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आय बिलांग टू मीडिया.....

जनता जनार्दन संवाददाता , Mar 25, 2011, 13:52 pm IST
Keywords: आय बिलांग टू मीडिया.....   I Belong to Media Article   भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी  
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आय बिलांग टू मीडिया..... बीहैव युअर सेल्फ आई बिलान्ग टू मीडिया। उसके लिए यह कहना बड़ा आसान होता है। अंधों में काना राजा जो है। ‘‘माई पाथैं चिपरी, बेटवा संकल्पै भिटहुर’’ जी हाँ कुछ ऐसे ही परिवेश में वह रहता है। बाचाल है-साथ ही चालाक भी। गाँव का रहने वाला है, इसलिए एक रूपए में तीन अठन्नी भुनाता है। अनेको बार मुझसे मिला, बोला कि उसे भी प्रेस से सम्बद्ध कर दूँ, वह मीडिया परसन कहलाना चाहता है। मैंने कहा कि मेरे गुरूकुल में प्रवेश ले लो फिर कुछ वर्शों उपरान्त स्वयं वह बन जावोगे जो बनना चाहते हो। उसके गोबर भरे मस्तिश्क में मेरी बात नहीं घुसी। अब पता चला है कि वह किसी ‘गुरूघंटाल’ का गैंग ज्वाइन करके अपनी हसरत पूरी कर रहा है।

उसके पास इतनी अक्ल है कि उसे बाँट-बाँट कर थक जाता है फिर भी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। आज तक मैं उसका उद्देश्य नहीं समझ पाया हूँ, आखि रवह प्रेस/मीडिया परसन बनकर/कहलाकर करना क्या चाहता है। आश्चर्य होता है जब एक ‘आवेदन-पत्र’ न लिख पाने वाला कोई कथित शिक्षित युवक पत्रकार बनना चाहता हो। उसके बारे में थोड़ा बता दूँ (जैसा सुना है)। वह अपने माँ-बाप का इकलौता पुरूश संतान है। उम्र 25 वर्श शादी नहीं हुई है। शिक्षा कितनी यह तो नहीं मालूम-हाँ यह सुना है कि तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने के नाम पर घर का लाखों खर्च करवा चुका है। परिधान वही जैसा आधुनिक अल्पशिक्षित नवयुवक धारण करते हैं। मसलन महिलाओं की ब्लाउज सी शर्ट जिस ‘शार्ट-शर्ट’ (लघु-कमीज) और दर्जन भर पैबन्द लगे पैण्ट औश्र तीन चार मोबाइल सेट साथ ही ‘वाकमैन’ पर संगीत का आनन्द लेने में विशेश रूचि। किसी एक स्थान पर 5 मिनट से ऊपर स्थाई तौर पर एकाग्र होकर बैठना शायद उसकी कुण्डली में ही नही है। बाचाल इतना कि हिन्दी से लेकर आंग्लभाशा तक की ऐसी की तैसी कर डालता है।

जीवन का चौथाई शतक समाप्त फिर भी ‘अस्थिर’। माँ-बाप को बेवकूफ बनाने का नतीजा वह शायद नहीं जानता? अपने कैरियर के बारे में वह क्यों नहीं गम्भीर हो रहा है? कब होगा जब समय बीत जायेगा? कौन समझाए उसे। उसके हम उम्र लड़के बगैर किसी उद्देश्य के उसी की तरह घूट टहल रहे हैं। पता नहीं उसे मीडिया (प्रेस) का शौक क्यों आया। ताज्जुब तो यह कि वह बगैर शिक्षित/प्रशिक्षित हुए पत्रकार का तमगा लेना चाहता है। पहले कभी-कभीं आ जाया करता था, लेकिन अब नहीं आता। उसे इस बात की आशंका है कि कहीं उसे ‘नसीहत’ न देना शुरू कर दूँ। मीडिया क्षेत्र तो अच्छा है मैं चाहता हूँ कि पहले वह वर्तमान परिदृश्य में पत्रकारिता/मास कम्युनिकेशन का प्रशिक्षण प्राप्त कर ले तब आटो बाइक पर ‘प्रेस’ का ‘स्टिकर’ लगाने में अच्छा लगेगा, साथ ही आसका परसनैलिटी भी निखरेगी। बाचाल होने की जरूरत नहीं। सीखने, समझने, सुनने और पढ़कर जानकारी हासिल करके ही एक अच्छा पत्रकार बना जा सकता है। अल्प जानकार लोग सब कुछ उल्टा-पुल्टा करते हैं। मसलन पुलिस कप्तान से विकास कार्यों के बारे में और विकास अधिकारी से ‘ला एण्ड आर्डर’ की जानकारी चाहते हैं। कई बार ऐसा देखने को मिला है जब पत्रकार कहलाने वालों ने कुछ इसी तरह के प्रश्न प्रेसवार्ताओं में मेजबान अधिकारियों से किया है।

एक बात बता दूँ कि मेरा कोई एक गुरू इस क्षेत्र में नहीं रहा। मैं जब भी सोचता हूँकि बिन गुरू होय न ज्ञान याद आता है और कबीरदास जी जैसे महापुरूशों की याद बरबस आने लगती है। कबीरदास जी ने भी अपना गुरू काशी के पं0 रामानन्दजी को किस तरह बनाया था यह जग जाहिर है। पे्रस/मीडिया में आने के पूर्व मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि इस क्षेत्र में स्थापित होकर जन सेवा करूँगा। अब अतीत पर दृश्टिपात करता हूँ तो यह पता नहीं चल पाता कि ‘पत्रकारिता’ के क्षेत्र में बुलन्दी पर पहुँचाने में किसकी प्रेरणा या हाथ रहा...? एक वकील साहब हैं उम्र यही कोई 70 वर्श हिन्दी के संवाद शुरूआती दौर में लिख लेता था, लेकिन अंग्रेजी लिखने का सऊर नहीं था। 1968 में वकील साहब दि पायनियर लि0 में सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे, अंग्रेजी संवाद लिखने के लिए मैंने उन्हें अपना गुरू बनाया। बस एक समस्या परक संवाद को उन्होंने लिखवा दिया तभी से माँ सरस्वती की कृपा से मुझे आँग्लभाशा में लिखने का हुनर आ गया।

कालान्तर में कई एक जगहों पर वकील साहब ने पत्र लिखकर मुझे भेजा तत्समय 70-80 के बीच कई जानी-मानी हस्तियों से मुलाकात का सुअवसर मिला। लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, वाराणसी के संपादकों पत्रकारों से मिला उनके सम्पर्क से काफी कुछ सीखा। वह लोग उम्र दराज थे सो अब इस दुनिया में नही हैं। फिर भी मैं उनकी सरलता का कायल हूँ और उन्हें अपना आदर्श मानता हूँ। लेकिन........... आज के युवा किसी भले मानुश की संगति में जाना ही नहीं चाहते। अनुशासन उन्हें प्रिय नहीं, ये लोग कुसंगति में पड़कर अपना कैरियर चौपट कर रहे हैं।
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