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समुद्री शैवाल के क्षेत्र में सहकारी समितियों के उद्यमिता विकास पर अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार

समुद्री शैवाल के क्षेत्र में सहकारी समितियों के उद्यमिता विकास पर अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार नई दिल्लीः समुद्री शैवाल से जुड़े व्यवसाय में सहकारी समितियों की भूमिका पर एक अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन राजधानी में हुआ. भारत सरकार के पशुपालन और मत्स्य मंत्रालय के मत्स्य पालन विभाग, एनआईएनएसी-राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि और सहकारिता विभाग तथा बैंकॉक के एनईडीएसी ने संयुक्त रूप से इस वेबिनार का आयोजन किया था.

एनईडीएसी बैंकॉक के निदेशक और इस वेबिनार के समन्वयक प्रोफेसर कृष्णा आर. सालीन ने विषय प्रस्तावना से पहले सही अवसर पर ऐसे महत्त्वपूर्ण विषय पर वेबिनार आयोजित करने के लिए राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम के प्रबंध निदेशक संदीप नायक का धन्यवाद ज्ञापित किया.

इस अवसर पर सभी का स्वागत करते हुए एनसीडीसी के एमडी श्री संदीप नायक ने बताया कि इस वेबिनार में शामिल एनईडीएसी सही मायने में एशिया-प्रशांत क्षेत्रों के समुद्र तटीय देशों के साथ समुद्री शैवाल के उत्पादन को बढ़ाने और उसकी चुनौतियों से निबटने की साझेदारी में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. इस वर्चुअल आयोजन में वियतनाम, फिलिपींस और कनाडा जैसे कई देशों के विशेषज्ञ भी शिरकत कर रहे हैं. नायक ने यह भी बताया कि इन प्रयासों से समुद्री शैवाल की खेती को बढ़ावा देने के लिए एशियाई प्रशांत देशों के साथ संबंध बनाने की कोशिश की जा रही है.

मत्स्य विभाग के सचिव और वेबिनार के मुख्य अतिथि ने डॉ. राजीव रंजन ने 'भारत में समुद्री शैवाल खेती और मूल्य श्रृंखला विकास' पर एक खास प्रस्तुति दी. उन्होंने सरकार द्वारा समुद्री शैवाल की खेती में भारत की बढ़त बनाने के लिए तैयार की गई कार्य योजना और रणनीति के बारे में भी विस्तार से बताया. उनका कहना था कि समुद्री शैवाल का अंतरराष्ट्रीय बाजार बहुत बड़ा है, जिसमें चीन, जापान और इंडोनेशिया की हिस्सेदारी 80% के आसपास है. हमें उनके इसी कारोबार में सेंध लगानी है. जापानी केल्प, एयुकेमा और ग्रासिलारिआ शीर्ष प्रजातियां हैं. संयुक्त रूप से ये लगभग 70% उत्पादन करते हैं. ये अधिकांशतः लीवर, अगर अगार, रेडीवेयेड्स और अण्डारिया पिनफिटिडा (भूरा शैवाल) का व्यापार करते हैं. भारत के पास लगभग 7,500 किमी की तटीय रेखा है, जो संभावित समुद्री कृषि क्षेत्र हो सकती है.

वर्तमान में, भारत में समुद्री शैवाल की खेती उत्पादन बमुश्किल 20,000 टन है, जो अमेरिकी डॉलर में केवल 50 करोड़ मिलियन है.

डॉ. रंजन ने कहा कि सरकार समुद्री शैवाल के कारोबार को लेकर बहुत गंभीर है, क्योंकि इस क्षेत्र में विश्व कारोबार लगभग 12 बिलियन अमरीकी डॉलर का है. अनुमान है कि यह 2026 तक 26 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक की कमाई करेगा. इसमें खेती के तरीके को बदलने की क्षमता है. उन्होंने बताया कि समुद्री शैवाल की लगभग 844 प्रजातियां भारतीय समुद्रों से प्राप्त हुई हैं, जिनका स्थायी स्टॉक लगभग 58,715 टन (गीला वजन) होने का अनुमान है.

डॉ. रंजन ने दावा किया कि भारत में समुद्री शैवाल की 221 से अधिक प्रजातियां ऐसी हैं, जिनके जरिए भारत दुनिया में समुद्री शैवाल बिजनेस में अहम हिस्सेदारी निभा सकता है. भारत के अंडमान-निकोबार, तमिलनाडु, लक्षद्वीप से लेकर गुजरात तक के लंबे समुद्री क्षेत्र में वाणिज्यिक शैवाल की प्रजातियां मौजूद हैं. अगर इनका सही से इस्तेमाल किया जाए तो भारत जल्द ही जापान, चीन, इंडोनेशिया के प्रभुत्व वाले इस बाजार में अहम हिस्सेदारी हासिल कर सकता है.

डॉ रंजन ने बताया कि सरकार ने इन पोषण युक्त समुद्री पौधों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए पहले ही 637 करोड़ रुपए आवंटित कर दिए हैं, जो कि अगले पांच साल में मुख्य रूप से सब्सिडी समर्थन के रूप में खर्च की जाने वाली 20,050 करोड़ रुपए की प्रधान मंत्री संपर्क योजना (पीएमआरवाई) नामक केंद्रीय योजना खर्च का हिस्सा है. इस योजना के तहत कार्यान्वयन एजेंसियों द्वारा तटीय क्षेत्रों में एफएफपीओ के गठन और प्रचार को बढ़ावा देने, सहकारी समितियों और महिलाओं के स्वयं सहायता समूह के संभावित विकास के लिए गहन प्रयास किए जाएंगे.

अपने विस्तृत प्रजेंटेशन का अंत डॉ रंजन ने यह कहते हुए किया कि यह व्यापार लैंगिक स्तर पर तटस्थ है और महिलाओं को भी समान रूप से मौका मुहैया कराता है. तटीय क्षेत्रों और समुदायों की महिलाएं बिना अधिक निवेश के समुद्री शैवाल की खेती कर सकती हैं. डॉ. रंजन ने कहा कि CSIR-CSMCRI और CMfRI नामक संस्थान इस क्षेत्र में तकनीकी ज्ञान प्रदान करते हैं. खास बात यह कि समुद्री शैवाल की फसलें 45 दिनों में तैयार हो जाती हैं.

इस अवसर पर खाद्य और प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव मनोज जोशी ने उत्पादन शुरू करने के लिए कुछ समूहों पर ध्यान केंद्रित करने और योजनाओं के अभिसरण सुनिश्चित करने पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि उनका मंत्रालय समुद्री शैवाल आधारित भोजन का समर्थन करने और वास्तव में पहले से ही अखिल भारतीय स्तर पर केंद्र प्रायोजित पीएम-एफएमई स्कीम को वित्तीय, तकनीकी और व्यावसायिक सहायता प्रदान करने के लिए मौजूद है.

कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू ब्रंसविक के मरीन बायोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. थियरी चोपिन ने बताया कि कैसे समुद्री शैवाल, इंटीग्रेटेड मल्टी-ट्रॉफिक एक्वाकल्चर (आईएमटीए) का एक प्रमुख घटक है और किस तरह वह महत्त्वपूर्ण ढंग से पारिस्थितिकी तंत्र के क्षेत्र में अपनी सेवा उपलब्ध कराता है. उन्होंने कहा कि 'समुद्री-खरपतवार समुद्री भोजन से अधिक होते हैं'.

ब्लॉसम कोचर ग्रुप, इंडिया के  चेयर डॉ ब्लॉसम कोचर ने कॉस्मेटिक्स उद्योग में समुद्री शैवाल के उपयोग और उनके लाभों के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने बताया कि स्किनकेयर उत्पादों, जिनमें मॉइस्चराइज़र, एंटी-एजिंग, एंटीऑक्सिडेंट, त्वचा की मरम्मत और उत्थान, क्लेंसेर उत्पाद आदि शामिल हैं, में इनके उपयोग की बड़ी भूमिका है.

भारत की एक्वा एग्री, जो कि तमिलनाडु के प्रतिबंधित जिलों में 600 से अधिक मछुआरों के साथ काम करती है और प्रति वर्ष कम से कम 600-800 टन समुद्री शैवाल की खेती करता है, के अभिराम सेठ ने बताया कि इस क्षेत्र में बहुत अवसर हैं. उन्होंने यह भी बताया कि कैसे उनकी कंपनी इस क्षेत्र से जुड़े विभिन्न उत्पान क्षेत्रों में काम करती है.

वेबिनार में कविता नहेमायाह, डॉ. गुयेन वान गुयेन, डॉ. एनिसिया क्यू हर्टाडो, बंगाल की खाड़ी में आईजीओ कार्यक्रम के निदेशक डॉ. युगराज यादव, महाराष्ट्र सरकार के मत्स्य आयुक्त डॉ. अतुल पाटने ने भी अपने विचार रखे. इस अवसर पर एनसीडीसी के डॉ. राजेश गोपाल और नीलेश पाटिल ने देश में समुद्री शैवाल परिदृश्य पेश किया और बताया कि किस तरह भारत सरकार 3 सी अवधारणा को बढ़ावा दे रही है. 3 सी यानी : कोऑपरेटिव-कॉर्पोरेट-कोलैबरेशन, जिसमें सीआईआई, एसोचैम, पीएचडीसीसीआई, आईसीसी और इस क्षेत्र से जुड़े अन्य घराने शामिल हैं.
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