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Laxmii Review: यह फिल्म बम नहीं है, इसमें धुआं ज्यादा है

जनता जनार्दन संवाददाता , Nov 10, 2020, 9:59 am IST
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Laxmii Review: यह फिल्म बम नहीं है, इसमें धुआं ज्यादा है इस दिवाली अगर लोगों को लक्ष्मी बम पर आपत्ति है तो तय मानिए हरी झंडी अक्षय कुमार को भी नहीं मिलने वाली. एक फार्मूला हॉरर फिल्म में ट्रांसजेंडर मुद्दे को जोड़कर उन्होंने समाज सुधार का पाठ पढ़ाने की कोशिश की है मगर हकीकत में वह उलटे इस समाज के लोगों का नुक्सान ही करते हैं. जिस तरह से ट्रांसजेंडर किरदार में अक्षय और शरद केलकर नज़र आते हैं, वह कहीं से इस वर्ग की नई अथवा संभावित आधुनिक तस्वीर नहीं बनाते. न ही उन्हें नए सहज-सकारात्मक रूप में दिखाते हैं. वास्तव में वह ट्रांसजेंडरों की उसी पारंपरिक छवि को मजबूती देते हैं जिसमें वे रहस्यमयी और लगभग डरावने हैं. हॉरर को यहां ट्रांसजेंडर से मिक्स करके निर्देशक ने कॉमेडी गढ़ने की नाकाम कोशिश की है. शुरू से अंत तक फिल्म में कुछ भी नया, फार्मूला मुक्त या मनोरंजक नहीं है. सिर्फ अक्षय कुमार के नाम पर आप इसे देखना चाहें तो देख सकते हैं. लेकिन उनका किरदार भी यहां लव जेहादी विवाद में फंस हुआ है. हैरानी की बात है कि लक्ष्मी बम टाइटल पर लोगों को आपत्ति थी तो निर्माताओं की टोली ने इसे लक्ष्मी कर दिया मगर फिल्म में अक्षय कुमार के किरदार का नाम आसिफ से क्यों कुछ और नहीं किया!


ओटीटी प्लेटफॉर्म डिज्नी हॉटस्टार पर आई लक्ष्मी 2011 में आई तमिल फिल्म कंचना का हिंदी संस्करण हैं. जिसमें कुछ फेर-बदल भी हैं. जिनमें सबसे खास है हीरो का आसिफ बनना. जी हां फिल्म में अक्षय ऐसे युवा मुस्लिम बने हैं, जो अपनी तर्क विद्या से जादू-टोना और तंत्र-मंत्र करने वालों का पर्दाफाश करता है. उसने एक हिन्दू लड़की रश्मि (कियारा आडवाणी) से शादी की है. तीन साल हो चुके हैं. रश्मि का परिवार इस शादी से नाराज़ है लेकिन एक दिन लड़की की मां उसे अचानक निमंत्रण दे कर कहती है कि दामाद के साथ आकार पिता (राजेश शर्मा) की नाराजगी दूर कर दे. आसिफ और रश्मि पहुंचते हैं और आगे के घटनाक्रम में वहीं पास की हवेलीनुमा इमारत के कंपाउंड से भूत निकल कर इस परिवार में आ जाता है. अक्षय को यह कॉमेडी आईडिया इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे पारिवारिक बनाने के लिए, बच्चों के भी किरदार शामिल कर दिए.


इससे पहले अक्षय दर्शकों को अपनी फिल्मों में राष्ट्र भक्ति सिखाते रहे हैं. इस बार वह हिन्दू युवक और मुस्लिम युवती के परिवार के बहाने सामाजिक समरसता की उम्मीद का अप्रत्यक्ष संदेश दे रहे है, जो वर्तमान समय में उनके राजनीतिक आकाओं को भी पसंद नहीं आएगा. फिल्म में आसिफ-रश्मि की कहानी सुनने वाला आसिफ का भतीजा रश्मि के परिवार की नाराजगी पर कहता है कि वो लोग अभी भी हिन्दू-मुस्लिम में अटके हुए हैं. पिछले दिनों हिन्दू-मुस्लिम परिवार के कथानक वाले एक टीवी विज्ञापन को जबर्दस्त विरोध के बाद हटा लिए जाने से ही स्थिति साफ है कि अक्षय ने बड़ा जोखिम उठाया है. जो आने वाले दिनों में तूल पकड़ सकता है. यह अलग बात है कि फिल्म का मुद्दा लव-जिहाद नहीं है. किसी को यह बात भी खटक सकती है कि फिल्म में हिन्दू पात्र जहां-तहां कमज़ोर, डरने वाले और हास्यपद हो जाते है वहीं मुस्किम किरदार दाढ़ी-टोपी लगाए नेकदिल और मज़बूत रहते हैं.


सरल शब्दों में कहें तो यह एक भटकती हुई आत्मा की कहानी है जो अपने साथ हुए धोखे का बदला लेना चाहती है. फिल्मों के अनुभव और इतिहास से हम जानते हैं कि आत्माएं हीरो या हीरोइन के शरीर में घुस कर दुश्मनों को ठिकाने लगाया करती हैं. यहां भी ऐसा बदला है, जिसमें भूत-प्रेत पर विश्वास न करने वाला हीरो कहता कि अगर इनका अस्तित्व हुआ तो मैं चूड़ियां पहन लूंगा. ट्रांसजेंडर की आत्मा की सवारी बनकर वह सचमुच चूड़ी-बिंदी-साड़ी पहनता है. हाथ मटकाता है. आंखें तरेरता हैं. आवाज़ ऊंची-नीची करता है. हमेशा चौकाने की फिराक में रहता है. कुल जमा कॉमिक कम और हंसी का पात्र ज्यादा लगता है.

कियारा के साथ अक्षय की जोड़ी नहीं जमती. वह कियारा से कहीं उम्रदराज नज़र आते हैं. तमाम फिटनेस और अनुशासित जीवनशैली के बावजूद अब अक्षय के चेहरे और गर्दन पर झुर्रियां नज़र आने लगी है.

 

फिल्म में हॉरर कॉमेडी के नाम पर चुनरी का लहरा कर हवा में उड़ जाना, खाली मैदान में पसरा सन्नाटा, अंधेरे कमरे में खिड़की-दरवाज़े बंद होने की आवाज़ें, किसी के पीछे से कोई साया गुजरने का आभास, किरदारों का आंखें बड़ी-बड़ी करके डर जाना और जान की दुहाई मांगना जैसी बातें शामिल हैं. जो जाने कितनी रूहानी कहानियों में आकर बासी पड़ चुकी हैं. अक्षय इससे पहले प्रियदर्शन की भूल भुलैया जैसी हॉरर कॉमेडी में आ चुके हैं, जो इस फिल्म से कई गुना बेहतर है.

कंचना की इस रीमेक की कमज़ोरी पटकथा और अक्षय पर निर्भरता है. फिल्म के गाने और डांस कहानी के बहाव को बाधित करते हुए इसे ट्रेक से उतारते रहते हैं. पूरी फिल्म में अगर कोई पात्र प्रभावित करता है, तो शरद केलकर. वह अपने ट्रांसजेंडर पात्र से न्याय करते हुए अभिनय करते नज़र आते हैं. लक्ष्मी देख कर यह विश्वास करना कठिन होता है कि लॉरेंस राघव ने ही कंचना बनाई थी. ऐसे में यहां यही विकल्प हैं कि इस लक्ष्मी के चक्कर में न पड़ें और दीवाली पर घर आने वाली लक्ष्मी पर नज़र रखें. दीवाली की खुशियों के मौके का एक एक पल कीमती है. इसे इस लक्ष्मी के साथ बेकार न करें. अगर हॉरर-कॉमेडी देखनी है तो कंचना फिर से देख लें.

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