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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022– अफगानिस्तान की घटनाओं के सन्दर्भ में, 15 से 31 अगस्त 2021 के मुद्दों पर आधारित

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022– अफगानिस्तान की घटनाओं के सन्दर्भ में, 15 से 31 अगस्त 2021 के मुद्दों पर आधारित
साम्राज्यों के कब्रगाह’ के तौर पर मशहूर अफगानिस्तान में चल रहे राजनीतिक संकट से क्या उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव 2022 भी प्रभावित हो सकता है? आजकल यह सवाल बहुत तेजी से विभिन्न मीडिया चैनल एवं सोशल प्लेटफार्म पर चल रहा है. मुख्यमंत्री योगी1 ने स्वयं विधानसभा में इस घटना का उल्लेख करते हुए उन लोगों को आगाह किया जो तालिबानी मानसिकता रखते हैं. भाजपा के बड़े नेता और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम माधव2 ने 1921 में केरल में हुए ‘मोपला विद्रोह’ को पहला तालिबानी मानसिकता वाला विद्रोह बताया, जिसे वामपंथी दल क्रान्ति का नाम देते हैं. वहीँ दूसरी ओर संभल से सपा सांसद शफीकुर रहमान बर्क1 एवं प्रख्यात शायर मुन्नवर राणा1 एवं आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य सज्जाद नोमानी1 ने भी तालिबानी सत्ता को लेकर विवादित बयान दिया. इन बयानों से उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया में तेज़ी आ सकती है. आने वाले समय में अभी और भी विवादित बयान सामने आएंगे. सवाल फिर यही उठता है कि क्या ये बयान स्वाभाविक सोच का हिस्सा हैं अथवा जानबूझकर कर मतदाताओं की गोलबंदी करने के उद्देश्य से दिए जा रहे हैं? इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में भारत की विदेश नीति, राजनय, राष्टीय हित एवं नेतृत्व कहाँ खड़ा है? इसकी पड़ताल न सिर्फ अपरिहार्य है, वरन भारत के लोकतांत्रिक विकास के साथ इसके अन्तर्निहित समबन्ध को समझना भी आवश्यक है. 
    
अफगानिस्तान के साथ भारत का सांस्कृतिक एवं राजनीतिक रूप से एक अटूट सम्बन्ध रहा है. खान अब्दुल गफ्फार खान उर्फ़ सीमान्त गाँधी को कौन भूल सकता है. तमाम हिंदी फिल्मों की शूटिंग अफगानिस्तान में हुई है. हिंदी फिल्मों के गाने वहां बहत लोकप्रिय हैं, जबकि पाकिस्तानी फिल्मों के गाने उतने नहीं. ऐतिहासिक रूप से भी अफगानिस्तान भारत का एक हिस्सा रहा है. बुद्ध का संदेश वहां भी पहुंचा. स्वाभाविक हीं है कि वहां घट रहे किसी भी घटनाक्रम से हम अनजान बने नहीं रह सकते हैं और न हीं आँखे मूंद सकते हैं. ऐसा करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना हीं कहा जाएगा. परन्तु अगस्त महीने में तेजी से परिवर्तित हो रहे घटनाक्रम पर अभी तक भारत ने कोई भी उचित प्रतिक्रिया नहीं दी है. क्या इसे मोदी की असफलता मानी जाए अथवा विदेश नीति की असफलता या फूंक फूंक कर कदम रखने की नीति? ऐसा लगता है कि भारत को काठ मार गया है. किसी भी देश ने इतने अप्रत्याशित ढंग से घटनाओं के घटने की प्रत्याशा नहीं की थी. परन्तु चीन, पाकिस्तान, रूस और क़तर पूरी तरह से तैयार थे. 10 और 11 अगस्त के शांति वार्ता में भारत को पूछा भी नहीं गया. 12 अगस्त की वार्ता में रूस के जोर देने पर ‘विस्तारित ट्राइका मीटिंग’ में भारत के विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव जे. पी सिंह किसी प्रकार शामिल हो सके. विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के माध्यम से सम्मलेन को संबोधित किया. एक प्रकार से, भारत जुलाई से प्रारंभ हुए शांति वार्ता के सभी दौर से बाहर हीं रहा है, जबकि सबसे ज्यादा प्रभावित भारत,  पाकिस्तान और ईरान होगा. अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण से आज भारत गहरे दबाव में है. 30 अगस्त को अमेरिका ने अपने सारे सैनिकों को वापस बुला लिया और अफ़ग़ानिस्तान को उसके भाग्य पर छोड़ दिया है. वह भाग्य जिसे उसने 20 वर्षों में बदलने की कोशिश नाकाम की, परन्तु युद्ध के नियमानुसार उसे न सिर्फ ख़ाली हाथ वरन सब कुछ लुटाकर अपनी हार की पटकथा भी स्वयं लिखकर वापस होना पड़ा है. अमेरिकी युद्ध के इतिहास में यह एक बड़ी पराजय में दर्ज हो चुका है. परन्तु क्या इसे तालिबानियों की विजय मान लिया जाय? ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी. जिस प्रकार से पंजशीर प्रांत के बीहड़ों में तालिबान को संघर्ष करना पड़ रहा है वो किसी भी प्रकार से भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं दिखा रहा है. स्वयं वहां के नागरिकों ने इनके खिलाफ जगह जगह प्रदर्शन किये हैं. एक प्रकार से गृह युद्ध की स्थिति बनती दिख रही है. 
   
 बदली हुई परिस्थिति में अफगानिस्तान में धार्मिक कट्टरता बहुत तेजी से बढ़ सकती है. तथा स्त्रियों के लिए हालात बहुत हीं ख़राब हो सकते हैं. काबुल एअरपोर्ट से आ रहे दृश्यों को देखकर रोंगटे खड़े हो जा रहे है. रोजमर्रा की वस्तुओं का अभाव हो गया है और बहुत हीं महंगे हो गए हैं. ऊपर से अफगानिस्तान के लगभग 9 अरब डॉलर के स्वर्ण और विदेशी मुद्रा भंडार पर अमेरिका का नियंत्रण है. अपने आर्थिक जरूरतों को पूरा करने हेतु यह बहुत हद तक अमेरिका पर निर्भर है. यह भी हो सकता है कि तालिबान अभी तक के अपने व्यक्तित्व से हटकर थोडा उदारवादी रवैया अपनाए और अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को नया संदेश देने का भ्रम पैदा करे. 1 सितंबर से सरकार बनाने हेतु बहुत तेजी से प्रयास किये जा रहे हैं. मुल्ला अखुंदजादा के नेतृत्व में नई सरकार का गठन संभावित है, जिसमे अन्य प्रमुख लोगों में मुल्ला अब्दुल गनी बरादर, मुल्ला उमर का बेटा मुल्ला मावलावी याकूब और हक्कानी नेटवर्क प्रमुख सिराजुद्दीन हक्कानी शामिल हो सकते हैं. ‘काबुल का कसाई’ के नाम से मशहूर गुलबुदीन हिकमतयार की भी बड़ी भूमिका होने जा रही है. उसने अपने संबोधन में भारत को चेताया भी है. 
     
एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में संयुक्त राष्ट्र संघ के 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद् में भारत ने अगस्त माह में अध्यक्ष के पद का निर्वहन किया. रूस और चीन के अनुपस्थिति में बहुत सारे प्रस्तावों में प्रस्ताव संख्या 25933 ने इस बात को रेखांकित किया कि तालिबान अपने जमीन का उपयोग आतंकवादी समूहों को नहीं करने देगा तथा वे अफ़ग़ान नागरिक जो देश छोड़ना चाहते हैं, उन्हें वहां से सुरक्षित निकलने का रास्ता देगा, जैसा कि तालिबान ने वादा किया है. इस बात को लेकर आशंका बलवती हो गयी है कि तालिबान उन अफ़ग़ान नागरिकों को देश से बाहर नहीं जाने देगा जिन्होंने अमेरिकी प्रभुत्व के दिनों में उनकी मदद की थी. 
    
भारत के सन्दर्भ में तालिबान - 2 (पहला 1996 से 2001 तक) का शासन बहुत बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है. विदेश नीति, राजनय और कूटनीति की प्रारम्भिक परीक्षा में भारत फेल हो चुका है. जिस मोदी के विदेश नीति की प्रशंसा चहुँओर हो रही थी, वह एकदम से बेपटरी होता हुआ दिख रहा है. कश्मीर को लेकर लगातार बयान भी आ रहे हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने तो तालिबानी शासन को ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ से कहकर संबोधित किया है, परन्तु हम अभी भी ‘वेट एंड वाच’ की पालिसी पर हीं चल रहे हैं. साफ़ है कि आने वाले समय में भारत के लिए अपने पडोसी देशों से गंभीर चुनौती पेश होने वाला है. वहीँ दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के चुनावी सन्दर्भ में तालिबानी सत्ता के बरक्स एक साम्प्रदायिक सोच भी विकसित करने का पूरा प्रयास किया जा रहा है. परन्तु जाने अनजाने इसके विरोध में हम स्वयं भी उसी तालिबानी सोच को बढ़ावा दे रहे हैं, जो बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. सरकार को ऐसे तत्वों को चिन्हित करके उनके खिलाफ़ कठोर कार्यवाही करनी चाहिए. वैसे भी भारत में चुनाव के पहले कुछ शरारती किस्म के लोग माहौल बिगाड़ने हेतु इस प्रकार के कुत्सित प्रयास में लगे रहते हैं. इधर समाजवादी पार्टी और कुछ छोटे दल चुनावी यात्रा का आयोजन लगातार कर रहे हैं. सपा की ‘किसान नौजवान यात्रा’, इसकी सहयोगी जनवादी पार्टी की ‘जनक्रांति यात्रा’, महान दल की ‘जनाक्रोश यात्रा’, अधिवक्ता सभा की ‘संविधान बचाओ, संकल्प यात्रा’ आदि प्रमुख यात्राये जारी हैं. इसका प्रभाव जनता के ऊपर कितना पड़ता है, यह अभी स्पष्ट नहीं है. परन्तु महंगाई, बेरोजगारी, किसान आन्दोलन और कोरोना का टीस जनता को जरूर परेशान कर रहे हैं.  
 
स्रोत:-एन.डी.टी.वी, हिन्दुस्तान टाइम्स एवं आज तक चैनल का विडियो, 19 एवं 20 अगस्त 2021
द प्रिंट, ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल, 19 अगस्त 2021 
द हिन्दू, 31 अगस्त 2021

#डॉ संजय कुमार
एसो. प्रोफेसर एवं चुनाव विश्लेषक 
सी.एस.एस.पी, कानपुर
                                                                                                                        संपर्क सूत्र: 8858378872
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