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भारतीय लोकतंत्र का नवीन युग एवं मोदी के समक्ष चुनौतियाँ

डॉ संजय कुमार , Jun 07, 2019, 13:55 pm IST
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भारतीय लोकतंत्र का नवीन युग एवं मोदी के समक्ष चुनौतियाँ

१७वें लोकसभा चुनाव में मोदी एवं भाजपा की जबरदस्त जीत ने भारतीय लोकतंत्र में एक नयी गाथा लिख दी है. यह गाथा भविष्य में कितना कारगर सिद्ध होगा, यह तो समय हीं बतायेगा. परन्तु उतर प्रदेश सहित उत्तर भारत के लगभग सभी राज्यों में इस अभूतपूर्व जीत के क्या मायने हैं? क्या अब यह मान लिया जाना चाहिए कि अब भारतीय राजनीति की धुरी कांग्रेस से हटकर भाजपा हो गयी है. एक प्रकार से भाजपा का पैन - इंडिया प्रसार लगभग पूरा होता दिख रहा है. तमिलनाडु, आन्ध्राप्रदेश, और केरल को छोड़कर भाजपा का परचम सभी जगह लहरा रहा है. तो क्या यह विजय राष्ट्रवाद की है अथवा जातिविहीन समतामूलक समाज के स्थापना की है. इसके निहितार्थ तो फिलहाल भविष्य के गर्त में छिपे है, परन्तु जीत के इस घोड़े पर सवार मोदी – शाह की जोड़ी भारतीय लोकतंत्र की एक नयी इबारत तो लिख हीं चुकी है. इस जीत के कारण क्या रहे? अब इस पर ज्यादा बहस की गुंजाईस नहीं बची है. तमाम विद्वानों एवं शिक्षाविदों ने इस पर अपनी बात रख दी है.

सवाल इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि अब मोदी – शाह के सामने चुनौती कैसी आने वाली है? क्या इस जीत की ख़ुशी में मोदी और शाह आने वाली चुनौती को अनदेखा तो नहीं कर रहे हैं? सबसे महत्वपूर्ण चुनौती जम्मू - कश्मीर से सम्बंधित धारा ३७० और ३५ए एक्ट को लेकर है. दूसरी चुनौती राम मंदिर के निर्माण को लेकर है. मुझे ऐसा लगता है कि यदि इन दोनों चुनौतियों को मोदी जी शांतिपूर्वक एवं सह्योगी तरीके से सुलझाने में सफल हो जाते है तो यकीन मानिए आने वाला कल भारतीय राजनीति के लिए पूरी तरफ भाजपामय हो जाएगा. परन्तु क्या यह इतना आसान है जितना यह दिख रहा है? यहीं पर असली समस्या है. आने वाला समय मोदी के लिए न सिर्फ चुनौतीपूर्ण है वरन बेहद खतरनाक भी है. राजनीति में एक बात जो सबसे बड़ी है – कोई भी व्यक्ति या समस्या जो दिखता है वैसा घटित नही होता है, और जैसा घटित होता है वैसा दिखता नही है. कभी कभी बेहद सामान्य सी दिखने वाली घटना कब विकराल रूप धारण कर ले, कुछ नही कहा जा सकता है. अभी तो थका हारा विपक्ष पूरी तरह पस्त लग रहा है, परन्तु एक छोटा सा तिनका कब इनका सहारा बन जाए कोई नही जानता. और निश्चित तौर पर उस तिनके के इन्तिज़ार में विपक्षी नेतागण टकटकी लगाए बैठे होंगे.

राष्ट्रवाद और विकास के जिस विजय रुपी रथ पर सवार मोदी – शाह की जोड़ी लगातार विजय पताका फ़हरा रही है, एक छोटी सी चूक भी भारी पड़ सकती है. यों कहें तो तलवार की धार पर मोदी बैठे हैं, जिसके एक तरफ विजय की उत्तुंग ऊँचाई तो दूसरी तरफ भयानक गहरी खाई है. दूसरी ओर राहुल गाँधी हैं, जो लगातार अपने इस्तीफा देने पर अड़े हुए हैं. अभी तक कांग्रेस उनसे ऐसा करने पर रोके हुए है, परन्तु जैसा मुझे प्रतीत हो रहा है कि आने वाले दो से तीन महीनों में राहुल गाँधी निश्चित तौर पर अध्यक्ष के पद से हट जायेंगे. वैसे भी नैतिक शुचिता के आधार पर चुनाव लड़ने वाले राहुल गाँधी अपना इस्तीफा देकर जनता के बीच यह सन्देश देना चाहेंगे कि अभी कांग्रेस के लिए सब कुछ समाप्त नही हुआ है. अगले पारी की तैयारी शायद वो और बेहतर तरीके से करना चाहते हैं. इस पूरे विमर्श की सबसे

ख़ास बात यह है कि मोदी शतरंज के खिलाडी की तरह चाले चल रहे हैं और अपने विपक्षी को माइंड गेम में उलझाकर रखना चाहते है. अभी तक वो निर्विवाद रूप से सफल साबित हुए हैं. परन्तु शायद विपक्षी इस बात को समझ नही पा रहे है. परन्तु जैसी की आशंका थी, जो आंशिक रूप से घटित भी हुआ, ईवीएम को लेकर अचानक से चुप्पी कहीं न कहीं कुछ और तस्वीर की तरफ इशारा कर रहा है. मोदी के माइंड गेम के अनुसार अभी तक विपक्ष नकारात्मक राजनीति के सहारे सत्ता प्राप्ति के मैच में शामिल था, जो स्वाभाविक रूप से फुटबॉल के आत्मघाती गोल के समान और शतरंज के ‘शह और मात’ के समान साबित हुआ. राहुल गाँधी के इस्तीफे की अटकले कुछ - कुछ ऐसे ही माइंड गेम की परिणति लग रही है. ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा अथवा ‘गाँधी परिवार मुक्त कांग्रेस’ – शायद भाजपा की असली मंशा यही है. निश्चित तौर पर राहुल गाँधी अभी तक मोदी के सामने कच्चे खिलाडी ही साबित हुए हैं, परन्तु वो काफी तेज़ी के साथ सीख भी रहे हैं. चुनाव हारना और जीतना इस खेल का एक पक्ष है. परन्तु ‘भाजपा युक्त भारत’ इस पूरे खेल का चरम बिंदु है.

आने वाला समय भारतीय राजनीति में युगांतकारी परिवर्तन का साक्षी बन सकता है. ऐसा लगता है कि मोदी के राष्ट्रवाद से प्रभावित होकर नहीं वरन उनके चारित्रिक सबलता से प्रभावित होकर जनता ने ज्यादा वोट दिया है. इस खाई को राहुल गाँधी कैसे भर पाते हैं यही उनकी असली चुनौती है. मोदी ने कांग्रेस के परिवारवाद के खिलाफ जमकर हमला बोला, जिसे जनता ने हाथों हाथ लिया. परन्तु दूसरी ओर एनडीए के तमाम घटक दल इसी रोग से ग्रस्त हैं, परन्तु उन्हें जनता ने स्वाभाविक रूप से लिया. अकाली दल, लोजपा, शिवसेना, अपना दल आदि सभी पार्टियाँ परिवारवाद के आधार पर हीं आगे बढ़ी हैं. परन्तु मोदी के साथ ने उन्हें उंचाई पर बिठा दिया. आने वाले कल में जब नैतिकता और शुचिता की बात होगी तब यह प्रश्न भी देर सवेर सभी दलों को चिंतन करने पर मजबूर कर देगा. ‘मोदी है तो मुमकिन है’ का नारा फिलवक्त भाजपा को खूब भा रहा है, परन्तु आने वाले समय में यही नारा उसके लिए नयी लकीर भी खीचेगा. अभी - अभी एडीआर की रिपोर्ट आई है. इसके अनुसार संपन्न हुए चुनाव में लगभग ४३ प्रतिशत सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुक़दमे दर्ज हैं. २००९ के पश्चात् इस प्रकार के मुक़दमे में १०९ और २०१४ के के मुकाबले २६ प्रतिशत का उछाल आया है, जो बेहद चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा कर रहे हैं. तो क्या भाजपा समेत तमाम दलों ने पुनः दागी लोगों को टिकट देकर चुनाव जीतने का नुस्खा अभी भी नही छोड़ा है. भाजपा के सामने यह एक गंभीर चुनौती भविष्य में आने वाली है. जाहिर सी बात है, ऐसे सांसद भ्रष्टाचार में लिप्त होंगें. साथ ही अन्य प्रकार के कुकृत्यों को भी करने से नही हिचकेंगे. ऐसी परिस्थिति में मोदी इनसे कैसे निपटेंगे, यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा. लेकिन जिस
प्रकार का जनादेश मोदी को प्राप्त हुआ है और जैसा कि पिछले कार्यकाल में उन्होंने निर्णय लिए, हमें यह आशा करनी चाहिए कि कठोर निर्णय लेने से वे नही पीछे हटेंगे.अल्पसंख्यकों का मुद्दा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होने जा रहा है. आखिर क्या कारण है कि एक भी मुस्लिम सांसद भाजपा से नही है. यह दीगर बात है कि पिछले पांच वर्षों में देश में कोई बड़ा दंगा या मुस्लिम की असुरक्षा को लेकर कोई सवाल खड़ा नही हुआ. परन्तु मुस्लिम अभी भी आशस्वत नही हैं. क्या भाजपा को १८वीं लोकसभा चुनाव हेतु अभी से मुस्लिमों को साथ लेकर कोई स्पष्टं नीति नही बनानी चाहिए. तीन तलाक़ का मुद्दा वैसे भी अभी अनिर्णय कि स्थिति में पड़ा हुआ है. संसद से पास करवाना और इसे कानून का रूप देना इतना आसान नही है. यदि उत्तर प्रदेश को देखा जाय तो १६वीं लोकसभा में एक भी मुस्लिम सांसद नही था और इस बार ५ सांसद निर्वाचित हुए हैं. ये सभी विपक्षी दलों से चुनकर मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से आये हैं. यानि इस बार भी मुस्लिम मतों का झुकाव भाजपा विरोधी हीं रहा है. ‘सबका साथ सबका विकास’ के नारे के साथ यदि भाजपा को आगे बढ़ना है तो निःसंदेह अल्पसंख्यक वर्गों के कल्याण के साथ साथ उनमे सुरक्षा की भावना भी भरनी हीं होगी.

एक प्रश्न जो सामान्य जनता के हिसाब से नही वरन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पक्ष के हिसाब से बेहद महत्वपूर्ण है. क्या ऐसा मान लिया जाना चाहिए कि भारत में अब वामपंथी विचारधारा के राजनीति का अंत सन्निकट है. बेगुसराय में कन्हैया कुमार ने एक संभावना जगाने की कोशिश की, परन्तु उनकी हार ने एक प्रकार से मुहर लगा दी कि भारतीय जनता का वामपंथी विचारधारा से मोहभंग हो गया है, और उसकी जगह ‘उदार प्रजातांत्रिक एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की विचारधारा ने अपनी पैठ भारतीय जनमानस में बना ली है, जिसके पुरोधा मोदी बनकर उभरे हैं. अगर पूरे ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो भारतीय जनमानस का स्वाभाव हीं उदारमना एवं संतुलन बनाकर चलने की रही है. शायद इसी का प्रभाव ज्यादा दिख रहा है जब मोदी जैसा व्यक्तित्व सामने आता है तो जनता उसे हाथो हाथ ले लेती है.

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