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नेपाल बॉर्डर: वो रात..

गौरव अवस्थी  , Sep 16, 2019, 18:39 pm IST
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नेपाल बॉर्डर: वो रात..
हम रायबरेली वालों की मोतिहारी-जनकपुर-काठमांडू की धार्मिक- सांस्कृतिक यात्रा अपने समापन चरम पर थी. नेपाल की राजधानी काठमांडू रात में देर से पहुँचना और सुबह जल्दी वापसी की यात्रा शुरू कर देने का मक़सद यही था कि समय से अपने घर-वतन वापसी कर ली जाए. तीन सौ किलोमीटर दूर नेपाल बॉर्डर सोनौली समय से पास कर लेने का लक्ष्य रखा गया. सब कुछ ठीक था बस पर सवार सभी छोटे-बड़े, महिलाएँ -पुरुषअपनी अपनी तरह से मौज मस्ती में व्यस्त थे. घड़ी जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी..दिल की धड़कने भी उसी तरह.शाम 7.30 बजे नारायणगढ़ से गाड़ी आगे बढ़ी. तब तक पूरा यक़ीन था कि हम सब समय से सोनौली नेपाल बॉर्डर पहुँच जाएंगे.
 
इक मोड़ आया..
 
तभी एक मोड़ आया.टोल चुकाया..और वहीं से लगने लगा कि देर न हो जाए कहीं देर न हो जाए..अपने दिल का हाल धीरे-धीरे बिगड़ने लगा. बाक़ी सब मगन थे. महिलाएँ भजन में. बच्चे अंताक्षरी में. हमारी एक आँख घड़ी की सुई पर और एक अपने गन्तव्य सोनौली बॉर्डर पर लगी थी आग लगी ही रही तब तक जब तक नेपाल बॉर्डर आ नहीं गया. अचानक बस में ब्रेक लगी. आवाज़ आयी आ गया..आ गया..घड़ी की छोटी सुई दस पर और बड़ी20 वाली डंडी पर.
 
चारा रहा एक..
 
कर्ता धर्ता नेपाली कस्टम के चेक पोस्ट पर काग़ज़-पत्तर लेकर पहुँचे. नेपाली-हिंदी मिक्स एक कड़क आवाजा आयी-“अब गेट नहीं खुल सकता. देर हो चुकी है. सब कुछ ऑनलाइन है. कोई कुछ नहीं कर सकता. अब आपको रात भर इंतज़ार करना होगा. गेट सुबह ही खुलेगा.” यात्रा की सारी मस्ती फूरर हो चुकी थी. सारी कोशिशें बेकार..आते आपस में लड़ रही थी. आँखें निंदासी.. अब बस एक ही चारा रह गया था बस पर “वो रात..” काटने का. जैसे तैसे रात काटी ही गई. 50 लोगों के कहीं ना खाने का इंतजाम और ना पहुड़ने का. बॉर्डर से सटे एक रेस्टोरेंट में सिर्फ 20 लोगों के खाने का इंतजाम हो पाया. जिसने जो पाया वह खाया कुछ तो लंघन ही कर गए. एक पूजा के बाद दौर था थकान से चूर-चूर शरीर को आराम देने का.
 
सवाल वही..
 
इतनी बड़ी बारात का इंतजाम हो तो कैसे गेस्ट हाउस होटल थे तो बहुत लेकिन धंधा गर्म करने के चक्कर में रेट अनाप-शनाप. फिर वही हुआ जो होना था. टहल के-बैठ के. जो जहां पाया आधा लेकर या पूरा बस में कुछ चेक पोस्ट की कुर्सियों पर कुछ सड़क किनारे गोपियों के बाहर पड़ी बैंजो पर और कुछ दुकानों के बाहर खाली पड़ी जगहों पर बैठे- लेटे. नेपाली मच्छरों की तो जैसे दावत हो आई. जीव रूपी जी और आदमी रूपी भी.. नशेड़ी नेपालियों ने क्या क्या कोशिश ना की कुछ "माया" के चक्कर में..
 
वो सुबह..फिर कभी ना आएगी...
 
इस पार से उस पार जाने की बेताबी में नेपाल  बॉर्डर  बेहलिया-सोनौली की वो सुबह ऐसी लगी कि जैसे अंधेरी जिंदगी को रोशनी की किरण. उस सुबह का सूरज स्मृतियों में धुंधला होने का कोई सवाल ही नहीं. इंतजार था घड़ी में सुबह 6:00 बजने का. दिमाग की घंटियां बजने लगी. अंदर से हिलोरे उठने लगी. अशांत मन थकान से चूर शरीर कि यह हिलोरे एक बार फिर ऊपर नीचे होने लगी जब नेपाली कस्टम के कर्मचारियों ने जेब गर्म करने के फेर में गेट खोलने में देरा- देरी शुरू कर दी. कुछ साथियों की कोशिशें काम आई.
 
खुल गई किस्मत..
 
बॉर्डर का गेट क्या खुला जैसे किस्मत खुल गई हो.. नेपाल भारत के बॉर्डर की 50 मीटर की दूरी (नो मैंस लैंड को मिलाकर)  पार कर अपने वतन में केवल बस ही नहीं आई तन मन में जान भी साथ आई जैसे.. बस आगे की बस यात्रा वैसी ही जैसे शेष..
 
याद तो रहेगी वही रात..
 
इंटरनेट (अंतरजाल) यूजर्स जानते हैं कि काफी डाटा ऑटोमेटिक वॉश होता रहता है. बचता बस वही है जिसे सेव कर लिया जाए. सभी  जानते हैं कि इंसानी मन इसी अंतर्जाली दुनिया का प्रारंभ बिंदु है. सकारात्मक डाटा तो ऑटोमेटिक वॉश होता रहता है लेकिन नेगेटिव ज्यादा याद रहे ही जाता है. इसीलिए नेपाल बॉर्डर की "वो रात.." हम सभी को याद है याद रहेगी.. जनम-जनम तक. धन्यवाद उन "पलों" का जिन्होंने खट्टी-मीठी यादों से झोली भर दी. 
 
# धन्यवाद# शुक्रिया#thanks
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