भौतिकता के जाल में न फँसे, दृढ़ता के साथ भक्ति से जुड़ा रहे। कभी कभी भक्ति का पक्ष लेकर लोग ज्ञान पक्ष और शास्त्रों को हेय समझते हैं। निंदा करते हैं। यह ग़लत है। भक्ति में सरकता तो ज़रूरी है किंतु किसी से विरोध भी नहीं होना। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः उत्तरकांड व्याख्या, ज्ञान अगम और भक्ति का मार्ग सुगम रामवीर सिंह ,  Jun 20, 2017
वेदों में आध्यात्मिक विकास का क्रम है --पहले कर्मकांड, फिर उपासना और उसके बाद ज्ञान। उसके बाद परमात्म ज्ञान में दृढता की बात की गई है। ऐसा कोई ग्रंथ नहीं है जिसमें ज्ञान और कर्म की उपेक्षा करके केवल भक्ति की बात ही की गई हो। ज्ञान का मार्ग कठिन मार्ग है। वहॉं अहंकार और आसक्तियाँ को पहले पराजित करना पड़ता है। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चाः उत्तरकांड व्याख्या, मनुष्य शरीर मिलने का मूल आशय रामवीर सिंह ,  Jun 19, 2017
जीव क्या है ? सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर सहित चेतना जीव है। जब तक जीव अपने को शरीर मानता है, उसे तब तक एक शरीर से दूसरे शरीर की यात्रा करनी ही पड़ती है। इस भटकाव में काल, कर्म, गुण और स्वभाव मुख्य भूमिका अदा करते हैं। व्यक्ति जैसे कर्म करेगा वैसे उसमें गुण बढ़ेंगे। जैसे गुण होंगे वैसा व्यक्ति का स्वभाव बनेगा। जैसा स्वभाव होगा वैसा ही फल काल के हिसाब से मिलेगा। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चा, उत्तरकांड: 'एक बार रघुनाथ बोलाए, गुर द्विज पुरवासी सब आए' श्री राम वीर सिंह ,  Jun 18, 2017
पुलिस सेवा से जुड़े रहे प्रख्यात मानस मर्मज्ञ श्री राम वीर सिंह उत्तर कांड की सप्रसंग व्याख्या कर रहे हैं. राम वीर जी अपने नाम के ही अनुरुप राम कथा के मानद विद्वान हैं. फिलहाल यह चर्चा श्री राम जी के सतसंग से जुड़ी हुई है. राम राज्य की स्थापना हो चुकी है। सब लोग सुखी हैं। किसी को कोई दैहिक, दैविक या भौतिक ताप नहीं है। लेकिन जीवन का मात्र इतना ही तो उद्देश्य नहीं है। इस बात को इन पंक्तियों में पूरे संसार के कल्याण के लिए, भगवान के ही श्रीमुख से कहलवाकर उजागर किया गया है। ....  समाचार पढ़ें
नित्य मानस चर्चा: उत्तरकांड व्याख्या, समाधि से भी उच्च हरिकथा रस रामवीर सिंह ,  Jun 17, 2017
योग की आठ अवस्थाओं में समाधि अंतिम अवस्था है जब जीव की सभी वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं और ब्राह्य जगत से उसका कोई संबंध नहीं रहता। यहॉं दृष्टांत दिया है कि ब्रह्मलोक में सनकादि जैसे अन्य मुनि भी एकदम समाधि में पहुँच जाने की अवस्था में होते हैं तब भी, जब नारदजी के मुख से निसृत रामकथा सुनते हैं तो समाधि में जाना छोड़ कर कथारस में डूब जाना पसंद करते हैं। ....  समाचार पढ़ें
क्या आज वाकई योग दिवस है? आजकल हम आसन को योग और पत्ती को पेड़ कहते हैं! त्रिभुवन ,  Jun 21, 2017
हमने सिर्फ़ आसनों को ही योग का नाम दे दिया है। आसन सिखाने वाला हर व्यक्ति अपने आपको योग गुुरु घोषित कर रहा है आैर मुझे लगता है कि यह न केवल ग़लत है, बल्कि भारतीय मनीषा की मानव-समाज को सबसे बड़ी देन का यह उपहास और अवमूल्यन है और यह नाक़ाबिले-बर्दाश्त भी। ....  लेख पढ़ें
सनातन धर्म और मोक्ष की अवधारणा कमलाकांत त्रिपाठी ,  Feb 26, 2017
हिंदू (सनातनधर्मी) जीवन का अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' मानते है. 'मोक्ष' आवागमन—जन्म-मरण--के चक्र से छुटकारा. इसे और भी कई नामों से पुकारते हैं—मुक्ति, कैवल्य, परमपद, निर्वाण (बौद्ध और जैन धर्म में विशेष प्रचलित) वगैरह. व्यवहार में मोक्ष वह स्थिति है जब आत्मा अपने को शरीर (मन और बुद्धि भी शरीर के ही कम-ज़्यादा सूक्ष्म हिस्से हैं ) से पृथक्‌ मान ले. धारणा है कि जीवनकाल में भी यह सम्भव है. जनक आदि जीवनमुक्त कहे गये हैं. ....  लेख पढ़ें
महाशिवरात्रि विशेषः आदि-अनादि शिव, महाकाल कैसे! डॉ राममनोहर लोहिया ,  Feb 24, 2017
शिव बिना जन्‍म और बिना अंत के हैं। ईश्‍वर की तरह अनंत हैं लेकिन ईश्‍वर के विपरीत उनके जीवन की घटनाएँ समय क्रम में चलती हैं और विशेषताओं के साथ इसलिए वे ईश्‍वर से भी अधिक असीमित हैं। शायद केवल उनकी ही एकमात्र किंवदंती है जिसकी कोई सीमा नहीं है। ....  लेख पढ़ें
मानव कल्याण के लिए कालचक्र पूजा जनता जनार्दन डेस्क ,  Jan 04, 2017
कालचक्र अनुष्ठान दुनियाभर के उन लोगों को एकसाथ लाने का महान अनुष्ठान है, जो लोग मानवता के पक्षधर हैं, जिनके मन में करुणा, दया, सत्य, शांति और अहिंसा जैसे महान मानवीय मूल्यों के प्रति श्रद्धा और आस्था है। बौद्ध धर्म शांति और अहिंसा को मानने वाला है। इसमें धर्मयुद्ध का मतलब लोगों से युद्ध करना नहीं, बल्कि संसार में फैली बुराइयों से, दूषित चित्तवृत्तियों से लड़कर, उन्हें हराकर मानवता के, विश्वकल्याण के, सत्य-शांति-अहिंसा के धर्म का शासन स्थापित करना है। ....  लेख पढ़ें
सुबह उठ रामजी का नाम ले माता पिता के चरण छूने से मिलती है सब संपदाः मानस मधुप Fnf Desk ,  Dec 13, 2016
श्री रघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगर का काम करते हैं। उनके चरित्र देख-देखकर राजा मन में बड़े हर्षित होते हैं॥ जानिए जब कोई आपके पैर छुए तो आपको क्या-क्या करना चाहिए । किसी के पैर छूने का मतलब है उसके प्रति समर्पण भाव जगाना। जब मन में समर्पण का भाव आता है तो अहंकार खत्म हो जाता ....  लेख पढ़ें
ड्रीम द्वारका परियोजना के एक वर्ष पूरे मनोज पाठक ,  Nov 13, 2016
ड्रीम द्वारका परियोजना, ड्रीम प्रेस कंसल्टेंट्स लिमिटेड और पारिजात संचेतना मडल का सामाजिक सरोकार से जुड़ा एक संयुक्त अभियान है. इस अभियान के एक वर्ष 20 नवंबर 2016 को पूरे हो गए। इस अवसर पर साल भर की एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी । आप भी अवगत हों। ....  लेख पढ़ें
मां चंडिका स्थान: जहां दूर होती है आंखों की पीड़ा जनता जनार्दन डेस्क ,  Oct 12, 2016
बिहार के मुंगेर जिला मुख्यालय से करीब चार किलोमीटर दूर भारत के 52 शक्तिपीठों में से एक है मां चंडिका स्थान. मान्यता है कि यहां सती (मां पार्वती) की बाईं आंख गिरी थी. कहा जाता है कि यहां पूजा करने वालों की आंखों की पीड़ा दूर होती है. ....  लेख पढ़ें
बैद्यनाथधाम: जहां लगती है दुर्लभ बेलपत्रों की प्रदर्शनी जनता जनार्दन संवाददाता ,  Jul 31, 2016
महादेव के प्रिय महीने सावन में लाखों लोग प्रसिद्ध तीर्थस्थलों में एक झारखंड के देवघर जिले के बाबा बैद्यनाथधाम मंदिर पहुंचकर कामना लिंग पर जलाभिषेक करते हैं. मान्यता है कि सावन में गंगाजल से बाबा का जलाभिषेक करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, लेकिन गंगाजल के साथ बेलपत्र भी भगवान शिव को अतिप्रिय है. ....  लेख पढ़ें
यहां 'बूढ़ा देव' के रूप में पूजे जाते हैं भगवान शिव, रामेश्वरम के भस्म से होती है आरती जनता जनार्दन डेस्क ,  Jul 27, 2016
छत्तीसगढ़ की राजधानी के बूढ़ापारा स्थित स्वयंभू बूढ़ेश्वर महादेव की भस्म आरती के लिए रामेश्वरम से भस्म मंगाई जाती है. हर सोमवार को रोजाना भस्म आरती होती है. इस मंदिर की पूजा चार सौ साल पहले आदिवासी किया करते थे. यहां भोलेनाथ आदिवासियों द्वारा बूढ़ादेव के रूप में पूजे जाते रहे हैं। कालांतर में यह मंदिर बूढ़ापारा स्थित रायपुर पुष्टिकर समाज के अधीन है. ....  लेख पढ़ें
रजरप्पा.. जहां होती है बिना सिर वाली देवी मां की पूजा मनोज पाठक ,  Apr 10, 2016
झारखंड की राजधानी रांची से करीब 80 किलोमीटर दूर रजरप्पा स्थित छिन्नमस्तिके मंदिर शक्तिपीठ के रूप में काफी विख्यात है। यहां भक्त बिना सिर वाली देवी मां की पूजा करते हैं और मानते हैं कि मां उन भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। ....  लेख पढ़ें
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