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कोरोना महामारी एवं तुच्छ राजनीति की पराकाष्ठा

डॉ संजय कुमार , Mar 30, 2020, 18:51 pm IST
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कोरोना महामारी एवं तुच्छ राजनीति की पराकाष्ठा

कोरोना महामारी से ग्रस्त भारत में पिछले चार दिनों से एक गंभीर घटना ने सभी को झकझोर कर रख दिया है. दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश बॉर्डर पर स्थित आनंद विहार इलाक़े में बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा एवं पश्चिम बंगाल के गरीब एवं अप्रवासी मजदूर बहुत बड़ी संख्या में इकठ्ठा होकर अपने अपने गृह राज्य की ओर पैदल हीं रवाना हो रहे हैं. 24 मार्च की रात प्रधानमंत्री मोदी ने 21 दिनों के लिए पूरे भारत वर्ष में लॉक डाउन की घोषणा के साथ हीं कोरोना के विरुद्ध एक निर्णायक लड़ाई छेड़ दी. परन्तु इसका सबसे विस्तृत, भयानक एवं संकटपूर्ण प्रभाव दिल्ली में रह रहे अप्रवासी मजदूरों के ऊपर पड़ा है. एक अनुमान के अनुसार लगभग 3 से 4 लाख लोग दिल्ली छोड़ने पर विवश हुए जिसका अंदाजा निश्चित तौर पर मोदी भी नही लगा पाए होंगे। तो क्या लॉक डाउन की घोषणा जल्दबाजी में की गयी अथवा होम वर्क के बिना की गई. इसका सिर्फ कयास या अंदाज़ा हीं लगाया जा सकता है. परन्तु परिस्थितियाँ एकदम से इतनी विपरीत हो जायेगी, इसका अंदाजा किसी को नहीं था.

अब सवाल यह उठता है कि ये भीड़ स्वतःस्फूर्त है या इसके पीछे कोई ओछी राजनीति है? क्या इन लोगों को उकसाया गया है ऐसा कदम उठाने हेतु या कुछ शरारती तत्वों द्वारा परिस्थिति को बिगाड़ने हेतु अफ़वाह का सहारा लिया गया? इतना तो तय है कि 800 से लेकर 1000 किलोमीटर तक की यात्रा पैदल करने पर विवश हुए ये अभागे यों हीं तैयार नहीं हुए होंगे. पूरा देश, एकबारगी को लगा कि लॉक डाउन सफल हो जाएगा, त्यों हीं 26 मार्च के पश्चात से अप्रवासी लोगों का हुजूम सड़कों पर उतर आया और सारी योजना धरी की धरी रह गई है. कल्पना कीजिये कि यदि इस बीच कोरोना का कहर तृतीय स्तर में प्रवेश कर जाता है तो अकल्पनीय क्षति होने से कोई नहीं बचा सकता है. जाहिर सी बात है इसमें ओछी राजनीति हुई है और वह भी बेहद घटिया एवं खतरनाक. समय आने पर इसका पता तो चल हीं जाएगा. परन्तु इसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना होगा.

दिल्ली के मुख्यमंत्री लगातार कह रहे हैं कि जो लोग जा रहे है वो न जाएँ. उनके खाने पीने का पूरा इन्तिज़ाम किया जाएगा. परन्तु इसका असर और उल्टा हुआ है. ये लोग रहेंगे कहाँ? इसका जवाब उन्होंने नहीं दिया. अपुष्ट आकड़ों के अनुसार वर्तमान में दिल्ली में पिछले 20 वर्षों में देश के अन्य हिस्सों से लगभग 50 से 60 लाख लोग अपना जीवन यापन करने हेतु निवास करने आये हैं. इनमें से 25 से 30 लाख लोगों ने दिल्ली में अपना स्थायी निवास बना लिया है तथा उनके नाम से राशन कार्ड एवं अन्य सरकारी पहचान पत्र निर्गत हो चुके हैं. 10 लाख से अधिक लोगों ने अस्थायी निवास और अन्य साजो सामान जुटा लिया है. परन्तु सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ उन्हें अभी प्राप्त नही हो रहा है. परन्तु ऐसे लोगों को भी आइसोलेशन में रहने में कोई दिक्कत नही है. रही बात बचे 10 लाख लोगों की, जिनका कोई पुरसा हाल नही है. इनके पास अभी दिल्ली का वोटर कार्ड भी नही है. इनमे से लगभग 30
से 40 प्रतिशत लोगों ने अपने घर का रूख़ करना बेहतर समझा है. स्वाभाविक है कि दिल्ली के वोट की राजनीति में इनका कोई महत्व नही है. परन्तु देश के प्रधानमंत्री को कोई भी समस्या राष्ट्रीय स्तर पर निपटना होता है. खेल यहीं पर होता हुआ प्रतीत हो रहा है. जैसा की सर्वविदित है कि दिल्ली पुलिस केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आता है. यदि इस अफरा तफरी से कोई भयानक परिस्थिति पैदा होती है तो सीधे-सीधे केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है. दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इसका प्रभाव 2019 में बिहार के चुनाव एवं 2022 में उत्तर प्रदेश के चुनाव पर पड़ सकता है, जिसका फायदा केजरीवाल एवं अन्य विपक्षी दलों को हो सकता है. इसलिए ये अकारण नही है कि जिस तत्परता के साथ मुख्यमंत्री योगी और दिल्ली पुलिस ने इसका संज्ञान लिया है वो पूरी कहानी को साफ़ साफ़ बयां कर रहा है. गौरतलब है कि इस क्रम में एक ह्रदय विदारक घटना हुई है. अप्रवासी मजदूर रणवीर सिंह ने पैदल चलने और भूखे रहने से आगरा में दम तोड़ दिया है. तीसरा महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि दिल्ली में यह कुप्रचार किया गया कि सरकार ने सिर्फ दिखाने के लिए 21 दिनों के लिए लॉक डाउन किया है. परन्तु इसकी अवधि बढ़ाई जायेगी. तभी तो सरकार सभी गरीब लोगों के अकाउंट में 3 महीने के लिए सहायता राशि एवं मुफ्त गैस सिलेंडर दे रही है. ऐसी स्थिति में दिल्ली में बिना काम के तीन महीने तक रहना बिलकुल भी बुद्धिमानी नहीं है. एक प्रकार से सरकार द्वारा किये गये अच्छे कार्य को भी तुच्छ राजनीति की बलि दे दी गई.

केंद सरकार ने आज एक एडवाइजरी जारी करते हुए सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि सभी राज्य अपने अपने सीमा को सील कर दें, जिससे कि कोई कोरोना संक्रमित व्यक्ति दूसरे राज्य में न पहुँच जाय. अब सवाल यह उठता है कि अप्रवासी लोगों द्वारा उत्पन्न गंभीर समस्या का सबसे ज्यादा फायदा किसे मिलेगा. निश्चित तौर पर दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश में केजरीवाल एवं अन्य विपक्षी पार्टियों को. वैसे भी यह बात किसी से छिपी नही है कि केजरीवाल की महत्वाकांक्षा अब सिर्फ मुख्यमंत्री की गद्दी तक सीमित नही है. दिल्ली चुनाव में मिली जबरदस्त जीत ने उनके पुराने मंसूबों को पुनः जीवित कर दिया है. यदि उत्तर प्रदेश के चुनाव में आम आदमी पार्टी को संतोषजनक सफलता मिलती है तो 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी के खिलाफ़ वे विपक्ष के साझा उम्मीदवार हो सकते हैं. परन्तु जो सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे गंभीर संकट के समय इस प्रकार की राजनीति होनी चाहिए?


#डॉ संजय कुमार, यू.पी. कोऑर्डिनेटर सी.एस.एस.पी, कानपुर

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