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मैं कलयुगी इंसान हूँ

जनता जनार्दन संवाददाता , Mar 25, 2011, 13:28 pm IST
Keywords: मैं कलयुगी इंसान हूँ   भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी   Today's Man   
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मैं कलयुगी इंसान हूँ मैं कौन हूँ। अयोध्या का राजा दशरथ (त्रेतायुग)। बृहन्नला के रूप में अर्जुन (द्वापर युग) अथवा राजा त्रिशंकु (सत्युग)। यह घोर कलयुग है यानि मशीनरी काल। सोचता हूँ अपने बारे में, लोगों के बारे में। तुलना करता हूँ परन्तु असफल होता हूँ अपनी सोच का उत्तर पाने में। कौन अपना-कौन पराया? जब इस पर सोचता हूँ तो मस्तिश्क के ऊतकों में अजीब सा fखंचवा उत्पन्न होने लगता है। अपने-पराए में अन्तर होता होगा, क्योंकि बगैर अन्तर के जीवन का कोई भी अंश पूर्ण नहीं होता। अपनों के बारे में क्या सोचूँ सोच-सोच कर हलकान होता हूँ। लोगों के रंग बदलने से प्रायः असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है तब समझ नहीं पाता कि इन्हें अपना ही कहूँ या फिर न कहू?

पराया कौन जिसे मैं जानता ही नहीं। सभी तो अपनो जैसे ही लगते और दिखते हैं। इनके क्रिया-कलाप कभीं पराया होने का यहसास ही नहीं होने देते। बहरहाल! मुझे अपने पराए में भेद का ज्ञान नहीं हो पाता है। यह सोच ही तो है, यदि ऐसा न होता तो मैं सुखी इन्सान होता। सुखी व्यक्ति वह है जो सोचता नहीं है। अपने पराए का अन्तर नहीं ढूँढ़ता है। क्या करूँ कैसे सोचने की आदत छोड़ूँ? आदमी हूँ मस्तिश्क रखता हूँ वह भी स्वस्थ, तब भला ऐसे में सोचना कैसे टूट सकता है?

अपना-पराया की बातें छोड़िये अब कुछ ऐसी बातें की जाएँ जिनसे कुछ लाभ हो। लाभ कैसा यह भी तो अनेक प्रकार का होता है। आर्थिक, मानसिक एवं शारीरिक/सामाजिक लाभ। देखता हूँ हर कोई आर्थिक लाभ के चक्कर में भाग-दौड़ कर रहा है। मेरे भी हाथ पैर हैं, यदि चाहूँ तो भाग-दौड़ कर सकता हूँ। फिर ऐसा क्यों नहीं करता? यह प्रश्न सीधा तो है परन्तु मुझे इसका उत्तर नहीं मालूम। उत्तर प्राप्ति के लिए क्या करना चाहिए? मूल विशय पर आता हूँ आखिर मैं कौन हूँ आखिर मैं कौन हूँ......? लोग मुझे क्या समझते हैं? न तो मैं अवध नरेश हूँ न ही बृहन्नला के रूप में अर्जुन और न ही राजा ‘त्रिशंकु’ हूँ। क्योंकि ये लोग इस युग के नहीं थे। ये सभी सत्युग, त्रेता, द्वापर युगीन हैं।

मैं तो शुद्धरूप से कलयुगी मानव हूँ। मानव हूँ तो गुणों की खान होगी मुझमें। जी हाँ गुण तीन होते हैं, जो मानव में ही विद्यमान होते हैं, जिस मानव में ये गुण नहीं होते वह ‘देव’ तुल्य होता है जिसकी पूजा किए जाने के बारे में धर्म-ग्रन्थों में लिखा है। बहरहाल! मैं कौन हूँ- प्रश्न यह है। यह प्रश्न आप ने नहीं पूँछा है यह मैं स्वयं अपने आप से कर रहा हूँ। सर्व प्रथम मैं एक इंसान हूँ, जिसे एक माँ ने अपनी ‘कोख’ से जन्म दिया है। इतना ही काफी नहीं है। मैं पति, पिता, दादा, भाई सभी रिश्तों से बंधा हूँ। मैं एक ऐसा इंसान हूँ जो एक प्रेमी भी है। इतने सारे रिश्तों को कैसे निभा पाता हूँ यह प्रश्न आप की जेहन में उभर सकता है। लाजमी है कि सवाल उठे और उसका माकूल उत्तर दिया जाए।

जहाँ तक मेरी अपनी जानकारी है मुझे झूठ से ‘एलर्जी’ है। मैं जिम्मेदार लोगों की कद्र करता हूँ। मेरी निगाह में जिम्मेदार वह होता है जो ईमानदार होता है। लालच से दूर एक इंसा नही ईमानदार हो सकता है। खुदगर्ज वह होता है जिसमें दृढ़ इच्छा शक्ति का नितान्त अभाव होता है। मेरा पाला खुदगर्जों से भी पड़ा है, अब भी पड़ता ही रहता है। मैं उन्हें बेचारा मानता हूँ-उनकी बेचारगी/लाचारी पर तरस खाता हूँ। अब अन्त में चौंकिए मत ज्यादा नहीं लिखूँगा, क्योंकि इसका प्रचलन समाप्त हो गया है।

एस0एम0एस0 का युग है, आप बोर न हो इस लिए इसका उपसंहार करता हूँ इन शब्दों के साथ कि हे लेखकों यदि तुममें दृढ़ इच्छा शक्ति है और ईमानदार हो तो आओ मुझसे हाथ मिलाओ। एक-एक ग्यारह होते हैं, आप सच मानिए कि आप की हर इच्छा पूरी होगी। आपके सपने पूरे होंगे। बशर्ते आप में खुदगर्जों जैसी बेचारगी न हो। आप दिल से गरीब न हों दृढ़ इच्छा शक्ति के स्वामी हों आप एक अच्छे इंसान हों। मैं भी एक इंसान हूँ अच्छा/बुरा हूँ इसका आंकलन दूसरों के ऊपर छोड़ता हूँ। कहने का लब्बो-लुआब यह कि मैं एक इंसान हूँ वह भी कलयुगी।
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