बी.एच.यू मेरी साँसों में बसता है

बी.एच.यू मेरी साँसों में बसता है
अज़ीज़ दोस्तों! बी.एच.यू. मेरे लिए हसीन यादों का एक बेश-किमती एल्बम है..कोलाज़ है, जिस में ज़िन्दगी के सारे रंग मौजूद हैं। बी.एच.यू. मेरी साँसों में बसता है! मेरे दिल की धड़कनों में शामिल है। बी.एच.यू. मेरी मुहब्बत है, मेरा इश्क़ है, मेरा जुनून है। ऐसा इश्क़ जिस ने मुझे ख़ुशी व कामयाबी की नई नई मंज़िले अता की और मुझे ज़मीन से आसमान की बुलंदियों में उछाल दिया। ये कहते हुए मुझे अजीब सी खुशी महसूस हो रही है कि बी.एच. यू. से अपनी मुहब्बत का सिलसिला 2006 से शुरू होता है। एक लंबी मुद्दत गुज़रने के बाद आज भी मुहब्बत का तीर मेरे दिल मे चुभा हुआ है...
 
गर तीर लगे और जिगर के पार ना हो बल्कि बीच में फंसा जाए तो, उस का मज़ा ही कुछ है.. ग़ालिब ने अपने एक शेर के ज़रिए इस एहसास को कुछ इस अंदाज़ में बयाँ किया है कि "ये खलिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता" मैं यादों की उन बिखरी हुई क्रिचीयों को समेट लेना चाहता हूं। लंका, मधुबन, वी टी, स्पन्दन, सेंट्रल लाइब्रेरी, मैत्री और कैंपस से वाबस्ता बेशुमार हसीन यादें जुगनू बन कर मेरी आँखों में तैर रही हैं। अगर वो यादें अल्फाज़ में ढल जाएँ तो शायद एक खूबसूरत नॉवेल..... 
 
किस्सा कुछ यूँ है कि बी.एच.यू. जैसी अज़ीम यूनिवर्सिटी में तालीम हासिल करने की हसरत ग्रैजुएशन के ज़माने में पैदा हो गयी थी। मेरी खुश-बख़्ती कहिए कि मेरा ये सपना 2006 में साकार हो गया। लाल बहादुर शास्त्री पी जी कॉलेज, मुगलसराय से बी.ए. करने के बाद मैं ने वहां उर्दू एम. ए. में दाखिला लिया। सच कहिए तो चकिया, चंदौली के एक छोटे से पहाड़ी गाँव में पले बढ़े एक नौजवान के लिए मालवीय जी की उस बगिया में दाखिल पाना कोई मामूली बात ना थी बल्कि मेरी उम्मीदों और आशाओं को नए पर लग गए थे। मैं आज भी उसे एक नए जन्म के रूप में देखता हूँ। मेरी नज़रों में बी.एच.यू. किसी हावर्ड और कैंब्रिज से भी कहीं ज़्यादा पुर-कशिश लगने लगा था।
 
पोस्ट ग्रैजुएशन के उन दो बरसों ने मेरी ज़िन्दगी में कई रंग भर दिए। यारों की यारी ने उस रंग को और गाढ़ा कर दिया। मैं आज भी कैंपस के उन दर-ओ-दीवार और गली कुचो में अपने क़दमो के निशां ढूँढता फिरता हूँ। मैं आज भी कैंपस के खामोश दरख्तों, सड़कों और इमारतों से गुफ्तगू करके अपनी उन खूबसूरत यादों को संजोने की कोशिश में लगा रहता हूँ। मुझे दोस्तों के संग पैदल चलते हुए मधुबन की छांव मैं पल दो पल बैठ जाना और कॉफ़ी पीना याद है। Convocation के मौक़े पर मुलाक़ात का आख़िरी मौक़ा, चेहरे पर खुशी और गम की लकीरें, दोस्तों यारों से बिछड़ने का शदीद एहसास, वक़्त को क़ैद कर लेने की ज़िद... और फ़िर सिटी बजाते हुए सिक्यूरिटी दस्ते से डरे सहमे झाड़ियों और पेड़ों की आड़ व तन्हाई में बैठे हुए आशिकों की फौज की बेबसी और मजबूरी को भला कैसे भुला जा सकता है...
 
गंगा नदी के तट पर बसे इस बेमिसाल कैंपस की दुनिया में कोई दूसरी मिसाल नहीं। बारिश के मौसम में कैंपस का हुस्न पूरे शबाब पर होता है। लंबे लंबे दरख्तों से टपकते हुए पानी की बूँदें, सौंधी सौंधी खुशबु, मोर की खुश नुमा आवाज़ें, आंधी में पेड़ से टूट कर गिरते हुए पत्ते, दुपट्टा फैलाए बारिश से खुद को बचाती हुईं लड़कियां... और लिफ्ट देने के फ़िराक़ में बाइक से इधर उधर चक्कर काटते हुए बेफिक्र लड़कों की शोखीयां सब कुछ याद है। विश्वनाथ टेम्पल और वहां की दुकानों का बनाना शेक, पनीर फ्राइड राइस, इडली, डोसे, आइसक्रीम, समोसे, चाय वगैरह सब कुछ याद है। वहाँ के शापिंग सेन्टर और हेल्थ सेंटर की सड़कें भी याद हैं। खांस खांस कर बहाने से खांसी का सिरप और चोट लगने का नाटक कर के जेल व मूव झटकना भी नहीं भूलता। लंका पर मिलने वाली चुकड़ की चाय, पान, पहलवान लस्सी, विकास स्टेशनरी, खनेजा शॉप, बी.बी.सी. और सावन थाली किस किस का ज़िक्र करूँ.. ! अरे हाँ कभी कभी सेमिनार और कॉन्फ्रेंस में घुस कर लंच उड़ाना भी याद है...
 
ख्वाबों से भरा "मधुर मनोहर अतीव सुंदर"का ये अनोखा सफर दबे पाँव खामोशी से गुज़र जाता है। इस कैंपस से बिछड़ना यानी हीर का रांझा से अलग होना और शीरीं का फरहाद से दूर होना है! कैंपस की ऐसी खासियत है कि यहाँ से बिछड़ने के बाद इंसान गीली लकड़ी की तरह सुलगता है और मोम की तरह पिघलता है... वो एक बार फिर से उन यादों को जीना चाहता है! उन सड़कों और चौराहों से गुज़रना चाहता है... मैं बी.एच.यू की मिट्टी को सलाम-ए-अकीदत पेश करता हूँ और आप सभी का खैर मक़दम करता हूँ। दुआ है कि इस बगिया के रंग बिरंगे फूल आपस में मिल जुल कर दुनियां में इंसानियत और भाईचारे का संदेश आम करें। हम कभी भी बी.एच.यू से जुड़ी हुई अनमोल यादों से ख़ुद को जुदा नहीं कर सकते। बकौल फ़ैज़ अहमद फैज़:
 
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं
 

#डॉ महबूब हसन,असिस्टेंट प्रोफेसर,उर्दू विभाग,दीन दयाल उपाध्याय यूनिवर्सिटी गोरखपुर


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