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नागरिकता कानून – राजनीतिक, वैचारिक, कानूनी एवं सामाजिक सन्दर्भ

नागरिकता कानून – राजनीतिक, वैचारिक, कानूनी एवं सामाजिक सन्दर्भ

सी.ए.ए, एन.पी.आर और एन.आर.सी वर्तमान राजनीतिक दृश्य का सबसे अहम् और नाजुक बिंदु बना हुआ है। राजनीतिक, विचारधारात्मक, विधिक एवं सामाजिक सन्दर्भों में इसे कैसे समझा जाए? यह बहुत महत्वपूर्ण है। विभिन्न राजनीतिक दलों एवं सामाजिक संगठनों के द्वारा इसका समर्थन अथवा विरोध किया जा रहा है। आखिर सच क्या है? क्या भाजपा द्वारा लाया गया यह कानून विपक्षी दलों को अपने - अपने वैचारिक विभेद को मिटाकर एक बैनर के तले ला रहा है या इस बिल के द्वारा पूरे भारतीय समाज का ताना बाना नए सिरे से गढा जा रहा है? क्या यह बिल वामपंथी दलों के लिए संजीवनी का कार्य करेगा या दक्षिणपंथी विचारधारा के लगातार हो रहे प्रगति को रोक देगा? बहरहाल, इसका अंतिम निष्कर्ष चाहे जो हो, परन्तु वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के मद्देनज़र इस समस्या का हल जितना जल्दी निकल सके उतना हीं अच्छा होगा। अन्यथा एक गंभीर संकट के तरफ तो हम बढ़ हीं चुके हैं। दिल्ली दंगों के बाद तो स्थिति और भी भयावह हो चुकी है। वर्तमान संकट इस मायने में बहुत बड़ा है। क्या सरकार अपने कदम वापस खींचेगी अथवा अपने को न्यायोचित ठहराने हेतु किसी और भी कड़े और बड़े कदम को उठा सकती है? यह समझना बेहद प्रासंगिक होगा।

किसी भी समाज का निर्माण सदियों की सांस्कृतिक एवं विशिष्ट लक्षणों का परिणाम होती है। भारत के सन्दर्भ में यह बात पूरी तरह से अकाट्य है। तार्किक दृष्टिकोण से हम चाहे जो भी क़ानून प्रतिपादित करें, उसकी सहज स्वीकारोक्ति उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत का संविधान सिर्फ कुछ अक्षरों का नाम नही है। अनुच्छेद 13 में स्पष्ट लिखा गया है कि कानून किसे कहते हैं अथवा कानून निर्माण में किन - किन तत्वों का समावेश होता है। इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि भारत की परंपरा को भी कानून का दर्जा दिया गया है, बशर्ते कि वो परम्पराएँ तत्समय संवैधानिक कानूनों का उल्लंघन नही करती हों। सवाल यह उठता है कि आखिर किस आधार पर इस बिल का समर्थन अथवा विरोध किया जाए। भाजपा का स्पष्ट कथन है कि इसके चुनावी एजेंडे में यह पिछले 20 वर्षों से लगातार चला आ रहा है, और उसी एजेंडे के आधार पर उसे सत्ता प्राप्त हुई है। साथ ही साथ देश का बहुसंख्यक वर्ग उसके इस कदम से खुश है। यह बिल किसी को नागरिकता देने के लिए बना है, न कि नागरिकता छिनने के लिए। फिर भी सरकार के इस कथन से मुस्लिम समुदाय के लोग आश्वस्त नही हो पा रहे हैं। 15 दिसम्बर से उत्तर प्रदेश, प. बंगाल, बिहार और दिल्ली जैसे राज्यों में जबरदस्त विरोध खड़ा हो गया और धरना, प्रदर्शन के बाद तोड़ फोड़ बड़े व्यापक पैमानी पर की गई। एकबारगी को हालात काबू से बाहर जाता दिखाई दिया और लगभग आतंरिक विद्रोह की स्थिति पैदा हो गई। परन्तु अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के भारत दौरे के समय दिल्ली में जो सांप्रदायिक विद्वेष की आग लगी, वो बहुत सारे सवालों को खड़ा कर गई है। लगभग सभी विपक्षी दल इस बिल के विरोध में खड़े हो गए हैं। इस बात से भी इनकार नही किया जा सकता है कि इन विरोध प्रदर्शनों में असामाजिक तत्वों को विभिन्न सामाजिक एवं राजनीतिक संगठनों के द्वारा न सिर्फ शामिल किया गया वरन यह कोशिश की गयी कि सरकारी मशीनरी को पूरी तरह पंगु कर दिया जाय। योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम महिलाओं एवं किशोरवय उम्र के लड़कों को सामने रखकर विद्रोह की स्थिति बनाने की कोशिश की गई।

तो क्या यह मान लिया जाय कि सी.ए.ए. और एन.आर.सी बेहद खतरनाक कानून हैं अथवा इसे समझने में भूल हो रही है? आखिर मुस्लिमों में इस डर की असली वजह क्या है? क्या इसके पीछे कोई धार्मिक एवं राजनीतिक एजेंडा छुपा हुआ है। मुस्लिमों को भाजपा का स्वाभाविक राजनैतिक विरोधी माना जाता है सिवाय कुछ शिया लोगों को छोड़कर। भाजपा ने भी कोई राजनीतिक समझदारी नही दिखाई दी। 2019 लोकसभा चुनाव में यू.पी से एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नही दिया गया। समावेशी राजनीति (इंक्लूसिव पॉलिटिक्स) की अवधारणा इस बात पर आधारित होती है कि कोई भी पार्टी किस तरह से समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करती है। मुस्लिमों को टिकट नही देकर भाजपा ने अपनी विचारधारा स्पष्ट कर दी। आनुषांगिक संगठन ‘ राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ’ के द्वारा हालाकिं इस नकारात्मक छवि को ढकने का प्रयास भी किया गया है, परन्तु मुस्लिमों पर इसका कोई ख़ास फर्क पड़ता हुआ दिखाई नही देता है। इसलिए भाजपा द्वारा कश्मीर, तीन तलाक़, राम मंदिर और अब सीएए पर लाया गया कानून मुस्लिमों को अपने हितों पर सबसे बड़ा कुठाराघात लग रहा है और लगातार इस बिल का विरोध कर रहे हैं। इस विरोध के पीछे उस मौन विरोध का भी हाथ है जो कश्मीर, तीन तलाक और राम मंदिर के विरोध में खड़े नही हो पाए थे। शायद ‘अभी नहीं तो कभी नही’ की भावना मुसलमानों में भर गई है। मुस्लिमों को ऐसा महसूस हो रहा है कि इस बार का संकट सिर्फ राजनीतिक और कानूनी नही है बल्कि धार्मिक भी है। उन्हें ऐसा डर है कि भविष्य में ऐसा कोई कानून बनाया जा सकता है जो इन्हें भारतीय नागरिक के रूप में जीने का अधिकार तो देगी परन्तु समानता पर आधारित तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किया जा सकता है। यदि डर इस भावना पर आधारित है तो निश्चित मानिए आगामी कुछ वर्षों में राजनीतिक एवं सामाजिक परिदृश्य बहुत तेजी से बदलता दिखाई देगा। लगभग 20 करोड़ की मुस्लिम आबादी को कोई भी पार्टी खोना नही चाहेगी; चाहे इसके लिए विचारधारात्मक स्तर पर कोई भी समझौता क्यों न करना पड़े।

अब सवाल यह उठता है कि यदि भाजपा के तर्क को सही मान लिया जाय तो उसके चुनावी एजेंडे में तो और भी बातें लिखी गई हैं। उसका पालन क्यों नहीं किया जा रहा है? लेबर रिफार्म, लोकपाल, प्रति वर्ष एक करोड़ रोजगार, किसानो की आय दोगुनी करना आदि आदि। आखिर क्यों भाजपा हमेशा से विचारोतेजक एवं भावनात्मक मुद्दे को हीं उठाती है। जब तक विपक्ष में थे तब तक तो यह बात समझ में आती है । परन्तु सत्ता में आने के पश्चात आप सिर्फ पार्टी नहीं होते हैं बल्कि देश का भविष्य भी आपके हाथों में होता है। और तब ‘गुड गवर्नेंस’ की अवधारणा के साथ आगे बढ़ना होता है, जिसमे पारदर्शी शासन के साथ - साथ समावेशी शासन की भूमिका और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। शायद यहीं पर भाजपा चूक कर रही है। जिस भावना के साथ सीएए और एनरआरसी लाया गया है उसे समझाने में भाजपा ने बहुत बड़ी भूल कर दी है। बेहतर होता कि पर्याप्त सामाजिक विचार-विमर्श की प्रक्रिया के द्वारा यह बिल लाया जाता। परन्तु अब तो तीर कमान से निकल चुका है । जे.एन.यू, ए.एम्.यू एवं जामिया जैसे उच्चस्तरीय शैक्षिक संस्थाओं में मार-पीट औए प्रदर्शन हो रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली में लगभग सभी अल्पसंख्यक संस्थानों में सीएए और एनआरसी का विरोध हो रहा है.

एक सवाल और भी खड़ा किया जा रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था पिछले 10 वर्ष के सबसे न्यूनतम स्तर 4.7 प्रतिशत पर पहुँच चुकी है। आलोचकों का यह कहना है कि अर्थव्यवस्था से ध्यान हटाने हेतु सरकार ने यह चाल चली है, जिससे देश दो वर्गों हिन्दू और मुस्लिम में विभक्त होकर इस कानून का विरोध अथवा समर्थन करेगी। स्वाभाविक है कि बेरोजगारी और अर्थव्यस्था से ध्यान हटाने हेतु इससे अच्छा और कोई बहाना नही हो सकता। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी द्वंद कभी भी भीषण युध का रूप धारण करने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर और भी विपरीत एवं गहरा प्रभाव पड़ेगा। रही सही कसर चीन प्रायोजित ‘कोरोना’ वायरस ने पूरी कर दी है। विशुद्ध प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी यदि आकलन किया जाय तो इस समय देश बेहद गंभीर परिस्थिति से गुजर रहा है। इसका जिम्मेदार किसे माना जाय – भाजपा या विरोधी दलों को? क्या नागरिकता कानून को लेकर विरोधी दलों की आलोचना उचित है? असम का उदाहरण देकर जिस प्रकार से इस बिल का विरोध किया जा रहा है उसके पीछे विरोधी राजनीतिक दलों की मंशा ठीक नही लग रही है। असम का केस बिलकुल अलग है अन्य राज्यों के मुकाबले।

पूरे विश्व में 40 से ज्यादा मुस्लिम बहुसंख्यक राज्य हैं, जहाँ कमोबेश मुस्लिम धर्म के अनुसार कानून बनाये गए हैं। परन्तु कहीं भी पूरे विश्व में हिन्दू कानून के हिसाब से शासन नही है। स्वाभाविक है कि भारत के अलावा अन्य देशों में हिन्दू और इससे जुड़े समुदाय अल्पसंख्यक हीं हैं। उनके सुरक्षा का दायित्व आखिर कौन लेगा? पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को दृष्टिगत रखते हुए यदि नागरिकता संशोधन कानून लाया गया है तो इसे कहाँ तक अनुचित कहा जाय? यदि ऐसे समुदाय भारत की नागरिकता चाहते हैं तो इसमें किसी को आपति नही होनी चाहिए। परन्तु मुस्लिम समुदाय इतना क्यों डरे हुए हैं, समझ से परे है। क्या यह संभव लगता है कि कोई भी लोकतांत्रिक सरकार 20 करोड़ मुस्लिमों का विरोध करके सत्ता में बनी रह सकती है? कदापि नहीं। एक सवाल यहाँ पर और भी समीचीन है। एक सभ्य समाज की नीव यदि राज्य आधारित व्यवस्था पर निर्मित हुई है और इसका पालन स्वाभाविक रूप से लोग कर रहे है तो क्या उस राज्य को यह अधिकार नही होना चाहिए कि वो अपने नागरिकों की संख्या और पहचान सुनिश्चित कर सके। और इस सम्बन्ध में कोई उचित कानून एनआरसी के रूप में आता है तो इससे किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। यूरोप के प्रायः सभी देशों में नागरिकों का एक रजिस्टर बना हुआ है, जिसके द्वारा सरकार विभिन्न सामाजिक सुरक्षा कानूनों का निर्माण करके अपने देश में लागू करती है। यदि तुलना की जाय तो यूरोप के राज्यों में सरकार द्वारा लागू सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों की सफलता असंदिग्ध होती है। परन्तु भारत में स्थिति इसके बिलकुल विपरीत है। आज भी सरकार को सही सही अंदाजा नहीं होता है कि उसके द्वारा लागू किये जा रहे सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रम की सफलता क्या सही मायने में टार्गेटेड लाभार्थी तक पहुँच हीं जायेगी। पिछले वर्ष सरकार द्वारा लागू दो तिहाई नागरिको को उचित एवं मुफ्त स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने हेतु ‘आयुष्मान योजना‘ भी भ्रष्टाचार एवं बिचौलियों के चंगुल में फंस गया। सरकार की मंशा बिलकुल स्पष्ट है। इस बात को लेकर आलोचना तो की जा सकती है कि आयुष्मान योजना में निजी हॉस्पिटल के बजाय सरकारी हॉस्पिटल को शामिल किया जाता। परन्तु विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना को लेकर किसी को संशय नहीं होना चाहिए। आखिर सरकार किस भरोसे अपने कार्यक्रमों को लागू करेगी? मनरेगा एवं अन्य योजनाओं की कहानी किसी से छिपी नहीं है।

भ्रष्टाचार मुक्त एवं पारदर्शी शासन हेतु सरकार की नीतियां यदि स्पष्ट होती है तो इसे लागू करना भी आसान हो जाता है। नागरिकता सम्बन्धी कानून को इसी दायरे में रखा जा सकता है। सरकार की मंशा है कि देश की नागरिक संख्या बिलकुल स्पष्ट हो जाय तो सामाजिक सुरक्षा के कार्यक्रमों को लागू करना और विहित लाभार्थी तक उसका लाभ पहुँचाने में आसानी हो जायेगी। विपक्षी दलों का सारा खेल यहीं पर टिका हुआ है, और शायद इसीलिए वे इसका जमकर विरोध कर रहे हैं। देश की जनता ने यदि मोदी को अभूतपूर्व जनादेश दिया है तो इसके पीछे यह मंशा स्पष्ट है कि मोदी एक स्वच्छ, पारदर्शी और भ्रस्टाचार मुक्त प्रशासन देंगे। आसन्न चुनावों को दृष्टिगत रखकर तो सरकार हमेशा से फैसले लेती रही है, परन्तु 70 वर्ष के स्वतंत्र भारत के इतिहास में इक्का दुक्का उदहारण हीं मिलेंगे जब चुनाव जीतने के 6 महीने के अन्दर सरकार न सिर्फ कठोर एवं अभूतपूर्व फैसले ले रही है, वरन उसको दृढ़ता के साथ लागू भी कर रही है। और इसी बात से न सिर्फ विपक्ष वरन सारा देश अचंभित है।


उल्लेखनीय है कि देश का बड़ा बुद्धिजिवी वर्ग भी इसके विरोध में खड़ा है। समस्या यह है कि बुद्धिजीवी वर्ग अपने विरोध में इतना मूल्यात्मक हो जाता है कि वो वास्तविक सच्चाई से बहुत दूर खड़ा हो जाता है। तर्कपूर्ण एवं विवेकपूर्ण विरोध किसी भी नीति का अवश्य होना चाहिए, परन्तु इसका आधार ठोस होना चाहिए. बौद्धिक व्यामोह और मरीचिका से जितना बचा जा सके उतना हीं अच्छा होगा। अंततः विद्वानों एवं बुद्धिजिवीयों की बड़ी भूमिका होती है कि वो देश के लिए उचित वातावरण के निर्माण में अपना सार्थक योगदान दे सकें।

#डॉ संजय कुमार, यू.पी. कोऑर्डिनेटर सी.एस.एस.पी, कानपुर

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