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शाहिद कपूर की फ़िल्म कबीर सिंह और प्रेम के नाम पर घृणा और औद्धत्य का महिमामण्डन

शाहिद कपूर की फ़िल्म कबीर सिंह और प्रेम के नाम पर घृणा और औद्धत्य का महिमामण्डन
फ़िल्म कबीर सिंह इस सप्ताह 200 करोड़ रुपए की कमाई को पार कर जाएगी। यह कमाई बता रही है कि हमारा समाज पतन के किस दौर से गुजर रहा है। हमारे समाज का निरन्तर सांस्कृतिक पतन हो रहा है और हम कुत्सित अभिरुचियों के दौर से गुज़र रहे हैं।
 
मेरे लिए यह बहुत ही कुतूहल का विषय है कि आख़िर लोगों को एक घृणित नायक इतना क्यों पसंद आ रहा है? 
 
क्या इसलिए कि हम हर जगह घृणित नायकों को ही प्रतिस्थापित कर रहे हैं। चाहे वह फ़िल्म का क्षेत्र हो या राजनीति का, समाज का या धर्म का?
 
क्या ऐसा व्यक्ति नायक हो सकता है, जो चाकू निकाले और नायिका को भयभीत करके उससे शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करे?
 
किसी समाज में जब अच्छी संस्कृति का माद्दा नहीं होता तो वह कुत्सा और गंदेपन को संस्कृति का रूप देने लगता है। 
 
हम जैसी राजनीतिक संस्कृति रच रहे हैं, वैसी ही फ़िल्में भी बना रहे हैं और वैसा मीडिया भी तैयार कर रहे हैं। हमारी शिक्षा का हाल भी वही है और न्याय व्यवस्था का भी। हमारे संस्थान अब गिरावट को जी रहे हैं।
 
दरअसल, यह मॉब लिंचिंग का युग है। आपको लगता होगा कि सिर्फ़ गाय ले जाते निरीह मुसलमान की मॉब लिंचिंग हो रही है, लेकिन सच तो यह है कि अब मानवीय मूल्यों और भारतीयता की मॉब लिंचिंग हो रही है। 
 
कहां तो हमारी फ़िल्मों और साहित्य में किसी गुंडे को भी महिलाओं की मर्यादा का रक्षक बताने की कोशिश की जाती थी और कहां नायक के रूप में एक पतित डॉक्टर को दर्शाया गया है।
 
फ़िल्म देखकर कई जगह तो ऐसा महसूस होता है, मानो यह फ़िल्म बनाई ही इसलिए गई है कि फ़िल्मकार दुष्टों का गौरवान्वयन करना चाह रहा हो। हो भी यही रहा है। जो गरिमावान हैं, वे निशाने पर हैं और जो असहनशील हैं, वे सहनशीलों पर भारी पड़ रहे हैं। धर्मांधता हाथ में चाकू लेकर धर्मनिरपेक्षता को निर्वस्त्र करने को विवश कर रही है।
 
कुछ समय पहले संजू फिल्म आई थी और उसमें हीरो कह रहा था कि उसने अब तक 300 लड़कियों से सेक्स किया है। अब संजू ने ऐसा किया है तो नई फिल्म का हीरो उसकी लाइन के बराबर बड़ी लाइन नहीं खींचे तो क्या मतलब? इसलिए उसने नायक से संवाद बुलवाया कि वह प्रेमिका से 449 बार सेक्स कर चुका है!
 
कुछ समय पहले 'वीरे दी वेडिंग' आई तो उसमें नायिकाओं ने वर्जनाएं तोड़कर पौरुषपूर्ण काम करके मर्दों की मर्दानगी को शर्मसार कर दिया। लेकिन वर्जनाएँ तोड़कर जीने और घिनौने होने में बहुत अंतर है। 
 
फिल्म में नायक को अपनी कामुकता शांत करने के लिए जिस तरह जींस में बर्फ़ डालते हुए दिखाया गया है, वह बहुत ही गंदा, अप्रिय और कुत्सित दृश्य है। इसमें कहीं भी कलात्मकता नहीं है। इस मामले में अगर हम 90-91 साल पहले लिखे गए एक उपन्यास ‘लेडी चैटर्लीज लवर्स’ को याद करें तो देखेंगे कि बिना किसी अश्लील शब्द के डीएच लॉरेंस ने किस तरह यौन संसर्ग से जुड़ी भाव-भंगिमाओं को जीवंत किया था। यह उपन्यास पूरा का पूरा ही अश्लील करार दिया गया, लेकिन इस उपन्यास की भाषा, भाव वैभव और प्रस्तुतिकरण इतना सशक्त है कि अदालतों में न्यायाधीश इसे पढ़कर मंत्र मुग्ध होते रहे।
 
मुझे हैरानी नहीं हुई कि सेंसर ने इस तरह के दृश्य को पारित कर दिया, लेकिन एक दृश्य पर न केवल हैरानी हुई, बल्कि किसी तरह की आपत्ति न आने पर तो मैं स्तब्ध हूं। 
 
नायिका के सिख पिता को कई बार ‘मां-याहवा’ कहते हुए दिखाया गया है, जिसका सीधा मतलब ‘मादर..चो’ होता है। क्या किसी नायक को अतिरिक्त मर्द दिखाने के लिए फ़िल्मकार इतना गिर सकता है कि वह मां या बहन की गाली का इस तरह इस्तेमाल करे। क्या यह सरासर स्त्रियों का अपमान नहीं है? जिस समाज में जातिसूचक गाली देना अपराध हो, वहां मां या बहन को इस तरह गाली देना तो जंगलीपन की इंतेहा है।
 
नायक मेडिकल कॉलेज में पीजी कर रहा है और वह एमबीबीएस के फस्ट ईयर में आई सम्मोहक लड़की पर जिस तरह मुग्ध हाेता है और उसे अपनी बंदी घोषित करता है, वह इस देश के जिस कालखंड में हुआ करता था, वह अब अतीत हो गया है। फ़िल्मकार भूल जाता है कि प्रेम के अंकुर चाहत और सम्मान की ऊष्मा के बीच आकुल हृदय की बेचैनी में फूटते हैं।
 
आज लड़कियां वैसी नहीं हैं, जैसी नायिका को दिखाया गया है। आज की स्त्री को देखना हो तो महुआ माेइत्रा, ममता बैनर्जी या स्मृति ईरानी को देखना चाहिए। एक संसद में पहले ही भाषण से धमाल मचाती है और राष्ट्रवादी ब्रिगेड को स्तब्ध कर देती है! दूसरी देश के सबसे दो दिग्गज नेताओं को गुंडागर्दी और हिंसाचार तक में पछाड़ खिलाती है और तीसरी इस देश की सबसे पुरानी पार्टी के सबसे बड़े नेता को उसके चुनाव क्षेत्र से भागने पर विवश कर देती है।  
 
यह सही है कि आजकल भी लड़के-लड़कियां शराब पीते और ड्रग्स लेते हैं, लेकिन अगर वे अश्लीलता और अपसंस्कृति रचते हुए हमारे नायक होने लगें तो यह शर्मनाक ही है।
 
यह बर्बरता और जंगलीपन को जीते हुए नायकत्व संभव ही नहीं है।
 
लेकिन चिंता यह है कि इस फ़िल्म को महिलाएं बहुत पसंद कर रही हैं। शायद इसकी वजह ये है कि हमारे नगरों की महिलाओं ने भले आधुनिकता के कितने ही आवरण ओढ़ लिए हों, लेकिन उनके दिलो-दिमाग़ पर आज भी कस्बाई मानसिकता और सामंतवादी संस्कार तारी हैं। उन्हें भी लगता है कि पौरुष वही स्वीकार्य है, जो पत्नी या प्रेयसी का जमकर मानमर्दन करे। फिर भले वह आंगन में हो या बेडरूम में। आपने कभी ध्यान नहीं दिया होगा कि आज भी दूल्हे को घोड़े पर चढ़ाया जाता है और घोड़ा चारपाई पर पांव रखकर उसे तोड़ता है। यानी पुरुष वही है, जो आंगन में पत्नी पर अपना पूरा वर्चस्व साबित करे और बेडरूम में वह बेड की चूलें हिला दे। जिस तरह यह पौरुष एक मिथक है, उसी तरह कई बार ये भान होने लगता है कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति और हमारे मूल्य भी मिथक हो गए हैं। क्योंकि पौरुष कहो या दबंग, हर जगह इनका दबदबे को ही युगधर्म बताया जा रहा है। सारी मर्यादाएं स्त्री या कमज़ोर पर लादी जाती हैं।
 
हमारे समाज के एक बड़े हिस्से के सामूहिक अवचेतन में एक अापराधिक मानसिकता दबी हुई है। लोग इसका समय-समय पर गौरवान्वयन बड़ी चतुराई से करते हैं और पैसा बटोरते हैं। फ़िल्म, राजनीति और धर्म के चतुर खिलाड़ी इस मनःस्थिति का उपयोग बहुत तरीके से करते हैं।
 
कबीर सिंह में एक गुंडे नायक को गौरवान्वित किया गया है और एक सम्मोहक नायिका की भरपूर अनदेखी गई है। 
 
ज़्यादातर भारतीय फ़िल्मकारों की निगाह में औरत सदा से ही पुरुष की ग़ुलाम प्रदर्शित की गई है। आप 1965 की 'खानदान' देखें या कोई और, नायिका गाती है : ‘तुम ही मेरे मंदिर, तुम ही मेरी पूजा, तुम ही देवता हो। कोई मेरी आँखों से देखे तो समझे के तुम मेरे क्या हो! जिधर देखती हूँ, उधर तुम ही तुम हो, न जाने मगर किन ख़यालों में गुम हो? तुम ही मेरे माथे की बिंदिया की झिलमिल, तुम ही मेरे हाथों के गजरों की मंज़िल, मैं हूँ एक छोटीसी माटी की गुड़िया, तुम ही प्राण मेरे, तुम ही आत्मा हो!’
 
अरे फिल्मकारो, कभी तुम नायक यानी पुरुष को देवता घोषित करके स्त्री, पत्नी या प्रेयसी को उसकी दासी घोषित करते हो और अब तो हद ही हो गई कि आपने अपने नायक को दैत्य घोषित करके नायिका या प्रेयसी को उसकी संपत्ति (ये मेरी बंदी है) घोषित कर दिया! 
 
फ़िल्म का नायक हर किसी जवान लड़की को अपनी हवस की भूख को शांत करके भी नायक है और फ़िल्म के अंत में जहाँ इस दैत्य को नायकत्व प्रदान किया गया है, वहाँ नायिका पर यौन शुचिता लाद दी गई है। उसकी शादी तो हुई, लेकिन पति ने उसे छुआ तक नहीं। उसके गर्भ में इसी दैत्य नायक का गर्भ है! हद है!! ये फ़िल्मकार किस आदिम मानसिकता में जी रहा है!!!
 
फिल्म में प्रेम कहीं नहीं है। प्रेम की जगह सेक्स का तीव्र उफान है, जो आनंदानुभूति के बजाय जुगुप्सा जगाता है। सेक्स जीवन का अनिवार्य अंग है, लेकिन प्रेम के बिना उसका कोई महत्व नहीं। 
 
प्रेमहीन सेक्स कोरी धूप है तो प्रेम से लबरेज जीवन में संसर्ग वैसा ही है, जैसे बादलों की फुहार के बीच की वह हल्की सी धूप जिसमें इंद्रधनुष सात रंग लेकर आपकी पलकों पर फैला देता है और जिसमें सूखती शाखाएं सब्ज़ हो जाती हैं और सब्ज़ शाखाओं में फूल खिल उठते हैं। होंटों पर सपने लरजने लगते हैं और सोच में तितलियां उड़ने लगती हैं। लेकिन ऐसा कोई नायक नहीं होता, जो ड्रग्स ले, घिनौने ढंग से जींस में बर्फ भरे और चाकू दिखाकर प्रेयसी को निर्वस्त्र करे और फिर भी उसे देखकर जिस्म के झरने पर चांदनी रमझोल करे।


*वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन की फेसबुक वाल से.
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