साँची का असर राष्टपति भवन पर भी

साँची का असर राष्टपति भवन पर भी नयी दिल्ली: नयी दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन का हमारे देश की राजनीति में जो महत्व है, वह तो जगजाहिर है लेकिन कला की दृष्टि से यह कितनी अनमोल धरोहर है, यह बात बहुत कम लोग जानते हैं। यह इमारत न सिर्फ अपने विशालकाय स्वरूप के लिये जानी जाती है बल्कि यह स्थापत्य कला के रूप में भी नायाब है।

स्थापत्य की दृष्टि से कुछ चुनिंदा इमारतों में शुमार होने वाले राष्ट्रपति भवन के मुख्य गुंबद में ‘सांची स्तूप’ का प्रभाव स्पष्ट झलकता है। इस परिसर में स्थित इमारतों के स्थापत्य में रोमन शैली के अलावा हिन्दू, बौद्ध, जैन और मुस्लिम शैली का ‘फ्यूजन’ है।
    
पुरातत्वविद के के मोहम्मद के अनुसार, ‘‘राष्ट्रपति भवन के मुख्य गुंबद पर सांची स्तूप की शैली का गहरा प्रभाव है और इसमें इसकी तरह ही रेलिंग बनी हुई है। रायसीना हिल्स में बसी नयी दिल्ली के वास्तुविद लुटियंस इस गुंबद को रोम के ‘पैन्थीआन’ के गुंबद की तरह बनाना चाहते थे, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्हें भारतीय स्थापत्य शैलियों ने काफी प्रभावित किया।’’ उन्होंने कहा कि इस परिसर के स्थापत्य को देखा जाये तो इसमें रोमन शैली के अलावा रेलिंग, छज्जा, छतरी, जाली और बगीचों की बनावट में हिन्दू, बौद्ध, जैन और मुगल शैली का गहरा प्रभाव है।


राष्ट्रपति भवन के मुख्य गुंबद का व्यास 22. 8 मीटर है और बलुआ पत्थर से बने इस गुंबद पर तांबे का पतला आवरण :प्लेट: चढ़ा हुआ है, जो इसे क्षरण से बचाता है। मुख्य गुंबद के ठीक नीचे दरबार हॉल स्थित है, जिसके एक दरवाजे से इंडिया गेट का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। इसमें रखी पांचवीं सदी की भगवान बुद्ध की मूर्ति के पैर इंडिया गेट के शीर्ष के समानांतर पर है। भगवान बुद्ध की यह मूर्ति 1948 से 1950 के बीच लंदन में लगी भारतीय कलाकृतियों की प्रदर्शनी में शामिल थी। इस प्रदर्शनी में शामिल भारतीय कलाकृतियों को लेकर ही दरबार हाल में राष्ट्रीय संग्रहालय की आधारशिला रखी गयी थी।

राष्ट्रपति भवन के सूत्रों अनुसार, दो लाख वर्ग फुट में फैली चार मंजिली इमारत लाल बलुआ पत्थर और बलुआ पत्थर से बनी है। इस भव्य इमारत में 340 कमरे हैं। राष्ट्रपति भवन का निर्माण ‘एच’ आकार में किया गया और इसके निर्माण में 70 करोड़ ईंटों और तीस लाख घन फुट पत्थर का इस्तेमाल किया गया था।

उनके मुताबिक, 1911 में नयी दिल्ली के राजधानी बनने के बाद वाइसराय के आवास के लिए इसका निर्माण कराया गया और दिल्ली में आयी बाढ़ को देखते हुए रायसीना हिल्स को चुना गया। इसके निर्माण में चार लाख पौंड की रकम का प्रावधान किया गया था, जिसकी लागत 17 साल के लंबे निर्माणकाल में 8 लाख 77 हजार 136 पौंड :एक करोड़ अट्ठाइस लाख रुपये: हो गयी।

इतिहासकारों के अनुसार, मुगलकाल से यह स्थान जयपुर के सवाई माधोसिंह की निजी संपत्ति रही, जिसे बाद में वाइसराय हाउस के निर्माण के लिए अंग्रेजों ने खरीद लिया। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि अंग्रेजों ने इसे किससे खरीदा था।

राष्ट्रपति भवन के गेट नंबर एक के सामने जयपुर स्तंभ :कॉलम: बना हुआ है, जिसकी लागत का वहन जयपुर के महाराज ने किया था और उन्हीं के नाम पर इसका नामकरण हुआ। इसकी उंचाई 44. 2 मीटर हैं और इसके शीर्ष पर कांस्य का कमल बना हुआ है, जिसके उपर शीशे का षठकोणीय सितारा बना हुआ है। इस इमारत के अंदरूनी हिस्से में बने मेहराब रोमन स्थापत्य पर आधारित हैं, जो सीजर के जमाने से प्रभावित है। राष्ट्रपति भवन के खंभों में बने घंटों की अवधारणा को कर्नाटक के मोदाबिदरी के जैन मंदिर से लिया गया है। मुगल गार्डेन का स्थापत्य और इसमें बने फव्वारे एवं नालियां मुगलकालीन स्थापत्य की चारबाग पद्धति पर आधारित हैं।

राष्ट्रपति भवन यानी पुराने वाइसराय हाउस के मुख्य वास्तुविद एडविन लुटियंस और मुख्य इंजीनियर ह्यूज कीलिंग के साथ कई भारतीय भवन निर्माता ठेकेदारों ने इसका निर्माण किया। मुस्लिम ठेकेदार हारून अल रशीद ने राष्ट्रपति भवन की मुख्य इमारत में अधिकतम निर्माण कार्य किया और सुजान सिंह एवं उनके बेटे शोभा सिंह ने इसके प्रांगण के निर्माण में अपने कौशल का प्रदर्शन किया। हालांकि, यह आश्चर्यजनक है कि इनके नाम लुटियन्स की आधिकारिक जीवनी में नहीं मिलते हैं।
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