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आर्थिक आरक्षणः एक औचित्यपूर्ण बहस

डॉ शशिकान्त पाण्डेय एवं डॉ अमित सिंह , Feb 03, 2019, 11:06 am IST
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आर्थिक आरक्षणः एक औचित्यपूर्ण बहस केन्द्र की मोदी सरकार ने 103वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा सरकारी नौकरियों में आर्थिक-आरक्षण का कानून निर्मित कर लिया है। इस निर्णय की टाइमिंग (समय), रणनीति, दायरा, और शीघ्रता एक ’राजनीतिक मास्टर स्ट्रोक’ है। सभी राजनीतिक दल इसे लेकर सांप- छछुंदर वाली स्थिति में हैं। विशेषकर विपक्ष अवाक्, हताश और परेशान है। हिन्दी भाषी तीन राज्यों के चुनावी परिणाम एवं आगामी लोकसभा चुनावों के दृष्टिगत भारतीय जनता पार्टी द्वारा यह उठाया गया सोचा समझा कदम है जिस पर विरोधी दलों को भी बाध्य होकर सहमति देनी पड़ी क्योंकि समय-समय पर वे भी सवर्ण जातियों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की वकालत कर चुके है। हिन्दी पट्टी के तीनों राज्यों में भाजपा की हार के अनेक कारणो में उसके कोर वोट-बैंक सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी भी एक महत्वपूर्ण कारण रही है।

पार्टी ने चुनावी वर्ष में सवर्ण मतदाताओं कों न केवल अपने पाले में लाने का प्रयत्न किया है बल्कि विपक्ष के विरोध की धार को भी कुंद करने की कोशिश की है। जहाँ तक आर्थिक आरक्षण का प्रश्न है इस सन्दर्भ में आम तौर पर चार-पाँच तर्क दिये जा रहे हैं। पहला, यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 व 16 का स्पष्ट उलंघन है। दूसरा, यह एक राजनीतिक निर्णय है। तीसरा, सर्वोच्च न्यायालय इसे निरस्त कर देगा। चौथा, यह अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के मौजूदा आरक्षण को समाप्त करने का सुनियोजित प्रयास है। पाँचवा, आर्थिक आरक्षण के मौजूदा प्रावधान से एक सीमित वर्ग ही लाभान्वित हो पायेगा।

आरक्षण पर कोई भी बहस, चर्चा या रायशुमारी जातिगत स्थिति, संस्कारित-पूर्वाग्रह या राजनीतिक पसंद या ना पसंद की दृष्टि से की जाती है लेकिन, आर्थिक आरक्षण के बुनियादी धारणा को समझने की कोशिश की जानी चाहिए। कुछ लोग मौजूदा आर्थिक आरक्षण के नवीन प्रावधान पर प्रश्न खड़े कर रहे है कि संविधान के अनुच्छेद 15 व 16 में कहीं भी आर्थिक शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है। यह वर्ग एक बुनियादी तथ्य से अनभिज्ञ है। बहुत कम लोग यह जानते है कि संविधान के इन्हीं प्रावधानों में ’आरक्षण’ शब्द का भी कहीं-कोई प्रयोग नहीं किया गया है। इन प्रावधानों में दो शब्द उल्लिखित है। पहला, विशेष-प्रोत्साहन और दूसरा, वर्ग लेकिन, कालान्तर में विशेष-प्रोत्साहन के बजाय आरक्षण और वर्ग के स्थान पर ’जाति’ शब्द चलन में आ गये।

आश्चर्य की  बात है कि संविधान लागू होने के करीब 68 वर्ष के बाद भी इस चलन पर भी कोई प्रश्न नहीं उठाता है। निश्चित रूप से यह राजनीतिक- निर्णय हो सकता है लेकिन यह अनैतिक नहीं हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय का रूख आर्थिक आरक्षण के सम्बन्ध में क्या होगा? इस सन्दर्भ में विधिवेत्ता एवं विशेषज्ञ अपनी-अपनी राय दे रहे हैं तथा वह राय भी अधिकांशतः तर्क पर आधारित कम एवं उनके वैचारिक झुकाव पर ज्यादा केंद्रित है। चूँकि यह एक कानूनी और जटिल भविष्यवाणी होगी अतः इससे भरसक बचना चाहिए। दूसरी ओर बुद्धिजीवियों का एक वर्ग आर्थिक आरक्षण की मूल-भावना को समझने, बहुसंख्यक सवर्णों की पीडा को जानने और मौजूदा आरक्षण की कमियों को उजागर करने के बजाय वैचारिक झुकाव के आधार पर एक राय निर्मित कर रहे हैं।

यह सच है कि ऐतिहासिक आधार पर कुछ जातियाँ पिछड़ रही हैं तथा इस तथ्य से भी कोई इंकार नहीं कर सकता है कि आरक्षण से एक वर्ग विशेष का सशक्तिकरण हुआ है लेकिन सच्चाई यह भी है कि आरक्षण का लाभ अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग में भी एक छोटा सा वर्ग ही ले पा रहा है। पिछड़े वर्गो से संबंधित एक अध्ययन दर्शाता है कि केवल दस जातियां ने सरकारी नौकरियों में 93 प्रतिशत आरक्षण का लाभ उठाया है। यही स्थिति कमोवेश अनुसूचित जाति व जनजाति में भी है।यद्यपि यहाँ यह भी जान लेना आवश्यक है कि आरक्षण ही गरीबी दूर करने का एकमात्र उपाय नहीं है यदि ऐसा होता तो संभवतः एससी-एसटी समाज विकास की मुख्य धारा में सम्मिलित हो गया होता।

कहने का आशय यह है कि आरक्षण को जिस उद्देश्य के अन्तर्गत लाया गया था वह उसे प्राप्त करने में विफल में रहा है। आरक्षित जातियों में भी एक वर्ग विशेष ही इससे लाभान्वित होता रहा है लेकिन वोट बैंक की राजनीति में इस पर चर्चा करना मुनासिब नहीं समझा गया। जब हम समावेशी विकास की बात करते हैं तो आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्ण भी इस कड़ी में स्वयमेव शामिल हो जाते हैं। वर्ल्ड इनइक्विलटी रिपोर्ट के अनुसार भारत विश्व में सर्वाधिक असमानता आधारित देश है जहाँ शीर्ष के 10 प्रतिशत लोग 55 प्रतिशत संसाधनों पर नियन्त्रण किये हुए हैं वहीं 2012 के सवर्ण समुदाय के एक अध्ययन के अनुसार ऊपर के 10 प्रतिशत सवर्ण समुदाय ने 60 प्रतिशत संसाधनों पर नियन्त्रण किया हुआ है। दूसरे शब्दों में असमानता प्रत्येक वर्ग में व्याप्त है तथा सवर्ण समुदाय भी इससे अछूता नहीं है। इन परिस्थितियों में समस्या का पूर्ण समाधान न होते हुए भी सवर्ण आरक्षण उस समुदाय के हित में है।

आर्थिक आरक्षण का मौजूदा प्रावधान थोड़ा जटिल है। आर्थिक आरक्षण के लिए कुछ शर्तें निर्धारित की गयी हैं। वही व्यक्ति आरक्षण का लाभ ले सकता है जिसकी वार्षिक आय आठ लाख से कम हो, कृषि योग्य भूमि पाँच एकड़ से कम हो, नगरपालिका क्षेत्र में 1000 वर्गमीटर का घर हो, नगरपालिका क्षेत्र से बाहर 209 गज और नगरपालिका क्षेत्र में 109 गज के जमीन से कम हो। यदि इस आधार पर देखा जाये तो आरक्षण के दायरे में लगभग 95 प्रतिशत जातियाँ आ जाती है। किन्तु इन प्रावधानों को बारीकी से देखने में इसमें एक कमी स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ती है कि जहाँ एक तरफ आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में आठ लाख रूपये तक वार्षिक अर्जित करने वालों को सम्मिलित कर लिया गया है तथा उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर माना जा रहा है वहीं दूसरी तरफ 2‐50 लाख रूपये से अधिक वार्षिक अर्जित करने वाले से आयकर वसूला जाता है। यदि वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को लाभान्वित करना है तो इसे घटाकर 4-5 लाख करना चाहिए।

पिछड़ा वर्ग के आरक्षित वर्ग में सम्मिलित होने से पहले इसे सामाजिक प्रतिष्ठा की दृष्टि से कमतर माना जाता था किन्तु वर्तमान समय में सामान्य वर्ग में सम्मिलित जातियाँ जैसे जाट, पाटीदार, मराठा भी आरक्षण  की माँग कर रहे हैं। चुनावी वर्ष में भाजपा द्वारा चला गया यह दाँव कितना सीटां में परिवर्तत हो पायेगा यह तो 2019 लोकसभा चुनावों के बाद ही पता चलेगा किन्तु इसके माध्यम से भाजपा ने न केवल नाराज हो रहे सवर्ण हिन्दू जातियों को अपने पाले में करने का प्रयत्न किया है अपितु मुसलमानों एवं इसाइयों के अगड़े वर्ग को भी लुभाने को भी कोशिश की है तथा इन आरोपों को खारिज करने का प्रयत्न किया है कि भाजपा केवल बहुसंख्यकों की हितैषी पार्टी है।

जहाँ तक जमीनी हकीकत का प्रश्न है तो यह स्पष्ट है कि सरकारी नौकरियों में निजीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के उपरान्त काफी कमी आयी है अतः 10 प्रतिशत आरक्षण समस्या का समाधान नहीं है। यदि सरकार वास्तव में किसानों-नौजवानों की समस्याओं के प्रति गंभीर है तो उसे लुभावने वायदों से आगे बढ़कर कृषि, शिक्षा-व्यवस्था में ढ़ाँचागत बदलाव लाने की तरफ अग्रसर होना होगा। आरक्षण की घोषणा चूँकि राजनीतिक रूप से जबर्दस्त अपील रखता है तथा हो सकता है कि सत्ता पक्ष को  इसका कुछ चुनावी लाभ भी मिले किन्तु समस्या के समाधान हेतु दीर्घकालीन उपाय करने की आवश्यकता है जिसमें समय, धन एवं धैर्य सभी की जरूरत होगी।

#   डॉ. शशिकान्त पाण्डेय                                           
प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान
बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ

एवं

डॉ. अमित सिंह
प्रवक्ता, राजनीति विज्ञान
आर. एस. एम. (पी० जी०) कालेज, धामपुर
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