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रात अकेली है मिस्ट्री-थ्रिलर Film Review

जनता जनार्दन संवाददाता , Jul 31, 2020, 19:09 pm IST
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रात अकेली है मिस्ट्री-थ्रिलर Film Review

किसी मिस्ट्री-थ्रिलर के लिए इससे बढ़िया कुछ नहीं हो सकता कि ओपनिंग सीन में ही हत्या हो जाए. माहौल बन जाता है कि हत्या क्यों हुई. मरने वाला कौन था. उसे मौत के घाट क्यों उतारा गया. कौन से राज खुलने हैं. इस लिहाज से रात अकेली है की शुरुआत रोचक है क्योंकि यहां कुछ ही मिनटों तीन मर्डर हो जाते हैं.


कई सवाल सिर उठा लेते हैं. मामला यूपी का है. सफेद दाढ़ी वाले बुजुर्ग ठाकुर रघुवेंद्र सिंह ने जवान लड़की राधा (राधा) से शादी रचाई है और अपने कमरे में मरे पाए गए. यह हत्या है. गोली मारकर चेहरा बंदूक के बट से कुचला गया है. पांच साल पहले उनकी पत्नी और ड्राइवर की एक रात तब हत्या हो गई थी, जब वे कार में ग्वालियर से घर लौट रहे थे.


ठाकुर के परिवार में एक बेटा-एक बेटी, उसके छोटे भाई की बूढ़ी विधवा और उसके जवान बेटे-बेटी, पहली पत्नी का भाई, किशोरवय नौकरानी और झुर्रियोंदार बूढ़ी औरत भी रहती है. निर्दलीय विधायक मुन्ना राजा (आदित्य यादव) परिवार के बहुत करीब है क्योंकि उसकी बेटी से ठाकुर के बड़े भतीजे की शादी ठहर गई है. सवाल है हत्या किसने की. क्यों की. केस की जांच इंस्पेक्टर जिटल यादव (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) के हाथ में है.

 

यादव को भरोसा है कि हत्या में किसी घरवाले का हाथ है, जबकि आम धारणा है कि हत्या राधा और उसके किसी प्रेमी ने मिलकर की है. बिना वसीयत लिखे ठाकुर चले गए और पत्नी होने के नाते ठाकुर की जायदाद पर पूरा हक राधा का होगा. अगर पुलिस उसे हिरासत में लेकर कूटे तो वह सब सच बता देगी.


रात अकेली है (Raat Akeli Hai) रोचक थ्रिलर है, जिसके रहस्य बांधे रखते हैं. शक के दायरे में सभी हैं क्योंकि कोई भी ठाकुर से प्यार नहीं करता था. हालांकि ठाकुर कैसे आदमी थे, इसे यूं समझा जा सकता है कि वह लड़कियां खरीद कर घर में रखा करते थे. हर दिन नहा-धोकर फेयर एंड लवली लगाने वाले जटिल यादव का किरदार रोचक है. मां (ईला अरुण) को उसकी शादी की चिंता है. उन्हें लगता है कि लड़का सांवला है तो क्या, दिल का तो गोरा है. उनका तर्क है कि क्या फिल्मी हीरो अजय देवगन का भी रंग दबा हुआ नहीं है. नवाज और ईला अरुण की नोक-झोंक वाला ट्रेक रोचक है. फिल्म के तनाव को कुछेक मौकों पर आकर हल्का करता है.

 

जब रसूखदार परिवारों में हत्याएं होती हैं तो जांच में पुलिस और राजनीति की अहम भूमिका रहती है. ऐसा यहां भी है. जटिल यादव पर सही रास्ते पर न जाने का दबाव पड़ता है तो वह अपने वरिष्ठ अधिकारी और विधायक मुन्ना राजा से साफ कहता है, ‘एक बार दिमाग ठनक गया ना तो चाहे वर्दी जाए चाहे चौकी, हम सच कहीं से भी खोद निकालेंगे.’ और सचमुच वह यही करता है. सच सामने आकर हैरान करता है. हत्या की वजह और हत्यारे को इंस्पेक्टर ढूंढ निकालता है.


नवाज यहां फॉर्म में हैं. उनका अभिनय छोटे-छोटे पत्थरों पर से कलकल बहती पारदर्शी नदी की तरह है, जिसमें संगीत होता है. नवाज जो कह रहे होते हैं, कर रहे होते हैं उसके पीछे भी कुछ ऐसा नजर आता है, जो आनंदित करता है. पहला मौका है जब वह स्क्रीन पर वर्दी में हैं और उन्होंने रंग जमाया है. राधिका आप्टे अपनी भूमिका में जमी हैं. एक बूढ़े की खरीदी हुई, शोषण की शिकार स्त्री की भूमिका में उन्होंने जान डाली है. अपना ग्लैमर दरकिनार रखा है. बाकी कलाकारों का भी इन दोनों को बढ़िया सहयोग मिला.

 

निर्देशक के रूप में कास्टिंग डायरेक्टर हनी त्रेहन की यह पहली फिल्म है. फिल्म पर उनका नियंत्रण है. उन्होंने खूबसूरती से कहानी कही है. फिल्म सधे हाथों से लिखी गई है. हनी किसी ऐक्टर या दृश्य को बहकने नहीं देते. इसीलिए दर्शक का ध्यान भी नहीं भटकता. फिल्म का लुक रीयल है. मनोरमाः सिक्स फीट अंडर, जॉनी गद्दार और एक चालीस की लास्ट लोकल जैसी फिल्मों में जिस तरह थ्रिलर का हल्का टोन और मजबूत परफॉरमेंस थे, वही आप रात अकेली है में महसूस करेंगे.

रात अकेली है पूरी तरह देसी मिस्ट्री-थिलर है. यहां ऐसा नहीं है कि कहानी किसी हॉलीवुड फिल्म से ले ली और उसे हिंदी पट्टी का जामा पहना दिया. कास्टिंग और कैमरावर्क भी अच्छे हैं. नेटफ्लिक्स पर हाल के दिनों में जो कंटेंट आया है, उसमें निःसंदेह यह सबसे बढ़िया है. कोरोना काल में थियटरों के बंद होने के बाद किसी भी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई यह पहली है जो वास्तव में एंटरटेन करती है.


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