कहीं भूखमरी की काल कोठरी में ही न समा जाएं ग्लैमर की दुनिया का यह अनदेखा तबका

कहीं भूखमरी की काल कोठरी में ही न समा जाएं ग्लैमर की दुनिया का यह अनदेखा तबका
मुंबई: फोकलोर एंटरटेनमेंट के चीफ क्रिएटिव ऑफिसर आशीष कौल का कहना है कि ज़ुबानी जमाखर्च से इतर, फिल्म इंडस्ट्री के अनजाने नायकों के लिए कुछ कंक्रीट कदम उठाने की ज़रूरत है। टेलर, इलेक्ट्रीशियन, बढ़ई, पेंटर, क्लीनर, स्पॉट ब्वाॅय, ट्रैवेल ऑपरेटर, कैंटीन सेवा, जूनियर कलाकार, एक्स्ट्रा, डांसर, आर्ट सप्लायर, क्या ये नाम यहीं ख़त्म हो जाते हैं? नहीं! इनके साथ हैं भारतीय फिल्म उद्योग में परदे के पीछे काम करने वालों का एक बहुत बड़ा बेड़ा, जिसमें शामिल हैं एडिटर, प्रोसेसर, कलरिस्ट, कैमरा सहायक, निर्देशक, लेखक, ट्राली ऑपरेटर, लाइट मैन, संगीतकार, मेकअप आर्टिस्ट आदि| लाखों लोगों की निगाहें ख़बरों पर जमी हैं, जो कोविड 19 से मुक्ति पाने की आस में  हैं| भारत के ये सपनों के सौदागर पिछले दो महीनों से खाली बैठे हैं और जैसा नज़र आता है, कम से कम अगले नौ महीनों तक भी उनके पास कोई काम नहीं होगा| 

इन सबके बीच इरफ़ान खान, ऋषि कपूर और इंडस्ट्री के प्रतिनिधि कुलमीत मक्कड़ के दुखद निधन ने इस विशाल संकट की डरावनी ख़ामोशी को और भी गहरा कर दिया है| इतना ही नहीं इस लम्बी रुकावट की वजह से पाइपलाइन में चल रहे फिल्म प्रोजेक्ट को बड़े परिवर्तन का सामना करना पड़ेगा| सृजन का कार्य एक लगातार विकसित होते रहने वाली प्रक्रिया है इसलिए शायद पिछले प्रोजेक्ट इस सृजन चक्र से फिर गुजरेंगे |
 
 
इन लाखों लोगो में से परदे के पीछे काम करने वाले ५ लाख लोग अकेले मुंबई में रहते हैं | इनमें से ९० प्रतिशत कामगार गरीबी रेखा से नीचे हाशिये पर खड़े हैं | ये महान भारत के ख्वाबों को आकार देते हैं | इनसे भारतीय उपमहाद्वीप की इच्छाओं के साथ उस राष्ट्र की उम्मीद को पंख मिलते हैं जिसे केवल ३०००० उद्योगपति चला रहें हैं | पारम्परिक उद्योगों और कॉर्पोरेट दुनिया के गाढ़े काले चमकते सूट के लिए आते राहत पैकेजों की स्वर लहरियां एक व्यंग्य हैं, क्योंकि फिल्म कामगार सामने दिखते भविष्य में परिवार के लिए दो वक़्त की रोटी का बंदोबस्त करने का उपाय और उम्मीद दोनों खो चुका है |

फिल्म कामगारों को आमतौर पर ९० दिन बाद भुगतान किया जाता है | कई बार ये भुगतान नहीं मिलता है | यह फिल्म और निर्माता के भाग्य पर निर्भर करता है |

आज जब हम ये बात कर रहे हैं तब बॉलीवुड के करीब ४ लाख लोग अपने बकाये के भुगतान के इंतज़ार कर रहे हैं | विडम्बना ये है कि ये लोग वो हैं जो अपने मूल प्रदेश को पलायन करने के झोंके में शामिल प्रवासियों में नहीं हैं| इस इंडस्ट्री के लीडर और एक लम्बा अनुभव रखने वाले के अनुसार वो यहाँ के हैं| वो भारत की उम्मीद बनाने वाली फैक्ट्री का हिस्सा हैं| वो आज अँधेरे में हैं और अगर निर्माता दिवालिया हुए तो शायद ये भी जिन्दा नहीं बच पाएंगे |
अभिनेता सलमान खान इन कामगारों के एक वर्ग की मदद कर रहे हैं | हालाँकि ये बहुत महान कार्य है, लेकिन कामगारों को मध्यम अवधि में जीवन बचाने के लिए सहायता डोर और भविष्य में रोजी रोटी चलते रहने की उम्मीद चाहिए |  काफी लम्बे समय से भारतीय फिल्म उद्योग एक ही ढर्रे पर चल रहा है जिसमें १% से कम लोग मालिक होते हैं  ९८% की मेहनत से बनी पूँजी के |
 
 
यह कहते हुए दुःख हो रहा लेकिन ऐसा समझाया और दिखाया जाता है कि सब कुछ ठीक है और फिल्म कामगार पैसे और सम्पन्नता के तालाब में गोते लगा रहे हैं | सच्चाई ये है कि इनकी हालत अच्छी नहीं है और बहुत कम लोग सामने आकर इन लोगों की मदद करते हैं |

इस वक़्त जब देश रुक गया है तब मोटे तौर पर जिन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करने की जरूरत है वो हैं भोजन, आवास, स्वास्थ, बच्चों की शिक्षा और आवश्यक सेवाओं का भुगतान| फिल्म इंडस्ट्री एक उद्योग है ये नारा लम्बे समय से लगाया जा रहा है | इस नारे को आकार देने में दशकों का समय लगा है | अब केंद्र सरकार द्वारा इस नारे को अमली जामा देने का सही मौका है | 

मुझे नहीं लगता कि ये रातों रात हो जायेगा लेकिन फिल्म उद्योग की ब्यूरोक्रेसी के रूप में काम कर रहे अनेकों ट्रेड संगठनों को इस बिंदु पर अवश्य इकठ्ठा होना चाहिए| जुबानी बातें अब बहुत हो गयीं| अब उन्हें धरातल पर लाने का वक़्त है| तो आइये देखते हैं क्या किया जाना चाहिए | 

स्वास्थ और शिक्षा:
 इस बड़े संकट की घड़ी में कामगारों के बच्चों को निरंतर शिक्षा और स्वास्थ देखभाल की जरूरत है| हालाँकि ESIC जैसी स्कीम हैं लेकिन हक़ीक़त ये है कि ये अधिकतर वर्करों को कवर नहीं करती | इनके पास कामगारों तक सहयोग पहुंचाने का बुनियादी ढांचा नहीं है | राज्य सरकारों को सभी तक स्वास्थ और शिक्षा सुनिश्चित करना चाहिए चाहे वो सरकारी क्षेत्र में हो या प्राइवेट|    
 
 
यहाँ पर मान्यता प्राप्त उद्योग संगठनों की भूमिका दिखाई पड़ती है | उन्हें सुविधाओं के लिए ऐसे टोकन जारी करने चाहिए जिन्हें सरकार और निजी क्षेत्र स्वीकार करते हुए सेवा प्रदान करें | जैसे कि विभिन्न दवाइयां ( काउंटर पर मिलने वाली और डॉक्टर के पर्चे से मिलने वाली दोनों ) मुफ्त उपलब्ध होनी चाहिए |

आवश्यक सेवाएं :
आवश्यक सेवाओं के भुगतान में कामगारों को बहुत खर्च करना पड़ता है | ट्रेड संगठनों द्वारा जारी किये गए टोकन को बिजली, पानी, टेलीफोन जैसी सुविधाओं को जारी रखने के लिए कैश की तरह माना जाना चाहिए | 

अनिवार्य भुगतान: जीवन या स्वास्थ बीमा का प्रीमियम और क़र्ज़ लौटने को नौ माह के लिए आगे बढ़ा देना चाहिए | ये हमारे देश और नीति निर्माताओं का उपहास ही है कि हम सरकारी तंत्र में बड़े कर्ज को एक बार में माफ़ कर देते हैं लेकिन जरूरतमंदों और गरीबों के लिए लाल फीता शाही को सामने लाते हैं |
यदि किसानों को इंश्योरेंस और क़र्ज़ की अदायगी में छूट मिल सकती है तो ट्रेड यूनियन में पंजीकृत भारतीय फिल्म उद्योग कामगारों को क्यों नहीं?
 
अनुमति प्राप्त शूटिंग को शुरू करना : ये सही वक़्त है जब फिल्म निर्माताओं और रचनाकारों के शीर्ष नेतृत्व को शूटिंग प्रणाली का पुनर्गठन करना चाहिए | आज की व्यवस्था में सामाजिक दूरी और व्यक्तिगत सुरक्षा की कोई जगह नहीं है | शुरुआत करने के लिए नियंत्रित जगह स्टूडियो में सामाजिक दूरी पक्का करने वाली शूटिंग को अनुमति देना चाहिए | प्रसार भारती इसमें पहल करके इस तरह के शूट करवा सकती है जिनमें कोई तकनीकी बाध्यता न हो | 
 
छोटे क़र्ज़ : सरकार के लिए एक व्यक्ति की मदद करने के लिए आगे आना शायद संभव नहीं है लेकिन सरकार मान्यता प्राप्त ट्रेड संगठनों को छूट या लोन दे सकती है| ये संगठन अपने यहाँ पंजीकृत २ लाख कमजोर वर्करों को आकस्मिक कार्यों के लिए मदद और राहत पंहुचा सकते हैं |
 
रोजगार के दूसरे अवसर : कामगारों के इस बड़े समुदाय का ९० % टेक्निकल और कुशल मजदूर हैं | सरकार को इन्हे राष्ट्रीय और स्थानीय रोज़गार योजनाओं से जोड़ना चाहिए | रोज़गार एक्सचेंजों को घर तक पहुंचने वाली अति आवश्यक सुविधाओं में इन लोगों के हुनर का उपयोग करना चाहिए |

ये कहने की कोई जरूरत नहीं है कि भारतीय फिल्म उद्योग के कर्मी असाधारण रूप से मेहनती, समयबद्ध और दबाव को झेलने की क्षमता रखने वाले हैं | ये लाखों भारतीय फिल्म उद्योग कार्यकर्ता हिस्सा हैं एक महान भारत के स्वप्न का | स्वप्न सफलता का, स्वप्न खुशहाली का और स्वप्न किसी के भी शिखर पर पहुंच जाने का | ये कामगार सुनहरे मेहराबों, चमकते कॉकटेल और अद्भुत नित्य लड़ियों के पीछे बिना रुके पिछले ७० सालों से अमानवीय परिस्थितियों में जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं | कई बार ये आधा पेट खाकर भी काम करते हैं ताकि अजेय भारतीय मध्यम वर्ग इस देश को सर्वसम्पन्न बनाने के संघर्ष में हर दिन दुगने जोश से अपना योगदान दे सके |
 
#लेखक मीडिया इंडस्ट्री के अग्रणी हैं और रिफ्यूजी कैंप, दिद्दा द वैरियर क्वीन ऑफ़ कश्मीर और रक्त गुलाब बेस्ट सेलर के रचनाकार हैं |
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