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बॉर्डर: एक अनकहे युद्ध की कहानी

गौरव अवस्थी , Sep 15, 2019, 14:38 pm IST
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बॉर्डर: एक अनकहे युद्ध की कहानी
40 से 60 वर्ष की उम्र वाले हर भारतीय को अभी तक  याद होगा आज से 22 वर्ष पहले (1997 में) एक फिल्म बनी थी "बॉर्डर". भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध पर आधारित इस फिल्म को दर्शकों ने काफी पसंद किया था. फिल्म ने 161  करोड़ रुपए का कारोबार किया था. फिल्म बताती है कि देश के वीर जवान कैसे बॉर्डर पर युद्ध लड़ते और जीतते हैं. फिल्म में अभिनेता सनी देओल के रोल  की खूब प्रशंसा भी हुई थी.
 
यह भी अपनी तरह का एक  अनकहा युद्ध है. यह  छोटी सी आंखों-देखी (रात भर भोगी) लिखने का मकसद केवल यह बताना है कि बॉर्डर पर युद्ध केवल सैनिक ही नहीं लड़ते जनता भी लड़ती है. उसके लड़ने और जीतने-हारने की कहानी भी हर भारतीय की होती है...
 
पाकिस्तान के अलावा एक और पड़ोसी देश है नेपाल. भारत का मित्र देश. कभी इस देश के बॉर्डर पर आप भी लड़ के या यूं कहें कि फंस कर देखिए, युद्ध से कम त्रासद कहानी आपकी नहीं होगी. इस मित्र देश की अपने देश भारत से लगी सभी सीमाएं रात 10:00 बजे सील हो जाती हैं. कोई वाहन ना इधर आ जा सकता है और ना जा सकता. हां! पैदल आप (24×7) कभी भी आ जा सकते हैं. अभी-अभी इस गुजरी रात (12  सितंबर 2019) को ही ऐसी ही त्रासदी से हम ही नहीं हमारे साथ छोटे-बड़े, महिलाएं-बच्चे सब गुजरे. रायबरेली के 50 लोगों का एक जत्था  (जिसमें  16 महिलाएं और 9 बच्चे भी शामिल थे ) अयोध्या से जनकपुर की  सांस्कृतिक धार्मिक यात्रा पर निकला. गांधी की कर्म स्थली चंपारण से  होते हुए यह जत्था  जनकपुर  और काठमांडू पहुंचा. 11 तारीख की अलसुबह  काठमांडू से शुरू हुआ वापसी का सफर  रास्ते में लैंड स्लाइड की वजह से जाम में फंसा रहा. इसका फल यह हुआ कि सोनौली बॉर्डर पर पहुंचते-पहुंचते बज गए रात के 10:20.
 
नेपाली भंसार टैक्स ऑफिस (नेपाली कस्टम विभाग ) के कर्मचारियों से लाख मिन्नतें की की गई दुश्वारियां बताई गई  लेकिन बस को भारत की सीमा में प्रवेश की इजाजत नहीं दी गई तो नहीं ही दी गई. रात सोते-जागते, उठते-बैठते जैसे तैसे गुजर रही थी, गुजरी भी. कर्मचारी चाहते तो अधिकारी से आदेश लेकर छोटे-छोटे बच्चों और महिलाओं  से भरी बस को अपने देश लौटने की इजाजत दे सकते थे लेकिन दी नहीं.
 
जानते हैं क्यों? 
 
इसकी एक बड़ी वजह है, धंधे के धर्म की और दूसरी मित्र देश के नागरिकों को परेशानी से रूबरू कराने की ताकि मित्र देश के लोगों को कुछ सबक सिखाए जा सके. नेपाल में ही कारोबार करने वाले भारत के कुछ व्यापारी इस रहस्य से पर्दा उठाते हैं कि जब से चीन ने नेपाल में भारत से 4 गुना निवेश शुरू किया है तबसे नेपाल से लगी भारत की सीमाओं पर भारतीयों को परेशान करने के किस्से बढ़ते ही जा रहे हैं ताकि भारतीयों का नेपाल में दखल कम से कम होता चला जाए. इसे चीन की एक कूटनीति के तौर पर भी नेपाल और सीमाओं से सटे भारतीय इलाके में देखा सुना जाता है. आश्चर्य है कि भारत सरकार और भारत सरकार के नेपाल में नियुक्त राजदूत को चीन की ऐसी चालें दिख क्यों नहीं रही है?
 
हम नहीं कहते कि कानून का उल्लंघन या कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा न करने वालों को दोनों देशों में बेरोकटोक आवाजाही की अनुमति दे दी जाए लेकिन मजबूरी में फंसे लोगों को इजाजत देना ना कानून का उल्लंघन है ना प्रक्रिया का. आप भी इस पर सोचिए भी चाहिए और अपनी प्रतिक्रिया दीजिए ताकि किसी को भी मजबूरी में भारत नेपाल की सीमा पर अराजक रात में गुजारनी पड़े.
 
एक सुनी सुनाई यह भी..
 
बॉर्डर पर होटल और रेस्टोरेंट चलाने वाले कारोबारी इन कर्मचारियों पर पर्यटकों-यात्रियों से भरी ऐसी बसों और वाहनों को ना छोड़ने का दबाव इसलिए बनाते हैं कि अंधेरी रात में उनका धंधा चमक सके. ऐसे कारोबारियों का धंधा ना चमकाने वाले पर्यटकों को सबक सिखाते हैं दोयम दर्जे के नेपाली नशेड़ी. छोटी सी बात पर बखेड़ा खड़ा करके पैसे वसूल ना ऐसे नशेड़ी नेपालियों की आदत में शुमार हो चुका है.
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