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बिहार-नेपाल : यात्रा संग आया.. यादों का मेला

गौरव अवस्थी  , Sep 18, 2019, 22:45 pm IST
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बिहार-नेपाल : यात्रा संग आया.. यादों का मेला
रायबरेली वालों की पारिवारिक यात्रा का यह तीसरा पड़ाव है. पहला, मथुरा-वृंदावन, दूसरा झांसी-दतिया-ओरछा और तीसरा चंपारण (मोतिहारी)- सीतामढ़ी-जनकपुर-काठमांडू. वैसे तो सभी यात्राएं एक याद-एक छाप छोड़ती हैं पर तीसरी और ताजी ( 7-12 सितंबर 2019 ) बिहार-नेपाल यात्रा कुछ ज्यादा ही रोमांचक और स्थाई स्मृतियों वाली रही. 17 सौ किलोमीटर लंबी इस यात्रा के यादगार  बनने की  वजह है दो है. एक, कुछ खट्टी यादों का जुड़ना और दो, पहली बार ऐसे स्थानों पर पहुंचना जिनसे परदेस भ्रमण का एक पुरसुकुं  एहसास..आइए! हमारे साथ चलिए इन धार्मिक-पौराणिक-ऐतिहासिक स्थानों की "शब्द यात्रा" पर..
 
मोतिहारी (चंपारण)
 
बिहार प्रदेश का मोतिहारी पुराना चंपारण है. जहां चंपारण वहां गांधीजी. चंपारण सत्याग्रह किसको पता नहीं होगा. यही वह पवित्र भूमि है जिसने गांधी को बापू बनाया. जिसने गांधी को देश दिखाया-सिखाया. चंपारण के कण-कण में गांधी की यादें विखरी हैं. चंपारण के चंद घंटों के प्रवास में हम बापू से जुड़े 2 स्थान ही देख पाए-गांधी संग्रहालय और चरखा पार्क. संग्रहालय की दीवारें बापू के चंपारण प्रवास की सुखद स्मृतियों से अटी पड़ी हैं. बीचोबीच में बना विशालकाय स्तंभ बापू का जीवंत स्मारक सा प्रतीत होता है. संग्रहालय परिसर में  एक नील का पेड़  विशेष रूप से आने वाले को आकर्षित करता है. नील की खेती पर "कर" ही बापू को चंपारण  खींच लाया था. बापू को जानना तो जीवन की निधि बनी ही बापू के संग-साथ जीवन शुरू करने वाले तब के बालक और आज के बुजुर्ग (89 वर्षीय) बाबू ब्रजकिशोर सिंह जी से मिलना बापू युग से साक्षात्कार समान सा था. बिहार सरकार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री रहे बाबू ब्रज किशोर जी बापू से मिले और उनसे मिलकर हम सब अपने को बापू से मिला हुआ महसूस किए. संक्षिप्त सी मुलाकात में उन्होंने बापू से जुड़ा अपने बाल जीवन का संस्मरण सुना कर कृतार्थ तो किया ही, हम सब उनकी इस बात से और ज्यादा प्रभावित हुए की महात्मा गांधी विश्वविद्यालय (चंपारण) ने गांधी पर लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ योजनाएं बनाई और उस योजना में एक योजना बाबू ब्रजकिशोर की अपनी भी है. जानना चाहेंगे तो जानिए.. गांधी जी पर अच्छा लिखने वाले को वह अपनी तरफ से 51000 का पारितोषिक प्रदान  करने का निश्चय किए हैं. है ना यह गांधीवाद का प्रतीक. अपनी इस अवस्था में बाबू बृज किशोर जी नियमित म्यूजियम आते हैं, व्यवस्था संभालते हैं, सिर पर वही गांधी टोपी धारण किए हुए. मोतिहारी में मोती झील का भी अपना एक अलग ही मजा है अगर इसे साफ सुथरा कर दिया जाए और मछलियों की बदबू दूर कर दी जाए तो यह झील मोतिहारी का "प्राण" बन जाए.
 
पुनौरा धाम सीतामढ़ी
 
यह वही पवित्र भूमि है जहां जगतजननी मां जानकी ने जन्म लिया. जानकी मंदिर में माथा टेकने का मैं अपन को एक अलग ही अनुभूति हुई. मंदिर के ठीक पीछे वह स्थान आज एक सरोवर के रूप में संरक्षित है जिसे माना जाता है कि यह वही भूमि है जिस पर हल जोतते हुए महाराज जनक को मां जानकी जैसी तेजस्वी-तपस्वी-पतिव्रता- निरभिमानी पुत्री की प्राप्ति हुई. इसे "पुनौरा धाम" क्यों कहा जाता है यह जिज्ञासा समय के अभाव में शांत नहीं हो पाई. यह देखकर निराशा हुई कि मां जानकी के जन्म से जुड़ा यह पवित्र स्थान बिहार के बड़े तीर्थ-पर्यटक सूची में तो शामिल है पर यहां पहुंचने तक का मार्ग ही उपेक्षा की व्यथा-कथा सारे रास्ते कहता चलता है. मंदिर का एक जिलाधीश महोदय ने जीर्णोद्धार तो कराया लेकिन अभी भी मां जानकी की मान्यता से इसकी भव्यता-दिव्यता कई गुना कम है. भक्तों को थोड़ी निराशा होती है बिहार सरकार चाहे तो यह निराशा दूर हो सकती है. मां सीता भारतीय नारियों की आदर्श हैं और पुरुषों की मां स्वरूपा.
 
जनकपुर (नेपाल)
 
यथा नाम-तथा गुण. जनकपुर की जान जानकी मंदिर ही है. भव्य महल सा दिखने वाला जानकी मंदिर भारत की ही देन है. इतिहास में दर्ज है कि 100 वर्ष पहले टीकमगढ़ मध्य प्रदेश की महारानी कुमारी बृजभानु ने भव्य जानकी मंदिर जनकपुर में निर्मित कराया था. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनकपुर के जानकी मंदिर में माथा टेका. उनके जाने के बाद जानकी मंदिर के पुराने से हो चले महल के जीर्णोद्धार एवं रंग-रोगन का काम तेजी से चल रहा है. ऊपरी मंजिल पर जानकी से जुड़ी कथाओं को दर्शाने वाली झांकियों के स्थान पर कोने में कहीं-कहीं पड़ी पान की पीके भक्तों की "तथाकथित भक्ति" का परिचय स्वयं ही देती हैं. जनकपुर की पहचान महाराजा जनक नहीं मां जानकी हैं. इसका अंदाजा आप इस बात से खुद लगाइए कि मां जानकी का मंदिर भव्य महल सा है और महाराज जनक का मंदिर गंगासागर झील के पास सामान्य सा. गंगासागर में 5 वर्ष पहले काशी की तर्ज पर  काशी के पंडितों  द्वारा ही प्रारंभ हुई जानकी आरती अब एक ऐसी परंपरा-प्रथा बन चुकी है जिसका सहभागी बनकर लोग अपने को पुण्य का भागी मानने लगते हैं. सीता विवाह मंडप, राम मंदिर और धनुष सागर भी जनकपुर की पहचान है. 
 
और हां! कभी जाए तो 20 किलोमीटर दूर धनुषा धाम देखना कतई ना भूलें. मान्यता है कि भगवान राम द्वारा भंग किए गए धनुष का एक टुकड़ा यही गिरकर धरती में समाया था. धनुष के उस समाहित स्थल पर ही एक कुंड बन गया बताया जाता है. मान्यता है कि यह कुंड मिथिला क्षेत्र के किसानों को आज भी आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का संकेत दे देता है. धनुषा धाम के पुजारी हर आने वाले को यह बताते जरूर है कि कुंड में पानी जितना ऊपर होगा बारिश उतनी ही अच्छी और बारिश अच्छी तो  फसल भी. क्षेत्र के किसान आज भी कुंड के पानी के हिसाब से ही  फसलें बोते और उगाते हैं. इस वर्ष कुंड में पानी बहुत नीचे चला गया तो मिथिला क्षेत्र में बारिश भी कम हुई ऐसा मंदिर के पुजारी जी ने हम सब को बताया. एक अजीब किस्म के पत्थरों की लगातार बढ़ती प्रजाति को दैवीय चमत्कार के रूप में भी देखा जाता है.
 
काठमांडू- पशुपतिनाथ महादेव
 
कौन नहीं जानता काठमांडू. नेपाल की राजधानी के रूप में, देवों में देव पशुपति नाथ महादेव के रूप में और विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के रूप में. पहाड़ के शिखर पर बसा काठमांडू रास्ते भर तो यह एहसास कराएगा कि आप पहाड़ की चढ़ाई की ओर अग्रसर है लेकिन पहुंचने पर यह एहसास खत्म सा होता जाता है कि आप किसी पहाड़ के शिखर पर है. कई किलोमीटर की चौहद्दी वाला महानगर काठमांडू बिल्कुल अपने देश के मुंबई-कोलकाता-दिल्ली मेट्रो सिटी जैसा ही लगता है. आस्था वादियों के लिए काठमांडू एक तीर्थ है, पशुपतिनाथ महाराज का धाम वहां जो है. काठमांडू कुछ और बातों के लिए भी जाना-पहचाना है लेकिन उसका जिक्र यहां मुनासिब नहीं. रायबरेली की टोली तो पशुपति नाथ जी महाराज के दर्शन बेताब थी. बेताबी दूर हुई पवित्र भूमि के पुण्य स्पर्श से. पशुपतिनाथ महादेव मंदिर के कण-कण और पल-पल पवित्रता का अहसास कराते हैं. भारत के तीर्थों की तरह पंडों की न लूटखसौट दिखी और ना फूल-पूजा सामग्री बेचने वालों में मारामारी. दर्शन का सिस्टम भी सामान्य. पशुपतिनाथ के दरबार में सभी भक्त समान. ना कोई छोटा ना कोई बड़ा. चांदी-पीतल  से सजे पशुपतिनाथ महादेव का मंदिर वास्तव में पुराने वास्तुशिल्प का एक नायाब नमूना है. एक बार घूम तो आइए काठमांडू.. दर्शन कीजिए बार बार आने का मन ना करे तो हमसे कहिए..
 
तभी बनी यादगार यात्रा
 
हमारी यात्रा में काठमांडू शामिल नहीं था लेकिन टोली के सभी सदस्यों की ज़िद ने काठमांडू पहुंचा दिया. बस के सारथी श्रेष्ठ मनोज की भूमिका इस यात्रा को यादगार बनाने में कम नहीं है अगर वह काठमांडू जाने को तैयार ना होते तो सब धरा का धरा ही रह जाता. अब सोचता हूं कि अगर यात्रा में काठमांडू आखिरी पड़ाव ना बना होता तो शायद यह यात्रा उतनी यादगार ना बन पाती.
 
जय मां जानकी.. हर हर महादेव...
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